क्या एक दैनिक वेतन भोगी कर्मचारी जो “लगातार काम” नहीं कर रहा है को नियमित किया जा सकता है? इलाहाबाद हाई कोर्ट का निर्णय

हाल ही में, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने माना है कि सेवा में ब्रेक के आधार पर नियमितीकरण से इनकार करना अवैध है और नियमों का उल्लंघन करता है।

पृष्ठभूमि:

सामाजिक वानिकी विभाग, सिद्धार्थ नगर में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी (माली) के रूप में दैनिक वेतन भोगी कर्मचारी के रूप में कार्यरत याचिकाकर्ता शिव शंकर ने एक आदेश को चुनौती दी जिसके माध्यम से उनके नियमितीकरण से इनकार किया गया था।

याचिकाकर्ता सरकारी विभागों में समूह ‘सी’ और समूह ‘डी’ पदों (उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के दायरे से बाहर) नियम, 2016 पर दैनिक वेतन या कार्य प्रभार पर या अनुबंध पर काम करने वाले व्यक्तियों के यूपी नियमितीकरण नियम के तहत नियमितीकरण की मांग कर रहा था। ।

याची का नियमितीकरण इस आधार पर मन कर दिया गया था की उसने लगातार सेवा नहीं की है और पूरी अवधि के दौरान दो साल का ब्रेक है, जिसे कृत्रिम ब्रेक के रूप में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता था। 

न्यूनतम मजदूरी के दावे के संबंध में, यह माना गया कि याचिकाकर्ता को स्वीकृत पद पर कोई नियुक्ति पत्र जारी नहीं किया गया था इसलिए वह न्यूनतम मजदूरी के अनुदान का हकदार नहीं था। 

हालांकि यहां यह नोट करना जरूरी है कि याचिकाकर्ता नियम के लागू होने की तारीख को काम कर रहा था।

निर्णय

इलाहाबाद उच्च न्यायालय की माननीय न्यायमूर्ति सुनीता अग्रवाल ने कहा:

“निरंतर काम” या “निरंतर रोजगार या तैनाती” शब्द पर न तो विचार किया और न ही नियमों में पढ़ा जा सकता है, क्यूंकि कोर्ट की राय में, इसका कारण यह है कि नियम बनाने वाले प्राधिकारी ने इस स्पष्ट विचार के साथ नियम बनाए थे कि यह उन व्यक्तियों की सेवाओं को नियमित करने के लिए नियम बना रहे है  जो दैनिक वेतन पर विभाग में  तैनात या काम कर रहे थे। कार्य प्रभार पर या अनुबंध पर और दैनिक वेतन पर उनकी नियुक्ति की प्रकृति, विभाग की आवश्यकताओं के कारण, नियमित या निरंतर नहीं हो सकता है। 

कृत्रिम विराम के मुद्दे पर न्यायालय ने कहा:

यह और स्पष्ट किया जाता है कि दैनिक वेतन भोगी कर्मचारी के काम करने की प्रकृति और अवधि को ध्यान में रखते हुए नियमों की आवश्यकता को देखते हुए, सक्षम प्राधिकारी के लिए यह विचार करने के लिए हमेशा खुला है कि क्या लंबे समय तक दो तिथियों के बीच सेवा में विराम, अर्थात प्रारंभिक नियुक्ति की तारीख और नियमों के शुरू होने की तारीख ‘सेवा में विराम’ होगी या इसे किसी दिए गए मामले में ‘कृत्रिम विराम’ के रूप में अनदेखा किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी कर्मचारी ने उपरोक्त दो कट ऑफ तिथियों के बीच कुछ वर्षों में केवल कुछ महीनों के लिए काम किया है, तो उस मामले में ‘सेवा में ब्रेक’ को ‘कृत्रिम ब्रेक’ के रूप में नहीं माना जा सकता है, बल्कि यह ‘सेवा में ब्रेक’ होगा। जहा कर्मचारी के रूप में विभाग को लंबे समय तक उसकी सेवाओं की आवश्यकता नहीं थी, ऐसे मामले में नियमितीकरण के लाभ से इनकार किया जा सकता है। 

इस प्रकार, यह प्रश्न कि ‘कृत्रिम विराम’ क्या होगा, जिसे उम्मीदवार की पात्रता पर विचार करते समय अनदेखा किया जा सकता है, यह किसी विशेष मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करेगा। इस तरह के आकलन के लिए कोई सार्वभौमिक या स्ट्रेट-जैकेट फॉर्मूला नहीं निकाला जा सकता है। प्रत्येक मामले का निर्णय उस मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर, अवलंबी के काम करने की प्रकृति और अवधि को ध्यान में रखते हुए किया जाना है। 

कोर्ट ने आगे कहा कि याचिकाकर्ता की बर्खास्तगी भी अवैध है, क्योंकि यह केवल इस तथ्य पर आगे की गयी थी कि याचिकाकर्ता को नियमितीकरण के लिए उपयुक्त नहीं पाया गया है।

अंतत: न्यायालय ने दोनों आदेशों को रद्द कर दिया और अधिकारियों को 6 महीने के भीतर नियमितीकरण पर विचार करने का निर्देश दिया।

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