अहंकार और आपसी अविश्वास के कारण टूटा रिश्ता तो कानून भी नहीं बचा सकता शादी: मद्रास हाईकोर्ट

मद्रास हाईकोर्ट ने एक मामले में पति के पक्ष में दी गई तलाक की डिग्री को सही ठहराते हुए पत्नी की साथ रहने की अपील खारिज कर दी है। कोर्ट ने कहा कि जब शादी में आपसी अविश्वास इस हद तक बढ़ जाए कि सहानुभूति की जगह अहंकार ले ले, तो कानून के जरिए रिश्ते को दोबारा नहीं जोड़ा जा सकता।

जस्टिस एन. आनंद वेंकटेश और जस्टिस के. के. रामकृष्णन की पीठ ने 28 जुलाई के अपने आदेश में कहा कि वैवाहिक जीवन आपसी सम्मान, सहनशीलता और व्यक्तिगत अहंकार से ऊपर परिवार के कल्याण को रखने पर टिकता है। जब दंपत्ति के बीच जिद आ जाती है तो हर असहमति एक जंग का रूप ले लेती है।

अहंकार और रिश्ते पर कलाम व गांधी के विचार

अदालत ने फैसले के दौरान पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का जिक्र करते हुए कहा कि जब नाखून बढ़ते हैं तो हम नाखून काटते हैं, उंगलियां नहीं। इसी तरह जब गलतफहमियां बढ़ें तो इंसान को अपना अहंकार छोड़ना चाहिए, न कि रिश्ता खत्म करना चाहिए।

पीठ ने महात्मा गांधी के विचारों को रेखांकित करते हुए कहा कि अपनी इच्छाओं को बेवजह बढ़ाना केवल एक आर्थिक सिद्धांत नहीं बल्कि वैवाहिक जीवन का दर्शन भी है। अनियंत्रित इच्छाएं अधिकार भाव को जन्म देती हैं, जिससे अहंकार बढ़ता है और यही अहंकार दांपत्य सुख की नींव को खोखला कर देता है। पीठ ने टिप्पणी की कि जब अहंकार की मृत्यु होती है तभी आत्मा जागती है और जहां त्याग का प्रवेश होता है, वहां शांति आती है।

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दोनों पक्षों के आरोप और विवाद

यह विवाद 2015 में हिंदू रीति-रिवाजों से हुई शादी से जुड़ा है, जिनसे 2016 में एक बेटी हुई। पति की ओर से पेश वकील आर. पोनकार्तिकेयन ने आरोप लगाया कि शादी की बातचीत के समय पत्नी के परिवार ने कुंडली में उसकी जन्मतिथि की गलत जानकारी दी थी। इसके अलावा, महिला के पिता एक पूर्व मुख्यमंत्री के व्यक्तिगत सुरक्षा अधिकारी (पीएसओ) थे, और उस पद का प्रभाव दिखाकर पति तथा उसके परिवार पर प्रताड़ना और दहेज उत्पीड़न की झूठी पुलिस शिकायतें दर्ज कराई गईं।

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पति ने यह भी आरोप लगाया कि बच्ची की पढ़ाई को लेकर विवाद होता था, पत्नी दिनभर मोबाइल फोन में व्यस्त रहती थी, घरेलू जिम्मेदारियों की उपेक्षा करती थी और उसकी सहमति के बिना अक्सर बच्ची को लेकर मायके चली जाती थी।

दूसरी तरफ, पत्नी की ओर से वकील जे. भारथन ने इन आरोपों का खंडन करते हुए कहा कि शादी के तुरंत बाद ही उसे शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाने लगा था। उसे पर्याप्त भोजन नहीं दिया जाता था, उसका मोबाइल छीन लिया गया था और मायके वालों से बातचीत करने पर रोक लगा दी गई थी।

फैमिली कोर्ट का फैसला और हाईकोर्ट का निष्कर्ष

कानूनी विवादों के बीच 2022 में पत्नी ने दांपत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना के लिए याचिका दायर की, जिसका पति ने विरोध करते हुए कहा कि यह याचिका साथ रहने की किसी सच्ची मंशा से नहीं दी गई है। इसके बाद फैमिली कोर्ट ने पति की अर्जी स्वीकार करते हुए तलाक की डिग्री मंजूर कर दी, जिसे महिला ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।

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साक्ष्यों का विश्लेषण करने के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि महिला जब तक अपने ससुराल में रही, उसके साथ गरिमापूर्ण व्यवहार किया गया था। कोर्ट ने ध्यान दिलाया कि महिला का ‘वलागप्पु’ (गोद भराई) समारोह बहुत धूमधाम से मनाया गया था, जो उस समय परिवार के सौहार्दपूर्ण माहौल को दर्शाता है।

भरण-पोषण के आदेश रहेंगे प्रभावी

अपील खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस फैसले का पूर्व में विभिन्न अदालतों द्वारा दिए गए भरण-पोषण (मेंटेनेंस) के आदेशों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। पति को कानून के तहत तय अपनी वित्तीय जिम्मेदारियों को लगातार पूरा करना होगा।

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