आस्था के मामलों में व्यक्तिगत विश्वास से ऊपर उठें जज, ‘संवैधानिक अंतरात्मा’ का पालन हो: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि संवैधानिक अदालतों के जजों को धार्मिक मामलों पर फैसला सुनाते समय अपने व्यक्तिगत विश्वासों से ऊपर उठना चाहिए। कोर्ट ने जोर दिया कि ऐसे मामलों में ‘अंतरात्मा की स्वतंत्रता’ और देश का व्यापक संवैधानिक ढांचा ही एकमात्र मार्गदर्शक होना चाहिए।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ-जजों की संविधान पीठ ने यह टिप्पणियां सबरीमाला मंदिर सहित विभिन्न धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव और धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई के पांचवें दिन कीं।

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन ने तर्क दिया कि यह मामला केवल किसी एक मंदिर या हिंदू प्रथाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन संवैधानिक सिद्धांतों से जुड़ा है जो सभी धर्मों और विश्वासों को नियंत्रित करते हैं। उन्होंने कहा कि ‘अंतरात्मा की स्वतंत्रता’ एक व्यापक अधिकार है, जिसके तहत कोई भी व्यक्ति गरिमापूर्ण तरीके से किसी भी संस्था, चाहे वह राज्य हो या धर्म, को चुनौती दे सकता है।

इस पर जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने स्पष्ट किया कि यद्यपि धर्म किसी व्यक्ति का बेहद निजी मामला हो सकता है, लेकिन एक जज की भूमिका इससे अलग है। उन्होंने कहा कि संवैधानिक कोर्ट में बैठते समय जज को अपनी “धार्मिक चेतना” से ऊपर उठकर संवैधानिक प्रावधानों के साथ संतुलन बनाना होता है, ताकि वे बड़ी तस्वीर (Larger Picture) देख सकें।

संविधान पीठ ने धार्मिक स्वायत्तता की सीमाओं पर भी चर्चा की। जस्टिस अरविंद कुमार ने टिप्पणी की कि “धार्मिक संप्रदायों (Denominational) की प्रथाएं न्यायिक जांच का विषय हो सकती हैं।” यह इस बात का संकेत है कि यदि कोई धार्मिक परंपरा संवैधानिक जनादेश का उल्लंघन करती है, तो उसे कानूनी जांच से पूरी तरह छूट नहीं दी जा सकती।

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राजीव धवन ने आगे तर्क दिया कि यदि धर्मों को पूरी तरह से तर्क (Logic) की कसौटी पर कसा जाए, तो वे “लुप्त” हो जाएंगे। उन्होंने कहा कि आध्यात्मिक अनुभव और ईश्वर के अस्तित्व को वैज्ञानिक रूप से सिद्ध नहीं किया जा सकता, इसलिए धार्मिक संदर्भ में कुछ “अलौकिक मान्यताओं” को कानून के हिस्से के रूप में स्वीकार करना पड़ता है।

सुनवाई में पुरानी परंपराओं को बनाए रखने के पक्ष में भी दलीलें दी गईं। सबरीमाला आचार संरक्षण समिति की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता वी. गिरि ने तर्क दिया कि मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं का प्रवेश वर्जित होना “सामूहिक बुद्धिमत्ता” और इष्टदेव की विशिष्ट विशेषताओं पर आधारित है। उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 25(1) के तहत धर्म को मानने के अधिकार में इन विशिष्टताओं की रक्षा भी शामिल है।

वहीं, आत्मन ट्रस्ट की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एम.आर. वेंकटेश ने दलील दी कि मासिक धर्म के दौरान महिलाओं का मंदिर या पूजा कक्ष में न जाना किसी भेदभाव का नहीं बल्कि “अनुशासन और विश्वास” का हिस्सा है। उन्होंने कहा, “जहाँ विज्ञान समाप्त होता है, वहाँ से विश्वास शुरू होता है।”

वर्तमान नौ-जजों की पीठ का गठन नवंबर 2019 में पांच-जजों की पीठ द्वारा भेजे गए संदर्भ (Reference) के बाद किया गया था। यह मामला 2018 के उस ऐतिहासिक फैसले से जुड़ी पुनर्विचार याचिकाओं से निकला है, जिसमें सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर लगी सदियों पुरानी रोक को असंवैधानिक घोषित किया गया था।

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अब यह बड़ी पीठ “अनिवार्य धार्मिक प्रथाओं” और “समानता के मौलिक अधिकार” के बीच के टकराव को परिभाषित करने के कार्य में जुटी है। इससे पहले कोर्ट ने चेतावनी दी थी कि यदि संप्रदायों के आधार पर मंदिरों में प्रवेश को रोका गया, तो इससे हिंदू समाज विभाजित होगा और धर्म पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।

मामले की सुनवाई अगले सप्ताह भी जारी रहेगी।

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