दिल्ली हाईकोर्ट ने 26 सप्ताह की गर्भावस्था के गर्भपात की अनुमति देने वाले आदेश को पलटा, कहा— यह भ्रूण हत्या होगी

दिल्ली हाईकोर्ट की एक खंडपीठ ने गुरुवार को एक अहम निर्णय में उस एकल न्यायाधीश के आदेश को पलट दिया, जिसमें 16 वर्षीय बलात्कार पीड़िता को 26 सप्ताह की गर्भावस्था का गर्भपात कराने की अनुमति दी गई थी। कोर्ट ने कहा कि इतनी देर से गर्भपात कराना भ्रूण हत्या (foeticide) के बराबर होगा, जो भारतीय कानून के तहत आपराधिक अपराध है।

मुख्य न्यायाधीश डी.के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति अनीश दयाल की पीठ ने न्यायमूर्ति मनोज जैन द्वारा 30 जून को पारित उस आदेश में संशोधन किया, जिसमें एम्स को 1 जुलाई को गर्भपात कराने का निर्देश दिया गया था। खंडपीठ ने इसके बजाय आदेश दिया कि गर्भावस्था कम से कम 34 सप्ताह तक जारी रहे, यह कहते हुए कि “जीवन किसी भी रूप में बहुत महत्वपूर्ण है और राज्य का दायित्व है कि वह उसकी रक्षा करे।”

पीठ ने कहा, “इस चरण में गर्भपात कराना भ्रूण हत्या होगा। यह आपराधिक कानून के तहत अपराध है। हम इसमें भागीदार नहीं बन सकते… कानून इसकी अनुमति नहीं देता। यह जीवन को समाप्त करना होगा।”

कोर्ट ने एम्स मेडिकल बोर्ड की विशेषज्ञ राय का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि 26 सप्ताह पर गर्भपात कराना किशोरी की भविष्य की प्रजनन क्षमता को प्रभावित कर सकता है और भ्रूण के लिए भी गंभीर खतरे उत्पन्न कर सकता है, जैसे न्यूरोलॉजिकल समस्याएं और केवल 70% की जीवित रहने की संभावना। बोर्ड ने सलाह दी थी कि सुरक्षित प्रसव के लिए गर्भावस्था को 4–6 सप्ताह और बढ़ाया जाए।

चिकित्सा गर्भपात अधिनियम (MTP Act) के अनुसार, 24 सप्ताह से अधिक के गर्भपात की अनुमति केवल तभी दी जा सकती है जब भ्रूण में गंभीर विकृति हो या महिला के जीवन को गंभीर खतरा हो। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस मामले में ऐसी कोई स्थिति नहीं थी।

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यह किशोरी दो बार—पिछले वर्ष और मार्च में—यौन उत्पीड़न का शिकार हुई थी, लेकिन उसने अपनी गर्भावस्था की जानकारी परिवार को नहीं दी थी। 21 जून को चिकित्सकीय जांच में गर्भधारण की पुष्टि हुई, जिसके बाद बलात्कार का मामला दर्ज किया गया। न्यायमूर्ति जैन ने पहले दिए आदेश में किशोरी को हुए “गंभीर मानसिक आघात” का हवाला देते हुए गर्भपात की अनुमति दी थी, लेकिन खंडपीठ ने कहा कि मेडिकल बोर्ड की राय प्राथमिकता होनी चाहिए।

मामले की संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने निर्देश दिया कि किशोरी को एम्स में ही रहने दिया जाए जब तक उसकी गर्भावस्था पूरी न हो जाए और डिलीवरी के बाद वह चिकित्सकीय रूप से पूरी तरह स्वस्थ न हो जाए। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि एम्स अगले पांच वर्षों तक मां और बच्चे दोनों को मुफ्त चिकित्सा सुविधा प्रदान करेगा।

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दिल्ली सरकार के महिला एवं बाल विकास विभाग को अगली सुनवाई (15 अक्टूबर) से पहले हलफनामा दाखिल करने को कहा गया है, जिसमें किशोरी और नवजात के लिए सहायता योजनाएं—जैसे मुफ्त शिक्षा और व्यावसायिक प्रशिक्षण—का विवरण दिया जाए।

अदालत ने मामले की दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थितियों को स्वीकार करते हुए कहा, “दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं सभी के जीवन में होती हैं, लेकिन हमें उनके साथ जीना सीखना पड़ता है… राज्य को हरसंभव प्रयास करना चाहिए कि जीवन की रक्षा हो।”

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