दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में सेंट कोलम्बा स्कूल और केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) को 12वीं कक्षा के एक छात्र के आधिकारिक रिकॉर्ड में उसकी जन्मतिथि सुधारने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि माता-पिता की धोखाधड़ी या गलत काम का खामियाजा बच्चे को भुगतने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। हालांकि, एडमिशन के समय गलत जानकारी देने के लिए कोर्ट ने छात्र के माता-पिता पर 2 लाख रुपये का अनुकरणीय (एक्जम्पलरी) जुर्माना लगाया है।
जस्टिस विकास महाजन ने 17 जुलाई को दिए अपने फैसले में स्पष्ट किया कि गलत साधनों का उपयोग करने वाले माता-पिता बिना किसी सजा के बचकर नहीं निकल सकते। उन्होंने आदेश दिया कि जुर्माने की इस राशि का उपयोग दिल्ली हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के स्टाफ के बच्चों की पढ़ाई-लिखाई के लिए किया जाएगा।
दाखिले के वक्त गलत जन्मतिथि का विवाद
यह मामला 12वीं कक्षा के एक छात्र की याचिका पर सामने आया है। याचिका में स्कूल रिकॉर्ड में छात्र की जन्मतिथि को 23 मार्च 2010 से बदलकर उसकी वास्तविक जन्मतिथि 23 अप्रैल 2010 करने की मांग की गई थी।
छात्र के अभिभावक के अनुसार, छात्र को अप्रैल 2014 में सेंट कोलम्बा स्कूल की किंडरगार्टन (केजी) कक्षा में दाखिला दिलाया गया था। उस समय माता-पिता की एक कथित अनजानी भूल के कारण स्कूल रिकॉर्ड में उसकी जन्मतिथि गलत दर्ज हो गई थी।
याचिका में दावा किया गया कि छात्र की सही जन्मतिथि (23 अप्रैल 2010) उसके अन्य सभी सरकारी और कानूनी दस्तावेजों में बिल्कुल सही दर्ज है। इसमें 5 अप्रैल 2011 को जारी किया गया जन्म प्रमाण पत्र, आधार कार्ड, पासपोर्ट और उस अस्पताल के रिकॉर्ड शामिल हैं जहां उसका जन्म हुआ था।
बोर्ड परीक्षा से पहले सामने आई गड़बड़ी
छात्र के अभिभावक ने बताया कि 9वीं कक्षा के दौरान सीबीएसई को भेजे गए छात्र पंजीकरण फॉर्म में जन्मतिथि बिल्कुल सही दर्ज थी और इस पर माता-पिता के हस्ताक्षर भी थे। लेकिन बाद में, शैक्षणिक सत्र 2025-2026 की 10वीं बोर्ड परीक्षा के एडमिट कार्ड जारी होने से ठीक पहले, स्कूल ने सीबीएसई को छात्र की गलत जन्मतिथि (23 मार्च 2010) भेज दी।
इसके बाद छात्र के पिता ने स्कूल के प्रिंसिपल और सीबीएसई के क्षेत्रीय अधिकारी को पत्र लिखकर जन्मतिथि सुधारने का अनुरोध किया। लेकिन स्कूल और सीबीएसई दोनों की ओर से कोई कदम नहीं उठाए जाने के बाद परिवार को अदालत की शरण लेनी पड़ी।
पैरेंट्स की गलती की सजा नाबालिग को क्यों?
मामले की सुनवाई के बाद जस्टिस महाजन ने कहा कि छात्र पिछले 10 वर्षों से स्कूल में पढ़ रहा है और उसने 10वीं व 11वीं की परीक्षाएं भी पास कर ली हैं। ऐसे में इतने वर्षों के बाद उसके शुरुआती केजी दाखिले को पूरी तरह अमान्य घोषित नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने इस बात पर विशेष ध्यान दिया कि दाखिले के समय छात्र की उम्र केवल चार वर्ष थी और वह नाबालिग है, इसलिए माता-पिता की इस गलती के लिए छात्र को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
भविष्य के करियर और दाखिले की चिंता
हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि भारत और विदेशों के कॉलेजों में दाखिले के लिए 10वीं का सीबीएसई सर्टिफिकेट ही जन्मतिथि का मुख्य आधार माना जाता है। यदि छात्र के 10वीं के सर्टिफिकेट और अन्य सरकारी दस्तावेजों की जन्मतिथि में अंतर रहता है, तो उसे आगे की पढ़ाई के लिए कॉलेज एडमिशन के दौरान भारी समस्याओं, देरी या पहचान से जुड़े संदेह का सामना करना पड़ सकता है।
सीबीएसई के नियमों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि बोर्ड के पास केवल टाइपिंग की मामूली गलतियों को सुधारने का अधिकार है ताकि वे स्कूल रिकॉर्ड से मेल खा सकें। लेकिन, कोर्ट का अधिकार क्षेत्र सीबीएसई के इन प्रशासनिक नियमों तक सीमित नहीं है और न्याय के हित में कोर्ट आवश्यक सुधार का आदेश दे सकता है।

