कोर्ट में मुकदमा दायर करने से पहले, उसका मीडिया में आना कानून की प्रक्रिया का दुरूपयोग है: ALL HC

इलाहाबाद High Court ने मीडिया में याचिकाओं और न्यायालय के दस्तावेजों के प्रकाशन पर गंभीर टिप्पणी की है, भले ही वे न्यायालय में दाखिल होने या न्यायालय द्वारा संज्ञान लेने से पहले प्रकाशित किया गया हो।

कोर्ट ने संवेदनशील मुद्दों पर याचिकाएं दायर कर प्रचार हासिल करने की प्रथा को बुरा माना है और कहा है कि ऐसी याचिकाओं के द्वाराजनता में चर्चा का विषय बनाने की योजना होती है।

ऑल्ट बालाजी पर वर्जिन भास्कर वेब सीरीज के बारे में लखनऊ हाईकोर्ट के वकील कृष्ण कन्हैया पाल द्वारा इलाहाबाद High Court लखनऊ के समक्ष एक पीआईएल दायर की गई थी। यहाँ पढ़ें

जनहित याचिका में आरोप लगाया गया था कि गर्ल्स हॉस्टल के बोर्ड में अहिल्या बाई के नाम का इस्तेमाल किया गया था, जबकि वेब सीरीज एक वयस्क कॉमेडी है।

न्यायमूर्ति पंकज मिथल और न्यायमूर्ति राजीव सिंह की खंडपीठ के समक्ष इस जनहित याचिका की सुनवाई हुई थी। ऑल्ट बालाजी की ओर से उच्च न्यायालय के समक्ष एक प्रारंभिक आपत्ति जताई गई थी कि याचिका एक जनहित याचिका नहीं है, बल्की यह सार्वजनिक रूप से ख्याती पाने के लिए दाखिल की गयी याचिका है, क्योंकि आधिकारिक तौर कोर्ट में याचिका दायर करने से पहले ही इसका प्रकाशन मीडिया में कर दिया गया था।

पूर्वाेक्त के मद्देनजर, न्यायालय ने पाया कि यह स्पष्ट है कि याचिकाकर्ता ने लोकहित के आड़ में अनुचित प्रचार करने के लिए न्यायालय के रिट क्षेत्राधिकार का आह्वान किया है।

याचिका दायर करने से पूर्व इसे सोशल मीडिया में प्रचारित किया गया था। कोर्ट ने आगे कहा कि सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न निर्णयों में कहा गया है कि जनहित याचिका का मकसद वंचित और कमजोर वर्ग के समाज के लिए बुनियादी मानव अधिकारों को बनाए रखने और न्याय सुनिश्चित करने के लिए है। याचिकाकर्ता वंचित वर्ग से संबंधित नहीं है और इस याचिका के माध्यम से कोई बुनियादी मानव अधिकार नहीं मांग रहा है।

यह भी अच्छी तरह से मान्यता प्राप्त है कि जनहित में अदालत में आने वाले व्यक्ति के साथ-साथ एक अलाभकारी व्यक्ति होना चाहिए और ऐसा कोई व्यक्ति नहीं होना चाहिए जो किसी व्यक्तिगत लाभ की मांग कर रहा ।

High Court ने इस तथ्य पर जोर दिया कि अगर कोर्ट में कोई भी सामग्री दाखिल करने से पहले मीडिया में प्रकाशित हो जाती है तो यह वास्तव में प्रक्रिया का दुरुपयोग है, क्योंकि यह अनावश्यक रूप से कई बार न्यायाधीशों के दिमाग को प्रभावित कर सकता है। मीडिया को इस तरह के मुकदमों के प्रकाशन के लिए एक जिम्मेदार भूमिका निभानी चाहिए और इसे टालना चाहिए।

अंततः High Court ने दायर की गई याचिका को खारिज कर दिया।

Case Details:-

Title:- Krishan Kanhaya Pal 

Case No. P.I.L. CIVIL No. – 15130 of 2020

Date Of Order: 18.09.2020

Quorum:- Hon’ble Mr Justice Pankaj Mithal and Hon’ble Mr Justice Rajeev Singh

Advocate:-  Krishan Kanhaya Pal (In Person)

Respondent- Shri J.N. Mathur Senior Counsel, Shri Chandra Shekhar Sinha & Shri Savitra Vardhan Singh

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