फिल्म ‘कहानी 2’ के कॉपीराइट उल्लंघन मामले में फिल्मकार सुजय घोष को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत, आपराधिक कार्यवाही रद्द

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को फिल्म निर्देशक सुजय घोष के खिलाफ झारखंड की एक अदालत में लंबित आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है। यह मामला उनकी 2016 की फिल्म ‘कहानी 2’ (Kahaani 2) पर लगे कॉपीराइट उल्लंघन के आरोपों से जुड़ा था।

जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने सुजय घोष की अपील को स्वीकार करते हुए झारखंड हाईकोर्ट के 22 अप्रैल, 2025 के उस आदेश को खारिज कर दिया, जिसमें हाईकोर्ट ने निचली अदालत द्वारा जारी समन में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया था।

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा, “मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) द्वारा 7 जून, 2018 को पारित समन आदेश और हाईकोर्ट द्वारा 22 अप्रैल, 2025 को पारित आदेश को रद्द किया जाता है।”

इस कानूनी विवाद की शुरुआत झारखंड के हजारीबाग में उमेश प्रसाद मेहता द्वारा दर्ज कराई गई एक शिकायत से हुई थी। मेहता ने आरोप लगाया था कि उन्होंने ‘सबक’ (Sabak) नामक एक स्क्रिप्ट लिखी थी, जिसे उन्होंने कॉपीराइट प्राप्त करने के उद्देश्य से नोटरी पब्लिक से प्रमाणित भी कराया था।

शिकायतकर्ता के अनुसार, उन्होंने सुजय घोष से मुलाकात की थी और स्क्रिप्ट के कॉपीराइट के लिए उनसे एक सिफारिश पत्र भी लिया था। मेहता का आरोप था कि इस मुलाकात के दौरान घोष ने उनकी स्क्रिप्ट की एक फोटोकॉपी अपने पास रख ली और बाद में बिना अनुमति के उसी सामग्री का उपयोग ‘कहानी 2’ बनाने में किया।

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मेहता ने दावा किया कि उन्होंने हजारीबाग के एक सिनेमा हॉल में फिल्म देखने के बाद इस कथित उल्लंघन को पकड़ा। इसके बाद उन्होंने फिल्मकार पर अपनी स्क्रिप्ट की “चोरी” करने और कॉपीराइट अधिनियम, 1957 की धारा 63 का उल्लंघन करने का आरोप लगाते हुए शिकायत दर्ज की।

जून 2018 में, हजारीबाग के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने मामले का संज्ञान लिया और फिल्मकार के खिलाफ प्रथम दृष्टया कॉपीराइट उल्लंघन का मामला पाते हुए समन जारी किया था।

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सुजय घोष ने इस आदेश को झारखंड हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। हालांकि, 22 अप्रैल, 2025 को हाईकोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी। हाईकोर्ट का मानना था कि वह इस स्तर पर “मिनी-ट्रायल” (छोटा ट्रायल) नहीं चला सकता और स्क्रिप्ट्स के बीच समानता या कॉपीराइट के दावों की सच्चाई का परीक्षण केवल ट्रायल के दौरान ही किया जा सकता है।

हाईकोर्ट के इस रुख से असहमत होकर घोष ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। पिछले साल जुलाई में, शीर्ष अदालत ने इस लंबित मामले की कानूनी वैधता की जांच करने के लिए झारखंड सरकार को नोटिस जारी किया था।

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हाईकोर्ट के आदेश को दरकिनार करते हुए और समन आदेश को रद्द करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने इस विशिष्ट आरोप को लेकर फिल्मकार की सात साल पुरानी कानूनी लड़ाई को समाप्त कर दिया है। यह फैसला इस बात को पुष्ट करता है कि यदि प्राथमिक स्तर पर उपलब्ध सामग्री के आधार पर आपराधिक कार्यवाही उचित नहीं लगती, तो अदालत के पास हस्तक्षेप करने का अधिकार है।

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