लुटियंस दिल्ली के ऐतिहासिक ‘दिल्ली जिमखाना क्लब’ (DGC) की लीज खत्म करने के केंद्र सरकार के फैसले पर दिल्ली हाईकोर्ट ने अंतरिम रोक लगाने से फिलहाल इनकार कर दिया है। हालांकि, कोर्ट ने केंद्र सरकार के उस बयान को रिकॉर्ड पर लिया है जिसमें कहा गया है कि 5 जून की तय समयसीमा तक इस बेशकीमती संपत्ति पर जबरन कब्जा नहीं किया जाएगा। इस आश्वासन से क्लब के सदस्यों और कर्मचारियों को बड़ी राहत मिली है।
मंगलवार को मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस अवनीश झींगन ने स्पष्ट किया कि फिलहाल किसी अंतरिम आदेश की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि प्रशासन ने अभी तक बेदखली की कोई कानूनी प्रक्रिया शुरू नहीं की है। अदालत ने क्लब के सदस्यों और कर्मचारियों की आशंकाओं को “समय से पहले और केवल अनुमान पर आधारित” बताते हुए मामले की अगली सुनवाई जुलाई के अंत में तय की है।
केंद्र सरकार का रुख: ‘कानून के दायरे में ही होगी कार्रवाई’
यह पूरा कानूनी विवाद लुटियंस दिल्ली के बेहद सुरक्षित और संवेदनशील इलाके ‘2, सफदरजंग रोड’ पर स्थित 27.3 एकड़ की बेशकीमती जमीन को लेकर है। यह जमीन लोक कल्याण मार्ग स्थित प्रधानमंत्री आवास के ठीक बगल में है।
केंद्रीय आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय के तहत आने वाले भूमि और विकास कार्यालय (L&DO) ने बीते 22 मई को एक आदेश जारी कर जिमखाना क्लब को 5 जून तक जमीन वापस सौंपने का निर्देश दिया था। सरकार ने इसके पीछे “रक्षा बुनियादी ढांचे (Defence Infrastructure) को मजबूत और सुरक्षित करने” की आवश्यकता को मुख्य आधार बताया है।
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार का पक्ष रखते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मीडिया में चल रही जबरन कब्जे की खबरों और आशंकाओं को खारिज किया।
सॉलिसिटर जनरल ने अदालत से कहा, “5 जून की तारीख केवल पट्टेदार (लेसी) को अपनी मर्जी से खाली करने का एक विकल्प देने के लिए थी। जैसा कि मीडिया हलकों में अफवाहें चल रही हैं, ऐसा बिल्कुल नहीं है कि पुलिस वहां धावा बोल देगी और जबरन कब्जा ले लेगी। संपत्ति को वापस लेने की कोई भी कार्रवाई कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही की जाएगी।”
मेहता ने आगे कहा कि अगर भविष्य में बेदखली की कार्रवाई की जाती है, तो वह उचित कानूनी नोटिस देने के बाद ही शुरू होगी। इसके साथ ही उन्होंने संकेत दिया कि सरकार इसके बदले में वित्तीय मुआवजा दे सकती है या किसी अन्य स्थान पर वैकल्पिक जमीन उपलब्ध करा सकती है।
क्लब सदस्यों का विरोध: ‘रक्षा कारणों का हवाला महज एक दिखावा’
क्लब के सदस्यों का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने साल 1928 में हुए इस ऐतिहासिक ‘शाश्वत पट्टे’ (Perpetual Lease) को रद्द करने के सरकार के फैसले की कड़ी आलोचना की। सिंघवी ने तर्क दिया कि लीज रद्द करने के पीछे कोई वास्तविक “सार्वजनिक उद्देश्य” नहीं है और यह फैसला संविधान के अनुच्छेद 300A का उल्लंघन करता है, जो यह सुनिश्चित करता है कि किसी भी व्यक्ति को कानून के बिना उसकी संपत्ति से वंचित नहीं किया जा सकता। उन्होंने इस बात पर भी सवाल उठाया कि सरकारी आदेश में मुआवजे को लेकर पूरी तरह चुप्पी साधी गई है।
इस रुख का समर्थन करते हुए क्लब के सदस्य विजय खुराना और 500 से अधिक अन्य सदस्यों द्वारा दायर याचिका में आरोप लगाया गया कि राष्ट्रीय सुरक्षा और रक्षा बुनियादी ढांचे का “अस्पष्ट और सामान्य कारण” केवल एक “दिखावा” है, जिसका मकसद कानूनी प्रक्रिया को दरकिनार कर जबरन बेदखली का रास्ता साफ करना है।
दूसरी ओर, क्लब की अंतिम चुनी हुई गवर्निंग बॉडी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने दलील दी कि क्लब का कब्जा अवैध नहीं है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब सरकार पहले ही परिसर पर पुनः प्रवेश (Re-entry) की घोषणा कर चुकी है, तो फिर बेदखली के लिए कारण बताओ नोटिस कैसे जारी किया जा सकता है?
साठगांठ की आशंकाओं पर कोर्ट की टिप्पणी और समन जारी
चूंकि 2022 में नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) द्वारा कुप्रबंधन के आरोपों के बाद क्लब के दैनिक कामकाज को संभालने के लिए सरकार द्वारा नामित 15 निदेशकों की नियुक्ति की गई थी, इसलिए सदस्यों ने आशंका जताई थी कि वर्तमान प्रबंधन सरकार के साथ “मिलीभगत” कर चुपचाप संपत्ति सौंप सकता है।
हालांकि, जस्टिस झींगन ने इस डर को खारिज कर दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि वर्तमान गवर्निंग बॉडी ने पहले ही सरकार को पत्र लिखकर अपनी चिंताओं और आपत्तियों से अवगत करा दिया है।
हाईकोर्ट ने भले ही इस चरण पर लीज रद्द करने के आदेश पर रोक नहीं लगाई, लेकिन उसने इस मामले में दायर याचिकाओं पर केंद्र सरकार और क्लब के वर्तमान प्रबंधन को समन जारी कर आठ सप्ताह के भीतर लिखित जवाब मांगा है।
अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ताओं के मुकदमे दायर करने के कानूनी अधिकार (Locus Standi) और लीज डीड रद्द करने से पहले नोटिस की अनिवार्य आवश्यकता जैसे बुनियादी कानूनी सवालों पर सुनवाई के अगले चरण में विस्तार से विचार किया जाएगा।
दिल्ली जिमखाना क्लब: इतिहास के पन्नों से
लुटियंस दिल्ली की पहचान बन चुका यह संस्थान एक सदी से भी अधिक समय से देश के प्रशासनिक और सैन्य इतिहास का गवाह रहा है:
- 1913: ब्रिटिश काल के प्रशासनिक और सैन्य अधिकारियों के मनोरंजन के लिए 3 जुलाई को “इम्पीरियल दिल्ली जिमखाना क्लब” के रूप में स्थापना हुई।
- 1928: लुटियंस दिल्ली की 27.3 एकड़ जमीन के लिए ऐतिहासिक ‘परपेचुअल लीज’ (शाश्वत पट्टा) निष्पादित किया गया।
- 1930 का दशक: क्लब की वर्तमान प्रसिद्ध इमारतों और बुनियादी ढांचे का निर्माण पूरा हुआ।
- 1947: भारत की स्वतंत्रता के बाद क्लब के नाम से आधिकारिक तौर पर ‘इम्पीरियल’ शब्द हटा दिया गया।
- 2022: कुप्रबंधन और उत्पीड़न के आरोपों के बाद कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय की याचिका पर NCLT ने क्लब की जनरल कमेटी में सरकार द्वारा नामित 15 निदेशकों की नियुक्ति को मंजूरी दी।

