शादी ना करने पर रेप की FIR; Supreme Court ने किया बरी

Supreme Court के नवीनतम निर्णयों में, माननीय न्यायमूर्ति आर एफ नरीमन, माननीय न्यायमूर्ति नवीन सिन्हा और माननीय न्यायमूर्ति इंदिरा बनर्जी ने महेश्वर तिग्गा बनाम झारखंड राज्य के मामले में अपना फैसला सुनाया।

महेश्वर तिग्गा बनाम झारखंड राज्य के बारे में संक्षिप्त तथ्य इस प्रकार हैं

पीड़िता द्वारा 1999 में एक प्राथमिकी दर्ज की गई थी जिसमें आरोप लगाया गया था कि आरोपी ने उसके साथ यौन शोषण किया था। कथित घटना के बाद, आरोपी ने उसे किसी के साथ घटना का खुलासा नहीं करने के लिए कहा था और उससे शादी करने का वादा किया था।

पीड़िता पक्ष ने यह भी कहा कि कथित घटना के बाद, आरोपी ने उसके साथ शारीरिक संबंध बनाना जारी रखा। उसने यह भी कहा कि भले ही उसने उससे शादी करने का वादा किया था, लेकिन वह 20.04.1999 को शादी करने वाला था।

जब मामला अतिरिक्त न्यायिक आयुक्त, रांची के समक्ष रखा गया, तो अदालत ने आरोपी को दोषी ठहराया। उच्च न्यायालय के समक्ष एक अपील दायर की गई थी, जहां अदालत ने कहा कि अतिरिक्त न्यायिक आयुक्त, रांची द्वारा पारित निर्णय सही था। अदालत का विचार था कि अपीलार्थी ने पीड़िता को पत्र लिखे थे और उनकी साथ की तस्वीरे अपीलकर्ता को दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त है।

उच्च न्यायालय द्वारा पारित आदेश से क्षुब्ध होकर अपीलकर्ता ने सर्वाेच्च न्यायालय का रुख किया।

पार्टियों द्वारा सुप्रीम कोर्ट के समक्ष उठाए गए तर्क –

अपीलकर्ता के वकील द्वारा उठाए गए तर्क –

  • वरिष्ठ वकील श्रीमती वी मोहना, जो अभियुक्त की ओर से पेश हुयी थी, ने तर्क दिया कि प्राथमिकी दर्ज करने में पाँच साल की देरी थी और बाद में मुकदमा चला।
  • उन्होनें आगे तर्क दिया कि जिरह के दौरान अभियोजन पक्ष ने स्वीकार किया था कि आरोपी ने उसके साथ 09.041999 में बलात्कार नहीं किया था।
  • अभ्यिुक्त की ओर से कहा गया कि आरोपियों और अभियोजन पक्ष के बीच बदले गए पत्रों पर अदालत का ध्यान आकर्षित किया और कहा कि पत्रों की सामग्री से यह स्पष्ट है कि वे प्यार में थे और यह बलात्कार का मामला नहीं था।
  • यह भी कहा गया कि मेडिकल जांच रिपोर्ट में यह स्पष्ट था कि पीड़ित की कथित घटना के समय लगभग 25 वर्ष की आयु थी और उनके बीच शारीरिक संबंध सामान्य थे, इसलिए धारा 375 आईपीसी के तहत कोई अपराध नहीं किया जा सकता है।
  • यह भी आरोप लगाया गया कि धारा 313 के तहत अभियुक्तों को लगाए गए प्रश्न बहुत ही आकस्मिक और अस्पष्ट थे।
  • यह भी कहा गया कि अभियुक्त अभियोजन पक्ष से शादी करना चाहता थ, लेकिन दोनो के विभिन्न धर्मों से होने के कारण विवाह संभव नहीं था।

पीड़ित पक्ष द्वारा उठाए गए तर्क –

  • प्रतिवादी के वकील ने कहा कि प्राथमिकी दर्ज करने में देरी इसलिए हुई क्योंकि अभियुक्त ने अभियोजन पक्ष से शादी करने का वादा किया था।
  • यह भी तर्क दिया गया कि पीड़ित पक्ष की बहन ने यह भी कहा था कि आरोपी ने उसके साथ बलात्कार किया था और वह रोती हुई घर आई थी।
  • वकील ने अपीलकर्ता के इन दावों का खंडन किया कि शारीरिक संबंध संजीदा थे क्योंकि, घटना के समय पीड़िता केवल 14 वर्ष की थी।
  • यह आगे प्रस्तुत किया गया कि आरोपी ने उसके साथ शारीरिक संबंध स्थापित करने के लिए आरोपी से शादी करने का वादा किया था।

कोर्ट का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मुकदमे के दौरान पीड़ित पक्ष ने अदालत को बताया था कि वह घटना के समय 14 साल की थी, लेकिन किसी भी दस्तावेज के माध्यम से अपना दावा वापस नहीं ले सकती थी। यह भी देखा गया कि पीड़ित पक्ष के चचेरे भाई ने कहा था कि वह उससे छह साल छोटी थी, और जब यह बयान अदालत को दिया गया, तब चचेरा भाई 30 साल का था।

इससे पीड़ित पक्ष की उम्र पर सवाल खड़ा होता है। पीड़ित ने यह साबित करने के लिए स्कूल के किसी भी दस्तावेज को दाखिल नहीं किया था कि घटना के समय उसकी उम्र 14 साल थी। ऐसे मामले में, संदेह का लाभ आरोपी को दिया जाना चाहिए।

माननीय न्यायाधीश ने यह भी पाया कि धारा 313 सीआरपीसी के अन्तर्गत पूछे गये सवाल अत्यंत आकस्मिक और अस्पष्ट थे। सुप्रीम कोर्ट का दृष्टिकोण था कि इस मामले में, पत्रों से साफ है कि दोनो पक्षों को एक दूसरे से प्यार था कि उनके बीच एक दूसरे के साथ नियमित रूप से शारीरिक संबंध थे।

दोनों पक्षों के परिवारों को उनके रिश्ते के बारे में पता था और वे उनकी शादी कराना चाहते थे, लेकिन जैसा कि वे अलग-अलग धार्मिक पृष्ठभूमि से थे, योजनाएं अमल में नहीं ला सकीं। कोर्ट ने यह भी कहा कि आरोपी की शादी से चार दिन पहले रेप की एफआईआर दायर किया गया था, यह एक निंदनीय कार्य हो सकता है।

इस मुद्दे पर कि अभियुक्त ने पीड़ित पक्ष से शादी करने का झूठा वादा किया, पर कोर्ट ने कहा कि भले ही अभियोजन पक्ष को पता था कि विभिन्न धर्मों के कारण उनकी शादी की अनुमति नहीं दी जा सकती है, लेकिन वह अभियुक्त के साथ शारीरिक संबंध जारी रखती है और इसलिए यहॉ रेप का अपराध नहीं हो सकता है।

सभी साक्ष्यों को रिकॉर्ड करने और तथ्यों के ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने आरोपी को बरी कर दिया।

Case Details

Title:- Maheshwar Tigga vs The state of Jharkhand

Case No. CRIMINAL APPEAL NO.  635  OF  2020

Date of Order :- 28.09.2020

Quorum:-  Hon’ble Justice R. F Nariman, Hon’ble Justice Navin Sinha and Hon’ble Justice Indira Banerjee 

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