स्टेट बार काउंसिल चुनाव: महिलाओं के 30% आरक्षण और ‘को-ऑप्शन’ नियमों पर जस्टिस धूलिया कमेटी लेगी फैसला

कानूनी नियामक निकायों में जेंडर कोटा (लिंग आरक्षण) को सही तरीके से लागू करने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक हाई-पावर्ड इलेक्शन सुपरवाइजरी कमेटी को स्टेट बार काउंसिल में महिलाओं के ‘को-ऑप्शन’ (सह-चयन) के तरीके तय करने का निर्देश दिया है।

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस सुधांशु धूलिया की अध्यक्षता वाली इस कमेटी को अब यह जिम्मेदारी दी गई है कि वह महिला वकीलों के लिए 30 प्रतिशत प्रतिनिधित्व के जनादेश को पूरा करने की प्रक्रिया तय करे। यह व्यवस्था विशेष रूप से उन स्थितियों के लिए होगी जहां चुनाव के जरिए पर्याप्त संख्या में महिलाएं चुनकर नहीं आ पाती हैं।

यह मामला तब शीर्ष अदालत पहुंचा जब ‘को-ऑप्शन’ तंत्र के दुरुपयोग या गलत व्याख्या की चिंताएं जताई गईं। गौरतलब है कि दिसंबर 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने स्टेट बार काउंसिल में महिलाओं के लिए 30 प्रतिशत प्रतिनिधित्व अनिवार्य किया था। इसमें यह प्रावधान रखा गया था कि यदि चुनाव परिणामों में महिलाओं की संख्या कम रहती है, तो 10 प्रतिशत तक सीटों को ‘को-ऑप्शन’ के जरिए भरा जा सकता है।

सोमवार को चीफ जस्टिस सूर्या कांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने स्वीकार किया कि पिछले आदेश में 10 प्रतिशत को-ऑप्शन प्रक्रिया को लेकर स्पष्टता की कमी थी, जिसके कारण वर्तमान विवाद पैदा हुआ है।

सुनवाई के दौरान तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के याचिकाकर्ताओं की ओर से सीनियर एडवोकेट डी.एस. नायडू ने एक महत्वपूर्ण तथ्य पेश किया। उन्होंने बताया कि महिलाएं ‘ओपन कैटेगरी’ में भी चुनाव जीत रही हैं और कई बार पुरुष उम्मीदवारों से बेहतर प्रदर्शन कर रही हैं। उन्होंने तर्क दिया कि को-ऑप्शन को केवल “अंतिम विकल्प” के रूप में इस्तेमाल किया जाना चाहिए।

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नायडू ने दलील दी, “इसका अनपेक्षित परिणाम यह हो रहा है कि जिन महिलाओं ने चुनाव लड़ने की जहमत उठाई, उन्हें ही हाशिए पर धकेला जा रहा है।” उन्होंने चेतावनी दी कि यदि बार काउंसिल को केवल नाम सुझाने की शक्ति दी गई और चुनाव हारने वाली महिला उम्मीदवारों की अनदेखी की गई, तो इससे “अव्यवस्था” की स्थिति पैदा होगी।

कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) द्वारा प्रस्तावित नए नियमों पर भी सुनवाई की। एक हस्तक्षेपकर्ता की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट गोपाल शंकरनारायणन ने बताया कि BCI बार संघों के साथ मिलकर को-ऑप्शन की प्रक्रिया को अपने हाथ में लेना चाहता है।

शंकरनारायणन ने तर्क दिया कि यह तरीका ‘पंडोरा बॉक्स’ खोलने जैसा होगा और एडवोकेट्स एक्ट की धारा 3(2)(b) का उल्लंघन कर सकता है। इस कानून के तहत सदस्यों का चयन ‘सिंगल ट्रांसफ़रेबल वोट’ के माध्यम से आनुपातिक प्रतिनिधित्व द्वारा किया जाना चाहिए।

अदालत के सामने को-ऑप्शन के लिए कई विकल्प रखे गए—जैसे कि चुनाव हारने वाली उन महिलाओं को चुनना जिन्हें सबसे ज्यादा वोट मिले हों, या फैसला BCI और स्टेट बार काउंसिल पर छोड़ देना। बेंच ने निष्कर्ष निकाला कि जस्टिस धूलिया कमेटी इन सभी विकल्पों के गुण-दोषों का मूल्यांकन करने के लिए सबसे उपयुक्त है।

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बेंच ने कहा, “कमेटी से अनुरोध है कि वह सभी हितधारकों (स्टेकहोल्डर्स) से परामर्श करने के बाद इस पर निर्णय ले।”

यह हाई-पावर्ड कमेटी, जिसमें पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस रवि शंकर झा और सीनियर एडवोकेट वी. गिरी भी शामिल हैं, वर्तमान में देशभर में बार काउंसिल चुनावों की निगरानी कर रही है।

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