संविधानिक मूल्यों के ‘पथप्रदर्शक’ हैं वकील: मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा, बार की भूमिका लोकतंत्र की रीढ़

 मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने बुधवार को कहा कि भारत के संवैधानिक ढांचे को मजबूत बनाने में बार की भूमिका अपरिहार्य है और वकील वे “पथप्रदर्शक” हैं जो न्यायालयों को संविधान की रक्षा के अपने दायित्व को निभाने में मार्गदर्शन देते हैं।

संविधान दिवस पर सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन द्वारा आयोजित कार्यक्रम को संबोधित करते हुए CJI ने कहा कि न्यायपालिका बार की “अमूल्य भूमिका” को हमेशा स्वीकार करती आई है।

उन्होंने कहा, “जब हम उस निर्णायक क्षण का उत्सव मनाते हैं जब भारत के लोगों ने स्वयं को यह मौलिक संधि प्रदान की थी, तब मैं यह रेखांकित करना आवश्यक समझता हूं कि बार, संविधान की पवित्रता और शासन के नियम को सुदृढ़ करने में अपरिहार्य स्थान रखता है।”

CJI ने आगे कहा कि यदि अदालतों को संविधान का प्रहरी माना जाता है, तो बार के सदस्य वे मशालधारी हैं जो रास्ता रोशन करते हैं। “वे हमें हमारे गम्भीर दायित्व को स्पष्टता और विश्वास के साथ निभाने में सहायता करते हैं,” उन्होंने कहा।

मुख्य न्यायाधीश ने न्याय प्रणाली के “अदृश्य पीड़ितों” का उल्लेख किया — वे लोग जो गरीबी, हाशिये पर होने या कानूनी सहायता के अभाव के कारण न्याय से दूर रह जाते हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे लोगों को इस पीड़ा से बाहर निकालने में बार की भूमिका निर्णायक है।

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उन्होंने कहा, “आपके विचार अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। अपनी पेशेवर प्रतिबद्धता को आप जितनी गंभीरता से निभाते हैं, वही हमारे संवैधानिक भविष्य का निर्माण करती है।”

उन्होंने वकीलों से संवैधानिक आदर्शों को आगे बढ़ाने के लिए सार्थक कदम उठाने का आह्वान किया, जिसमें जरूरतमंदों को कानूनी सहायता देना और राज्य के नीति निदेशक सिद्धांतों की भावना के अनुरूप स्वयं को ढालना शामिल है।

कार्यक्रम में बोलते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि संविधान की सुंदरता इसी में है कि तीनों स्तंभ — न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका — एक-दूसरे से स्वतंत्र रहते हुए भी पारस्परिक संतुलन बनाए रखते हैं।

उन्होंने कहा, “यदि कार्यपालिका संविधान के विपरीत कुछ करती है तो न्यायपालिका को वरीयता मिलती है। लेकिन कोई भी संस्थान न सर्वोच्च है न संप्रभु। केवल संविधान ही सर्वोच्च और संप्रभु है।”

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मेहता ने कहा कि जब भी किसी संस्था ने संवैधानिक नैतिकता से विचलन किया है, न्यायपालिका ने हस्तक्षेप कर शासन को संविधान की मूल भावना की ओर वापस मोड़ा है।

सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने कहा कि कानून तभी सार्थक और आमजन के लिए सुलभ हो सकता है जब तीन क्षेत्र — कानून निर्माण, न्याय वितरण और न्याय तक पहुंच — मजबूत हों।

उन्होंने चुनावों में काले धन और आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों के संसद में पहुंचने पर चिंता जताई। “हमें इस पर गंभीर आत्ममंथन करने की जरूरत है कि सही लोग कैसे चुने जाएं,” उन्होंने कहा।

सिंह ने निचली अदालतों के “दुर्दशाग्रस्त” ढांचे और न्यायाधीशों के प्रशिक्षण की कमी का भी मुद्दा उठाया।

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26 नवंबर को हर वर्ष संविधान दिवस के रूप में मनाया जाता है। 1949 में इसी दिन संविधान सभा ने भारत के संविधान को अंगीकृत किया था। 2015 में केंद्र सरकार ने इसे औपचारिक रूप से संविधान दिवस घोषित किया; इससे पहले यह दिन ‘कानून दिवस’ के रूप में मनाया जाता था।

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