‘चौंकाने वाला और विचारहीन’: केरल हाईकोर्ट ने झारखंड के व्यक्ति की मॉब लिंचिंग के 8 आरोपियों की जमानत रद्द की

केरल हाईकोर्ट ने गुरुवार को पलक्कड़ में पिछले साल झारखंड के एक व्यक्ति की मॉब लिंचिंग के आरोपी आठ लोगों को दी गई जमानत के आदेश को रद्द कर दिया। जस्टिस ए. बदरुद्दीन ने अभियोजन पक्ष की अपील को स्वीकार करते हुए निचली अदालत के फैसले को “चौंकाने वाला” और “यांत्रिक” (mechanical) बताया। कोर्ट ने कहा कि निचली अदालत ने पीड़ित के परिवार को मिलने वाले अनिवार्य वैधानिक संरक्षणों की अनदेखी की।

इस मामले में मुख्य कानूनी सवाल यह था कि क्या कोई विशेष न्यायाधीश अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 2018 के तहत आने वाले मामले में, पीड़ित के आश्रितों को अनिवार्य नोटिस और सुनवाई का अवसर दिए बिना जमानत दे सकता है। हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि निचली अदालत इन प्रक्रियात्मक आदेशों का पालन करने में विफल रही और मॉब लिंचिंग जैसे गंभीर आरोप के प्रति उसका दृष्टिकोण “असावधान” रहा, जिससे जमानत आदेश टिकने योग्य नहीं रह गया। नतीजतन, जमानत बांड रद्द कर दिए गए और आरोपियों को तीन दिनों के भीतर आत्मसमर्पण करने का आदेश दिया गया।

यह मामला 40 वर्षीय राम नारायण बघेल की मृत्यु से संबंधित है, जो झारखंड के निवासी थे। 17 दिसंबर, 2023 को पलक्कड़ जिले में चोरी का आरोप लगाकर पुरुषों के एक समूह ने बघेल को कथित तौर पर रोका और बेरहमी से पीटा। अभियोजन पक्ष का तर्क था कि यह हमला मॉब लिंचिंग का स्पष्ट मामला था, जो पीड़ित के जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव से प्रेरित था।

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हत्या के गंभीर आरोपों और एससी/एसटी एक्ट के लागू होने के बावजूद, एक विशेष न्यायाधीश ने हाल ही में आठ आरोपियों को जमानत दे दी थी। अभियोजन पक्ष ने इस राहत को रद्द करने के लिए हाईकोर्ट का रुख किया, यह तर्क देते हुए कि इससे चल रही जांच पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा, जो अभी शुरुआती चरण में है।

जस्टिस बदरुद्दीन ने मामले में विशेष न्यायाधीश के रुख पर कड़ी नाराजगी व्यक्त की। हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि एससी/एसटी एक्ट के तहत, जमानत की कार्यवाही के दौरान पीड़ित या उनके आश्रितों को सुने जाने का वैधानिक अधिकार है।

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हाईकोर्ट ने टिप्पणी की, “..यह नोट करना चौंकाने वाला है कि विशेष न्यायाधीश ने मॉब लिंचिंग द्वारा अनुसूचित जाति समुदाय के एक सदस्य की हत्या के गंभीर मामले से निपटते समय, इस मामले में पीड़ित के आश्रित की अनिवार्य सुनवाई सुनिश्चित करने के लिए नोटिस जारी किए बिना ही असावधानीवश और विचारहीन तरीके से जमानत दे दी।”

हाईकोर्ट ने आगे कहा कि निचली अदालत ने यह सुझाव देकर कि आरोपियों से और पूछताछ की आवश्यकता नहीं है, “बेहद यांत्रिक तरीके से निष्कर्ष निकाल लिया।” कोर्ट ने बताया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023, आरोपियों की हिरासत के शुरुआती 60 दिनों के दौरान पुलिस हिरासत की अनुमति देती है, जिसे विशेष न्यायाधीश ने नजरअंदाज कर दिया।

हाईकोर्ट ने न्यायिक सतर्कता की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा, “यह विशेष न्यायाधीश की ओर से एक बहुत ही गंभीर चूक है और ऐसा नहीं होना चाहिए था। विशेष न्यायाधीश को भविष्य में इस प्रकृति के मामलों से निपटते समय अधिक सतर्क रहना चाहिए।”

जमानत रद्द करने को “कठोर आदेश” बताते हुए, लेकिन न्याय के लिए आवश्यक मानते हुए, हाईकोर्ट ने विशेष न्यायाधीश के आदेश को दरकिनार कर दिया।

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आठों उत्तरदाताओं (1 से 8) को तीन दिनों के भीतर संबंधित अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया गया है। यदि वे ऐसा करने में विफल रहते हैं, तो जांच अधिकारी उन्हें गिरफ्तार करने के लिए स्वतंत्र हैं। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि आत्मसमर्पण और हिरासत के बाद, आरोपी नए सिरे से जमानत आवेदन दाखिल करने के लिए स्वतंत्र हैं। हालांकि, विशेष न्यायाधीश को एससी/एसटी (पीओए) अधिनियम, 2018 के प्रावधानों के तहत, पीड़ित के परिवार को नोटिस और सुनवाई का अवसर प्रदान करने के बाद ही गुणों के आधार पर ऐसे आवेदनों पर निर्णय लेना होगा।

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