गुजरात विश्वविद्यालय ने बदला विवादित निर्णय, हाईकोर्ट को बताया—अब अंग्रेजी विषय के प्रोफेसर को ही बनाया जाएगा विभागाध्यक्ष

पटण जिले स्थित हेमचंद्राचार्य उत्तर गुजरात विश्वविद्यालय (HNGU) ने एक बड़े यू-टर्न में शुक्रवार को गुजरात हाईकोर्ट को बताया कि वह अब अंग्रेजी विभाग का प्रभारी प्रमुख (HoD) उसी विषय के प्रोफेसर को नियुक्त करेगा। यह बयान उस विवाद के बाद आया, जब रसायन शास्त्र की प्रोफेसर को अंग्रेजी विभाग की प्रमुख नियुक्त करने पर विश्वविद्यालय को कड़ी आलोचना और कानूनी चुनौतियों का सामना करना पड़ा।

विश्वविद्यालय ने जुलाई 2025 में रिटायर हुए पूर्व HoD आदेश पाल की जगह डॉ. कोकिलाबेन परमार, जो रसायन शास्त्र की प्रोफेसर हैं, को अंग्रेजी विभाग का प्रभारी प्रमुख नियुक्त किया था। इस निर्णय को प्रोफेसर हेतल पटेल, जो अंग्रेजी विभाग में कार्यरत हैं, ने शिक्षा न्यायाधिकरण में चुनौती दी थी।

पटेल ने तर्क दिया कि विभाग का प्रमुख उसी विषय के योग्य प्रोफेसर को ही बनाया जाना चाहिए। 10 अक्टूबर 2025 को, न्यायाधिकरण ने अंतरिम आदेश पारित करते हुए परमार की नियुक्ति पर रोक लगा दी और उन्हें विभाग में कार्य करने से भी मना कर दिया।

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डॉ. परमार ने इस आदेश को गुजरात हाईकोर्ट में चुनौती दी और कहा कि उन्हें पक्षकार बनाकर सुना ही नहीं गया। हाईकोर्ट ने 16 अक्टूबर को न्यायाधिकरण के आदेश पर रोक लगाते हुए परमार की नियुक्ति को अस्थायी रूप से बहाल कर दिया था।

हालांकि, शुक्रवार को विश्वविद्यालय ने कोर्ट को सूचित किया कि उसने पूरे मामले पर पुनर्विचार किया है और अब वह केवल “उसी शाखा और विषय” के प्रोफेसर को ही प्रभारी प्रमुख नियुक्त करेगा।

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न्यायमूर्ति नीरजार देसाई की एकल पीठ ने विश्वविद्यालय की इस मंशा को रिकॉर्ड पर लेते हुए अंतरिम रोक को समाप्त कर दिया और विश्वविद्यालय को नए सिरे से नियुक्ति करने की अनुमति दे दी।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि चूंकि विश्वविद्यालय और व्यक्तिगत याचिकाकर्ताओं ने अपनी याचिकाएं वापस ले ली हैं, इसलिए शिक्षा न्यायाधिकरण के समक्ष लंबित मूल वाद का औचित्य अब नहीं बचा है।

हालांकि, कोर्ट ने यह छूट दी कि यदि प्रोफेसर हेतल पटेल या कोई अन्य व्यक्ति विश्वविद्यालय की नई नियुक्ति से असंतुष्ट हो, तो वह उचित प्राधिकरण के समक्ष कानून के अनुसार चुनौती दे सकता है।

रसायन शास्त्र की प्रोफेसर को अंग्रेजी विभाग का प्रभारी बनाने के फैसले से अकादमिक योग्यता, विभागीय प्राथमिकता और प्रशासनिक पारदर्शिता को लेकर गंभीर सवाल उठे थे। विश्वविद्यालय का यह कहना कि नियुक्ति केवल प्रशासनिक जिम्मेदारी के लिए थी, न्यायाधिकरण और अदालत को संतुष्ट नहीं कर पाया।

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अब विश्वविद्यालय ने अपना रुख बदलते हुए विषय के अनुरूप नियुक्ति करने का आश्वासन दिया है, जिससे विवाद का पटाक्षेप होने की संभावना है। हालांकि, यह प्रकरण अन्य शैक्षणिक संस्थानों में विषय-संलग्न नियुक्तियों की प्रासंगिकता पर नई बहस जरूर शुरू कर गया है।

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