गुजरात के सुवाली ऑयल ब्लॉक का ठेका बढ़ाने से दिल्ली हाईकोर्ट का इनकार, ओएनजीसी के पास जाएगी कमान

गुजरात के सुवाली स्थित तटीय तेल क्षेत्र के संचालन को लेकर वेदांत लिमिटेड को बड़ा झटका लगा है। दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार के उस फैसले को सही ठहराया है, जिसमें वेदांत के प्रोडक्शन शेयरिंग कॉन्ट्रैक्ट (पीएससी) की अवधि बढ़ाने की अर्जी खारिज कर दी गई थी। इस फैसले के साथ ही इस तेल ब्लॉक का नियंत्रण और सभी परिसंपत्तियां ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉर्पोरेशन लिमिटेड (ओएनजीसी) को सौंपने का रास्ता साफ हो गया है।

न्यायमूर्ति पुरुषेंद्र कुमार कौरव की एकल पीठ ने वेदांत की उस याचिका को निरस्त कर दिया, जिसमें पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के 19 सितंबर 2025 के आदेश को चुनौती दी गई थी। मंत्रालय ने जून 2021 में वेदांत द्वारा दायर 10 साल के अनुबंध विस्तार के आवेदन को अस्वीकार कर दिया था। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने ओएनजीसी को तुरंत ब्लॉक की परिसंपत्तियों और संचालन को अपने हाथ में लेने के सरकारी निर्देश को भी बरकरार रखा है।

अदालत की सख्त टिप्पणी

मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने वेदांत के रवैये पर कड़ा रुख अपनाया। पीठ ने कहा कि सरकारी राजस्व में से कंपनी द्वारा एकतरफा कटौती करना किसी भी तरह से तर्कसंगत या नीयत से सही नहीं था। अदालत के अनुसार, कोई भी निजी संस्थान सार्वजनिक संसाधनों का प्रबंधन करते समय अपनी मनमर्जी नहीं चला सकता।

जस्टिस कौरव ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि निजी कंपनियां देश के नागरिकों के सार्वजनिक संसाधनों को संभालती हैं। अनुबंध की व्यवस्था के तहत निजी कंपनियों के पास सरकारी हिस्से की कमान होती है, जिससे वे कुछ हद तक हावी स्थिति में आ जाती हैं। हालांकि, ऐसे मामलों में कंपनियों को बेहद सावधानी बरतनी चाहिए। सरकार को किसी निजी कंपनी की सनक, मर्जी या अपनी सहूलियत के हिसाब से की गई व्याख्याओं के भरोसे बंधक नहीं बनाया जा सकता।

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अनुबंध का इतिहास और समय-सीमा

गुजरात के सुवाली ब्लॉक के लिए 20 जून 1998 को 25 साल की अवधि के लिए प्रोडक्शन शेयरिंग कॉन्ट्रैक्ट पर हस्ताक्षर किए गए थे। यह समझौता केंद्र सरकार, वेदांत (तत्कालीन ऑपरेटर), ओएनजीसी और इन्वेनिर पेट्रोडाइन लिमिटेड के बीच हुआ था। मूल समझौते की अवधि 30 जून 1998 से शुरू होकर 29 जून 2023 तक थी।

मूल अवधि समाप्त होने के बाद, काम जारी रखने के लिए सरकार ने कंपनी को पांच बार अस्थायी विस्तार दिया था। इनमें से अंतिम अंतरिम विस्तार की समय-सीमा 29 सितंबर 2024 को समाप्त हो गई थी। इससे पहले वेदांत ने जून 2021 में ही अनुबंध को 29 जून 2033 तक यानी 10 साल और बढ़ाने का आवेदन जमा किया था।

दलीलों और अदालती प्रक्रिया का ब्योरा

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पेट्रोलियम मंत्रालय द्वारा सितंबर 2025 में विस्तार अर्जी खारिज किए जाने और ओएनजीसी को कार्यभार संभालने का निर्देश देने के बाद वेदांत ने हाईकोर्ट का रुख किया था। याचिका में कंपनी ने माना था कि अनुबंध विस्तार उसका कोई निरपेक्ष अधिकार नहीं है, लेकिन उसका दावा था कि सरकार का फैसला विस्तार नीति के खिलाफ था, इसमें तथ्यों पर ठीक से विचार नहीं किया गया और यह अप्रासंगिक कारणों पर आधारित था।

दूसरी ओर, केंद्र सरकार ने दलील दी कि विस्तार न देने का फैसला पूरी तरह जनहित में लिया गया है और यह ‘पब्लिक ट्रस्ट डॉक्ट्रिन’ (सार्वजनिक न्यास सिद्धांत) के तहत सरकार की कानूनी जिम्मेदारियों के अनुकूल है। इससे पहले हाईकोर्ट ने जनवरी में इस याचिका पर सुनवाई करते हुए अंतरिम आदेश जारी कर दोनों पक्षों को यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दिया था, जिसे अब याचिका खारिज करते हुए समाप्त कर दिया गया है।

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