दिल्ली हाईकोर्ट ने रेलवे दावा अधिकरण (RCT) के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें एक यात्री की ट्रेन से गिरकर हुई मौत के मामले में मुआवजे के दावे को खारिज कर दिया गया था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि रेलवे अधिनियम की धारा 124-A के तहत रेलवे का दायित्व ‘कठोर दायित्व’ (Strict Liability) के सिद्धांत पर आधारित है।
जस्टिस मनोज कुमार ओहरी की पीठ ने ट्रिब्यूनल के फैसले को पलटते हुए कहा कि टिकट खरीदने के तरीके और टिकट पेश करने में देरी जैसे “अति-तकनीकी” (Hyper-technical) आधारों पर दावे को खारिज करना कानूनन सही नहीं है। कोर्ट ने मृतक के परिवार को मुआवजा देने का आदेश दिया है।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला 27 फरवरी 2016 की एक दुखद घटना से जुड़ा है। अपीलकर्ता (मृतक की पत्नी और माता-पिता) के अनुसार, मृतक तारा चंद शर्मा ‘झांसी-हजरत निजामुद्दीन ताज एक्सप्रेस’ (ट्रेन संख्या 12279) से आगरा कैंट से हजरत निजामुद्दीन की यात्रा कर रहे थे।
ओखला रेलवे स्टेशन के पास भारी भीड़ और ट्रेन के अचानक झटके के कारण तारा चंद संतुलन खो बैठे और चलती ट्रेन से गिर गए, जिससे मौके पर ही उनकी मृत्यु हो गई।
ट्रिब्यूनल ने क्यों खारिज किया था दावा?
रेलवे दावा अधिकरण ने 7 दिसंबर 2017 को उनके मुआवजे के दावे को खारिज कर दिया था। ट्रिब्यूनल ने इसके लिए तीन मुख्य कारण बताए थे:
- शव घटना के 9 घंटे से अधिक समय बाद (अगले दिन सुबह 7:25 बजे) बरामद हुआ।
- सह-यात्री (रिश्तेदार) भगवान पाराशर ने पुलिस को यात्रा टिकट घटना के अगले दिन दोपहर में सौंपा।
- ट्रिब्यूनल ने इस बात पर भी संदेह जताया कि जब मृतक और सह-यात्री रिश्तेदार थे, तो दो अलग-अलग टिकट क्यों खरीदे गए।
ट्रिब्यूनल ने माना था कि यह ‘अप्रिय घटना’ (Untoward Incident) नहीं थी और मृतक एक वास्तविक यात्री (Bona fide passenger) नहीं था।
हाईकोर्ट की अहम टिप्पणियां
मामले की सुनवाई के दौरान, दिल्ली हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल के तर्कों को सिरे से खारिज कर दिया।
1. ‘कठोर दायित्व’ का सिद्धांत (Strict Liability): जस्टिस ओहरी ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों (यूनियन ऑफ इंडिया बनाम प्रभाकरन विजय कुमार) का हवाला देते हुए कहा कि धारा 124-A के तहत रेलवे की जिम्मेदारी ‘कठोर’ है। ऐसे मामलों में रेलवे की गलती या लापरवाही साबित करने की आवश्यकता नहीं होती है। भले ही यात्री की अपनी लापरवाही हो, जब तक कि मामला आत्महत्या या आपराधिक कृत्य का न हो, मुआवजा देने से इनकार नहीं किया जा सकता।
2. टिकट पर सवाल उठाना ‘अति-तकनीकी’: कोर्ट ने ट्रिब्यूनल के उस निष्कर्ष को त्रुटिपूर्ण माना जिसमें टिकट खरीदने के तरीके (रिश्तेदारों के लिए अलग-अलग टिकट) पर सवाल उठाए गए थे। कोर्ट ने इसे “अति-तकनीकी” दृष्टिकोण करार दिया। सह-यात्री ने स्पष्ट किया था कि वह जरूरी काम से जनकपुरी चला गया था और उसे मौत की खबर अगले दिन मिली, जिसके बाद उसने टिकट पुलिस को सौंपा। कोर्ट ने इस स्पष्टीकरण को स्वीकार किया।
3. वास्तविक यात्री: कोर्ट ने कहा कि जब टिकट पेश कर दिया गया है और सह-यात्री का बयान मौजूद है, तो यह साबित करने का भार रेलवे पर आ जाता है कि मृतक ‘बिना टिकट’ था। रेलवे इसे साबित करने में विफल रहा।
फैसला
दिल्ली हाईकोर्ट ने माना कि मृतक की मृत्यु रेलवे अधिनियम की धारा 123(c)(2) के तहत एक ‘अप्रिय घटना’ थी। कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए रेलवे को निर्देश दिया है कि वह अपीलकर्ताओं को मुआवजा प्रदान करे।
मुआवजे की राशि: चूंकि दुर्घटना 2016 के मुआवजा संशोधन नियमों से पहले की है, कोर्ट ने यूनियन ऑफ इंडिया बनाम रीना देवी के फैसले का पालन करते हुए निर्देश दिया कि रेलवे निम्नलिखित में से जो भी अधिक हो, उसका भुगतान करे:
- 4,00,000 रुपये (दुर्घटना की तारीख से 12% ब्याज के साथ)।
- या 8,00,000 रुपये (संशोधित राशि) 12% ब्याज के साथ।
यह भुगतान चार सप्ताह के भीतर किया जाना है। कोर्ट ने अपील दायर करने में हुई 690 दिनों की देरी को भी अपीलकर्ताओं की आर्थिक स्थिति को देखते हुए माफ कर दिया।
केस डीटेल्स:
- केस टाइटल: प्रियंका शर्मा और अन्य बनाम यूनियन ऑफ इंडिया
- केस नंबर: FAO 59/2020
- कोरम: जस्टिस मनोज कुमार ओहरी
- अपीलकर्ताओं के वकील: श्री राजन सूद, सुश्री आशिमा सूद और सुश्री मेघा सूद
- प्रतिवादी (रेलवे) के वकील: सुश्री अरुणिमा द्विवेदी (CGSC), सुश्री स्वाति झुनझुनवाला, सुश्री हिमांशी सिंह और सुश्री मोनालीशा प्रधान

