आपसी सहमति से बने संबंधों के टूटने के बाद उन्हें आपराधिक रंग देने की बढ़ती प्रवृत्ति पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गहरी चिंता व्यक्त की है। कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि रिश्ते का विफल होना स्वतः ही किसी आपराधिक कृत्य की श्रेणी में नहीं आता। इस टिप्पणी के साथ अदालत ने एक व्यक्ति के खिलाफ दर्ज दुष्कर्म और शारीरिक शोषण के मामले को पूरी तरह से खारिज कर दिया।
यह आदेश न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह की पीठ द्वारा २० मई को पारित किया गया। अदालत ने आरोपी के खिलाफ दायर चार्जशीट, संज्ञान आदेश और पूरी आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की याचिका को स्वीकार कर लिया। कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा कि ऐसे मामलों में अदालती मुकदमों को जारी रखना न्यायिक समय की बर्बादी और कानून का घोर दुरुपयोग है।
यह पूरा मामला भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा ३७६ (दुष्कर्म), ३२३ (स्वेच्छा से चोट पहुंचाना), ३४२ (गलत तरीके से बंधक बनाना) और ५०६ (आपराधिक धमकी) के तहत दर्ज किया गया था।
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति सिंह ने कहा, “अदालत ने ऐसे मामलों में लगातार बढ़ोतरी देखी है जहां लंबे समय तक आपसी सहमति से बने संबंधों में कड़वाहट आने के बाद, आपराधिक न्यायशास्त्र का सहारा लेकर उन्हें अपराध की श्रेणी में खड़ा करने का प्रयास किया जाता है।”
शादी का वादा और रिश्ते का अंत
अभियोजन पक्ष के अनुसार, इस रिश्ते की शुरुआत तब हुई जब आरोपी ने महिला को एक मोबाइल फोन खरीदकर दिया। इसके बाद दोनों के बीच बातचीत शुरू हुई जो धीरे-धीरे घनिष्ठता में बदल गई। महिला का आरोप था कि उनके बीच शादी के वादे के बाद संबंध और गहरे हुए।
महिला ने आरोप लगाया कि जब उसने आरोपी पर शादी का दबाव बनाना शुरू किया, तो वह टालमटोल करने लगा। बाद में उसने जान से मारने की धमकी दी और शादी के झांसे में रखकर जबरन शारीरिक संबंध बनाए। महिला का यह भी दावा था कि जब उसने आरोपी के परिजनों के सामने इसका विरोध किया, तो उसके साथ मारपीट की गई और धमकी दी गई।
दूसरी ओर, आरोपी के वकील ने दलील दी कि दोनों पक्ष पिछले एक साल से आपसी सहमति से रिश्ते में थे। उन्होंने तर्क दिया कि जब आपसी अनबन के कारण यह रिश्ता टूट गया, तो महिला ने प्रतिशोध की भावना से यह प्राथमिकी (FIR) दर्ज कराई।
‘शुरुआत से धोखाधड़ी’ का कोई प्रमाण नहीं
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पूर्व के विभिन्न न्यायिक निर्णयों का हवाला देते हुए ‘शादी के टूटे वादे’ और ‘दुष्कर्म’ के बीच के अंतर को स्पष्ट किया। अदालत ने साफ किया कि जब तक रिश्ते की शुरुआत से ही धोखाधड़ी या छल करने की मंशा साबित न हो, तब तक सहमति से बने शारीरिक संबंधों को दुष्कर्म की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
न्यायालय ने टिप्पणी की, “यह पूरी तरह स्पष्ट है कि यदि दोनों पक्ष लंबे समय से आपसी सहमति से शारीरिक संबंध में थे और उसमें शुरुआत से ही धोखे का कोई तत्व मौजूद नहीं था, तो ऐसा रिश्ता दुष्कर्म नहीं कहलाएगा।”
अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि शादी के हर वादे को शारीरिक संबंध के लिए ‘तथ्य की भूल’ (Misconception of Fact) नहीं माना जा सकता। इसके लिए यह साबित करना अनिवार्य है कि आरोपी की मंशा शुरुआत से ही पूरी तरह से झूठी और धोखेबाज़ थी। चूंकि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में पूरी तरह विफल रहा कि आरोपी की मंशा शुरुआत से ही शादी करने की नहीं थी, इसलिए दुष्कर्म के बुनियादी कानूनी तत्व यहाँ गायब पाए गए।
कोर्ट ने यह भी कहा कि रिश्ते की शुरुआत में शादी का कोई भी कथित वादा कानून की नजर में आधारहीन (Non-est) था, जिससे महिला आरोपी पर आपराधिक विश्वासघात का दावा नहीं कर सकती।
दबाव बनाने के लिए दर्ज कराई गई FIR
इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब पीड़ित महिला का बयान आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा १६४ के तहत दर्ज किया गया। अपने बयान में महिला ने स्पष्ट रूप से आरोपी से शादी करने की अपनी इच्छा व्यक्त की थी।
इसे देखते हुए अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि कानूनी कार्रवाई किसी अपराध के कारण नहीं, बल्कि दबाव बनाने के हथियार के रूप में शुरू की गई थी।
न्यायमूर्ति सिंह ने रेखांकित किया, “पीड़िता के बयान से साफ झलकता है कि यह एफआईआर केवल आरोपी पर शादी के लिए दबाव बनाने के उद्देश्य से दर्ज कराई गई थी।” कोर्ट ने कहा कि महिला आरोपी के व्यवहार से नाराज थी और उसे छोड़ना नहीं चाहती थी।
इसके साथ ही हाईकोर्ट ने मारपीट, बंधक बनाने और धमकी देने के अन्य आरोपों को भी निराधार बताया। अदालत ने इन आरोपों को केवल एफआईआर दर्ज कराने के उद्देश्य से “मनगढ़ंत” माना, क्योंकि इनके समर्थन में कोई भी ठोस साक्ष्य पेश नहीं किया गया था।
अंततः, मामले की सुनवाई जारी रखने को कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग मानते हुए, हाईकोर्ट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा ५२८ के तहत याचिका को स्वीकार किया और आरोपी के खिलाफ चल रहे सभी मुकदमों को निरस्त कर दिया।

