‘यह कोई छोटा काम नहीं’: दिल्ली के स्कूलों ने हाईकोर्ट से कहा—10 दिन में फीस कमेटी बनाना ‘व्यावहारिक रूप से असंभव’

दिल्ली पब्लिक स्कूल (DPS) सोसाइटी ने दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए सरकार के उस हालिया नोटिफिकेशन पर रोक लगाने की मांग की है, जिसमें 10 दिनों के भीतर ‘स्कूल-स्तर की फीस नियामक समिति’ (SLFRC) बनाने का निर्देश दिया गया है। स्कूलों ने इसे एक “विशाल अभ्यास” (Mammoth Exercise) बताते हुए कहा कि आगामी शैक्षणिक सत्र से पहले इसे पूरा करना मुमकिन नहीं है।

चीफ जस्टिस डी.के. उपाध्याय और जस्टिस तेजस कारिया की बेंच ने गुरुवार को विभिन्न स्कूल संघों द्वारा दायर याचिकाओं पर सुनवाई की। ये याचिकाएं दिल्ली सरकार के 1 फरवरी के नोटिफिकेशन को चुनौती देती हैं, जिसमें निजी स्कूलों को 10 दिनों के भीतर SLFRC गठित करने का आदेश दिया गया है।

पूरा कानूनी विवाद ‘दिल्ली स्कूल एजुकेशन (फीस के निर्धारण और नियमन में पारदर्शिता) अधिनियम’ से जुड़ा है। नए नियमों के मुताबिक, 1 अप्रैल, 2026 से शुरू होने वाले शैक्षणिक सत्र के लिए स्कूल तब तक फीस नहीं वसूल सकते, जब तक कि उसे SLFRC द्वारा अनुमोदित न कर दिया जाए।

दिल्ली सरकार का तर्क है कि ‘मुनाफाखोरी’ रोकने और सत्र की शुरुआत से ही फीस को विनियमित करने के लिए इस नोटिफिकेशन का तेजी से कार्यान्वयन जरूरी है। दूसरी ओर, स्कूलों का तर्क है कि अधिनियम की प्रक्रियात्मक औपचारिकताएं ऐसी हैं कि 10 दिन की समयसीमा में उन्हें पूरा करना प्रशासनिक रूप से नामुमकिन है।

डीपीएस सोसाइटी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता पुनीत मित्तल ने तर्क दिया कि समिति के चयन की प्रक्रिया बेहद जटिल है। अधिनियम के तहत, समिति में पांच अभिभावकों का होना अनिवार्य है, जिनका चयन स्कूल परिसर में सार्वजनिक नोटिस के बाद ‘ड्रॉ ऑफ लॉट्स’ (पर्ची निकालकर) के जरिए किया जाना चाहिए।

READ ALSO  दिल्ली हाईकोर्ट ने फ़ूड आउटलेट्स को डोमिनोज़ ट्रेडमार्क का उपयोग बंद करने का आदेश दिया, ज़ोमैटो और स्विगी को उन्हें असूचीबद्ध करने का निर्देश दिया

मित्तल ने कोर्ट को बताया, “दिल्ली में हमारे पास 25,000 छात्र हैं… यह एक बहुत बड़ा काम है। यह केवल एक बटन दबाने जैसा काम नहीं है।” उन्होंने जोर देकर कहा कि इस प्रक्रिया में बहुत संसाधनों की आवश्यकता होती है और इसे आनन-फानन में नहीं किया जा सकता।

इसके अलावा, उन्होंने समिति में अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) या सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों के सदस्य को शामिल करने की अनिवार्यता पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि स्कूलों के पास ऐसा कोई डेटा नहीं है क्योंकि एडमिशन के समय जाति या धर्म से जुड़ा कोई सवाल नहीं पूछा जाता। दिल्ली में एडमिशन पूरी तरह ‘पॉइंट-बेस्ड’ सिस्टम पर आधारित होते हैं।

READ ALSO  ट्रायल कोर्ट ने प्रतिवादी की स्वीकारोक्ति और संयुक्त कब्जे के सिद्धांतों की अनदेखी की; आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने विभाजन वाद खारिज करने का फैसला पलटा

शिक्षा निदेशालय (DoE) ने नोटिफिकेशन का बचाव करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा उठाए गए सवालों के बाद अधिनियम के कार्यान्वयन को सुगम बनाने के लिए यह आदेश जारी किया गया है। सरकार का कहना है कि देरी से अधिनियम का मूल उद्देश्य ही विफल हो जाएगा।

वहीं, निजी स्कूलों की ‘एक्शन कमेटी अनएडेड रिकॉग्नाइज्ड प्राइवेट स्कूल’ ने दलील दी कि यह नोटिफिकेशन कानूनी रूप से टिकने योग्य नहीं है क्योंकि यह मूल अधिनियम में निर्धारित समयसीमा को अपनी मर्जी से बदल रहा है।

READ ALSO  Delhi High Court Grants Bail to Ex-BJP MLA Kuldeep Singh Sengar in 2017 Unnao Rape Case

हाईकोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई 27 फरवरी के लिए तय की है। तब तक स्कूलों पर इस नोटिफिकेशन के पालन का दबाव बना रहेगा, जिसमें यह भी शर्त है कि कमेटी बनने के 14 दिनों के भीतर स्कूलों को अगले तीन वर्षों के लिए अपना प्रस्तावित फीस स्ट्रक्चर जमा करना होगा।

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles