सुप्रीम कोर्ट दलबदल विरोधी कानून के तहत राजनीतिक दलों के विलय से जुड़े संवैधानिक प्रावधानों की पुनरीक्षा करने पर सहमत हो गया है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी मोहना की पीठ वरिष्ठ अधिवक्ता और निर्दलीय राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल की याचिका पर 27 जुलाई को सुनवाई करेगी।
दसवीं अनुसूची के प्रावधानों पर पुनर्विचार की मांग
कपिल सिब्बल ने व्यक्तिगत रूप से यह याचिका दायर की है। बुधवार को चीफ जस्टिस की अगुआई वाली पीठ के समक्ष मामले का उल्लेख करते हुए उन्होंने इस पर त्वरित सुनवाई का अनुरोध किया। सिब्बल ने संविधान की दसवीं अनुसूची के पैरा 4 की व्याख्या पर नए सिरे से विचार करने का आग्रह किया है। यह प्रावधान सांसदों और विधायकों को दूसरे दल में विलय का दावा करके अयोग्यता से बचने की अनुमति देता है।
संसद की संरचना में बदलाव पर उठाए सवाल
अदालत में अपनी बात रखते हुए सिब्बल ने कहा कि वर्तमान में जिस तरह से देश में संसद की संरचना बदली जा रही है, वह चिंताजनक है और इस संदर्भ में विलय के नियम की समीक्षा जरूरी है। उन्होंने अदालत को बताया कि इसी विषय से जुड़ी अन्य याचिकाएं भी शीर्ष अदालत में विचाराधीन हैं। इसमें शिवसेना (यूबीटी) की वह याचिका भी शामिल है जिसमें लोकसभा अध्यक्ष द्वारा उसके सांसदों के शिंदे गुट में विलय को दी गई मंजूरी को चुनौती दी गई है। यह मामला जस्टिस पीएस नरसिम्हा की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष सूचीबद्ध है।
हालिया दलबदल का घटनाक्रम
सिब्बल की यह याचिका ऐसे समय में सामने आई है जब आम आदमी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और शिवसेना (यूबीटी) जैसे दलों के कई प्रतिनिधि दसवीं अनुसूची के विलय नियम का उपयोग करके सत्तारूढ़ भाजपा और अन्य राजनीतिक दलों में शामिल हुए हैं। चीफ जस्टिस ने सिब्बल की दलीलों पर ध्यान देते हुए याचिका को सुनवाई के लिए सोमवार, 27 जुलाई को सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया।

