नाबालिग से दुष्कर्म का मामला: अवैध गर्भपात और सबूत मिटाने के आरोपी डॉक्टर की जमानत याचिका गुजरात हाईकोर्ट से खारिज

गुजरात हाईकोर्ट ने एक नाबालिग लड़की से दुष्कर्म के मामले को दबाने, अवैध रूप से देर से गर्भपात करने और डीएनए जांच रोकने के लिए भ्रूण को नदी में बहाने के आरोपी डॉक्टर की जमानत याचिका खारिज कर दी है। 4 अगस्त को दिए अपने फैसले में जस्टिस हसमुख डी. सुथार ने कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता समाज के व्यापक हित और जन कल्याण से ऊपर नहीं हो सकती।

क्या है पूरा मामला और आरोप

अभियोजन पक्ष के अनुसार, 16 से 18 वर्ष की आयु की पीड़ित किशोरी के साथ उसके 52 वर्षीय मकान मालिक ने दिसंबर 2024 से मई 2025 के बीच बार-बार दुष्कर्म किया। मकान मालिक पीड़िता पर प्रभाव और अधिकार की स्थिति में था। इस दौरान किशोरी गर्भवती हो गई। मामला सामने न आए, इसके लिए लड़की के माता-पिता ने मकान मालिक से 5 लाख रुपये लेकर समझौता कर लिया। जांच के दौरान पुलिस ने इस वित्तीय लेनदेन की रसीद भी बरामद की है।

ऐसे सामने आया पूरा मामला

पीड़िता के पिता की दो जुड़वां बेटियां हैं, जिनमें से एक पीड़िता है। मामला तब सामने आया जब पिता ने बेटी के गायब होने पर गुमशुदगी की शिकायत दर्ज कराई और बाद में हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण (हैबियस कॉर्पस) याचिका दायर की। जब पुलिस ने लड़की को खोज निकाला, तो उसने अपने माता-पिता के साथ जाने से इनकार कर दिया, जिसके बाद उसे सरकारी बाल गृह भेज दिया गया।

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जांच में सामने आया कि माता-पिता लड़की को जबरन डॉक्टर के पास ले गए थे। डॉक्टर ने किशोरी की सहमति के बिना 21 सप्ताह और 5 दिन की गर्भावस्था का अवैध रूप से गर्भपात कर दिया। यह मेडिको-लीगल मामला होने के बाद भी डॉक्टर ने पुलिस को सूचित नहीं किया, अस्पताल के रिकॉर्ड नष्ट कर दिए और डीएनए साक्ष्य जुटाने से रोकने के लिए मृत भ्रूण को नदी में फेंकवा दिया।

अदालत में दोनों पक्षों की दलीलें

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बचाव पक्ष के वकील ने तर्क दिया कि डॉक्टर को झूठा फंसाया गया है और उन्होंने केवल अपनी व्यावसायिक सेवाएं दी थीं। वकील का दावा था कि माता-पिता लड़की को अस्पताल लाए थे और उन्होंने ही गर्भपात कराया। उन्होंने बिना सहमति दवा देने या भ्रूण को छिपाकर फेंकने के आरोपों से इनकार किया।

वहीं, राज्य सरकार की ओर से सहायक सरकारी वकील हिमांशु के. पटेल ने जमानत का विरोध करते हुए कहा कि एक चिकित्सा पेशेवर होने के बावजूद डॉक्टर गैरकानूनी गतिविधियों में शामिल रहा। उसने पुलिस को सूचना नहीं दी और अपराध में सह-आरोपी की मदद की। अभियोजन पक्ष ने अदालत को यह भी बताया कि आरोपी डॉक्टर के खिलाफ पहले से ही चिकित्सकीय लापरवाही के दो मामले दर्ज हैं।

हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणियां

जमानत याचिका खारिज करते हुए जस्टिस हसमुख डी. सुथार ने कहा कि इस मामले को उजागर करने में धनबल और बाहुबल पर न्यायिक बुद्धिमत्ता की जीत हुई है। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि आरोपी डॉक्टर लगातार ऐसे अपराध करता प्रतीत हो रहा है और उसे जमानत देने से समाज में गलत संदेश जाएगा तथा न्याय प्रणाली पर जनता का विश्वास कमजोर होगा।

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अदालत ने सुनवाई के दौरान दो बार पीठ को गुमराह करने का प्रयास करने पर बचाव पक्ष के वकीलों को भी कड़ी फटकार लगाई। हाईकोर्ट ने याद दिलाया कि वकील अदालत के अधिकारी होते हैं और उनका दायित्व सही कानूनी तथ्य पेश करना है, चाहे वे उनके मुवक्किल के पक्ष में हों या नहीं।

अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल चार्जशीट दाखिल हो जाना आरोपी को जमानत पाने का स्वचालित अधिकार नहीं देता।

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