पूर्व अनुमति और सार्वजनिक आपातकाल के बिना फोन टैपिंग के आदेश अवैध: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

वैधानिक सुरक्षा उपायों और संवैधानिक गोपनीयता अधिकारों पर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया है कि आवश्यक क्षेत्राधिकार संबंधी तथ्यों के बिना जारी किए गए और बाद में पिछली तारीख से मंजूर किए गए फोन इंटरसेप्शन आदेश कानूनी रूप से मान्य नहीं हैं। चीफ जस्टिस जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की पीठ ने श्री रावतपुरा सरकार इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज एंड रिसर्च (एसआरआईएसएमआर) के चेयरमैन श्री रवि शंकर जी महाराज के खिलाफ जारी फोन टैपिंग अनुमति आदेशों को रद्द करते हुए इंटरसेप्ट किए गए संदेशों की प्रतियों को नष्ट करने का निर्देश दिया। हालांकि, हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के खिलाफ लंबित आपराधिक कार्यवाही, एफआईआर और चार्जशीट को रद्द करने से इनकार कर दिया और ट्रायल कोर्ट को अन्य कानूनी रूप से स्वीकार्य साक्ष्यों के आधार पर सुनवाई आगे बढ़ाने का निर्देश दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई/एसी-III, नई दिल्ली) द्वारा 30 जून 2025 को दर्ज एफआईआर संख्या आरसी 2182025ए0014 से जुड़ा है। यह एफआईआर भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), 2023 की धारा 61(2), भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 7, 7ए, 8, 9, 10 व 12 और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 66 व 72-ए के तहत दर्ज की गई थी।

सीबीआई ने गुप्त सूचना के आधार पर एफआईआर दर्ज की थी, जिसमें स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के अधिकारियों, राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) के सदस्यों, बिचौलियों और देश भर के निजी मेडिकल कॉलेजों के बीच एक बड़े षड्यंत्र का आरोप लगाया गया था। आरोप था कि 35 संस्थानों में रिश्वत, फर्जी फैकल्टी, फर्जी मरीजों और एईबीएएस प्रणाली से छेड़छाड़ के जरिए निरीक्षण विवरण लीक किए गए और अनुकूल रिपोर्ट हासिल की गईं। इस मामले में याचिकाकर्ता को एसआरआईएसएमआर, रायपुर, छत्तीसगढ़ के चेयरमैन के रूप में आरोपी ए-04 बनाया गया था।

याचिकाकर्ता के खिलाफ अभियोजन पक्ष का मामला मुख्य रूप से सीबीआई निदेशक द्वारा 28 जून 2025 को जारी इंटरसेप्शन आदेश और गृह मंत्रालय द्वारा 4 जुलाई 2025 को दी गई मंजूरी के तहत प्राप्त फोन बातचीत पर आधारित था। याचिकाकर्ता ने शुरुआत में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस), 2023 की धारा 528 के तहत याचिका दायर कर एफआईआर, चार्जशीट संख्या 18/2025, 25 फरवरी 2026 के समन आदेश और विशेष जज (भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम), रायपुर के समक्ष लंबित पूरी आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की मांग की थी। बाद में याचिका में संशोधन कर दूरसंचार अधिनियम, 2023 की धारा 20(2) और दूरसंचार (संदेशों के वैध इंटरसेप्शन की प्रक्रिया और सुरक्षा उपाय) नियम, 2024 के तहत इंटरसेप्शन आदेशों को विशेष रूप से चुनौती दी गई।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता श्री मन्नू शर्मा ने सुनवाई के दौरान अपनी राहत को केवल 28 जून 2025 के इंटरसेप्शन आदेश, 4 जुलाई 2025 के गृह मंत्रालय के पुष्टि आदेश और 15 सितंबर 2025 की समीक्षा समिति की कार्यवाही की वैधता तक ही सीमित रखा। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता अन्य स्वतंत्र साक्ष्यों के आधार पर मुकदमे का सामना करने के लिए तैयार है।

READ ALSO  Mockery of Law and Order: Chhattisgarh High Court Takes Suo Motu Cognizance Over Police Shielding the Powerful in Road Blockage Birthday Bash

उन्होंने तर्क दिया कि दूरसंचार विभाग के सचिव द्वारा दायर हलफनामे में स्पष्ट कहा गया है कि 4 जुलाई 2025 का गृह मंत्रालय का पुष्टि आदेश 1 जून 2025 से 31 जुलाई 2025 की अवधि से संबंधित था। वरिष्ठ वकील ने कहा कि 28 जून 2025 को पहली बार जारी किया गया कोई आदेश 1 जून 2025 से शुरू होने वाली अवधि के लिए पिछली तारीख से मंजूर नहीं किया जा सकता, यानी उस तारीख से 27 दिन पहले जब मूल आदेश अस्तित्व में ही नहीं था। उन्होंने आगे कहा कि दूरसंचार अधिनियम, 2023 की धारा 20(2) भारतीय तार अधिनियम (टेलीग्राफ एक्ट), 1885 की धारा 5(2) के समान है, जिसमें “सार्वजनिक आपातकाल” (पब्लिक इमरजेंसी) या “सार्वजनिक सुरक्षा के हित” की अनिवार्यता शामिल है, जो सीबीआई निदेशक के आदेश में पूरी तरह से नदारद थी। अपनी दलीलों के समर्थन में उन्होंने हुकम चंद श्याम लाल बनाम भारत संघ, पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) बनाम भारत संघ, के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ, के.एल.डी. नागश्री बनाम भारत सरकार, विनीत कुमार बनाम सीबीआई, जतिंदर पाल सिंह बनाम सीबीआई, डॉ. एस.एम. मन्नान बनाम सीबीआई और पी. किशोर बनाम भारत सरकार के सचिव जैसे मामलों में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के फैसलों का हवाला दिया।

सीबीआई की ओर से पेश स्टैंडिंग काउंसिल श्री वैभव ए. गोवर्धन ने दलील दी कि आपातकालीन शक्तियों के तहत दूरसंचार अधिनियम, 2023 की धारा 20(2) का पालन करते हुए वैध रूप से फोन इंटरसेप्ट किया गया था और यह देशव्यापी भ्रष्टाचार जांच का केवल एक हिस्सा था। उन्होंने कहा कि अभियोजन पक्ष के पास स्वतंत्र दस्तावेजी साक्ष्य, डिजिटल रिकॉर्ड, वित्तीय लेनदेन और गवाहों के बयान उपलब्ध हैं। हरियाणा राज्य बनाम भजन लाल, नीहारिका इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड बनाम महाराष्ट्र राज्य और सीबीआई बनाम अरविंद खन्ना का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि कार्यवाही रद्द करने के असाधारण अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल बहुत कम मामलों में किया जाना चाहिए और साक्ष्य की स्वीकार्यता का सवाल ट्रायल कोर्ट पर छोड़ दिया जाना चाहिए।

READ ALSO  “Justice Flows from the Conscience of the Judge”: Chief Justice Ramesh Sinha at Surguja Divisional Judicial Seminar

भारत संघ की ओर से पेश डिप्टी सॉलिसिटर जनरल श्री रमाकांत मिश्रा ने कहा कि 28 जून 2025 का इंटरसेप्शन आदेश कानून के अनुसार जारी किया गया था। उन्होंने स्पष्ट किया कि हलफनामे में 1 जून से 31 जुलाई 2025 की अवधि का उल्लेख केवल गृह मंत्रालय द्वारा समीक्षा समिति को आदेश भेजते समय अपनाए जाने वाले प्रशासनिक समीक्षा चक्र को दर्शाता है, और इसका मतलब यह नहीं है कि पिछली तारीख से फोन टैप किए गए थे। उन्होंने कहा कि 15 सितंबर 2025 को समीक्षा समिति ने आदेश की जांच की और अपनी संतुष्टि दर्ज की।

अदालत का विश्लेषण

वैधानिक ढांचे और संवैधानिक न्यायशास्त्र का विश्लेषण करते हुए हाईकोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि टेलीफोन इंटरसेप्शन संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत निजता के मौलिक अधिकार का एक गंभीर उल्लंघन है। पीठ ने माना कि ऐसे असाधारण कार्यकारी अधिकारों का प्रयोग करने से पहले वैधानिक पूर्व-शर्तों का कड़ाई से पालन होना आवश्यक है।

पीयूसीएल बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का उल्लेख करते हुए अदालत ने टिप्पणी की:

“अधिनियम की धारा 5(2) इसके प्रावधानों के अनुसार संदेशों को इंटरसेप्ट करने की अनुमति देती है। किसी सार्वजनिक आपातकाल (पब्लिक इमरजेंसी) का होना या सार्वजनिक सुरक्षा (पब्लिक सेफ्टी) का हित धारा 5(2) के प्रावधान लागू करने की अनिवार्य शर्त (साइन क्वा नॉन) है। जब तक कोई सार्वजनिक आपातकाल न हुआ हो या सार्वजनिक सुरक्षा का हित इसकी मांग न करे, अधिकारियों को उक्त धारा के तहत शक्तियों का प्रयोग करने का कोई अधिकार नहीं है।”

अदालत ने सीबीआई निदेशक के 28 जून 2025 के इंटरसेप्शन आदेश की जांच की और पाया कि इसमें न तो किसी सार्वजनिक आपातकाल का उल्लेख था और न ही सार्वजनिक सुरक्षा के हित का। आदेश में केवल कानूनी शब्दावली को यांत्रिक रूप से दोहराया गया था, जो विवेक के प्रयोग की कमी को दर्शाता है।

गृह मंत्रालय द्वारा पिछली तारीख से दी गई मंजूरी के मुद्दे पर पीठ ने कहा:

“नियम 3(3)(बी) के तहत मिलने वाली पुष्टि का स्वरूप केवल पुष्टि करने वाला होता है; यह न तो पूर्वव्यापी प्रभाव से अधिकार क्षेत्र पैदा कर सकती है और न ही पहले से जारी की गई अनुमति के दायरे को बढ़ा सकती है।”

पीठ ने स्पष्ट किया कि दूरसंचार अधिनियम, 2023 और 2024 के नियमों के तहत प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपाय वही संवैधानिक भूमिका निभाते हैं जो पहले टेलीग्राफ एक्ट और नियमों के तहत निभाई जाती थी। उत्तर प्रदेश राज्य बनाम सिंघारा सिंह में निर्धारित सिद्धांत का जिक्र करते हुए अदालत ने माना कि जब कानून किसी काम को एक खास तरीके से करने का निर्देश देता है, तो उसे उसी तरीके से किया जाना चाहिए।

READ ALSO  नांदेड़ सेप्टिक टैंक हादसा: बॉम्बे हाईकोर्ट का महाराष्ट्र सरकार को आदेश, पीड़ित परिवारों को 30-30 लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश

अदालत ने माना:

“सक्षम अधिकारी द्वारा वैध अनुमति का होना एक क्षेत्राधिकार संबंधी तथ्य है। जब तक प्रासंगिक तिथि पर ऐसा क्षेत्राधिकार संबंधी तथ्य मौजूद न हो, तब तक न तो गृह मंत्रालय और न ही समीक्षा समिति पूर्व अवधि के लिए इंटरसेप्शन को पूर्वव्यापी रूप से वैध ठहरा सकती है। ऐसे तर्क को स्वीकार करने से वैधानिक सुरक्षा उपायों का पूरा उद्देश्य ही विफल हो जाएगा और प्रक्रियात्मक सुरक्षा बेमानी हो जाएगी।”

अदालत ने यह भी माना कि 15 सितंबर 2025 को समीक्षा समिति द्वारा दी गई मंजूरी किसी बुनियादी क्षेत्राधिकार संबंधी कमी को दूर नहीं कर सकती।

अदालत का निर्णय

हाईकोर्ट ने इंटरसेप्शन कार्यवाही के खिलाफ चुनौती को स्वीकार करते हुए निम्नलिखित निर्देश दिए:

  1. दूरसंचार अधिनियम, 2023 की धारा 20(2) के तहत 28 जून 2025 को जारी इंटरसेप्शन आदेश, 4 जुलाई 2025 का गृह मंत्रालय का पुष्टि आदेश और 15 सितंबर 2025 की समीक्षा समिति की कार्यवाही, जहां तक वे याचिकाकर्ता से संबंधित हैं, रद्द किए जाते हैं।
  2. अमान्य आदेशों के आधार पर प्राप्त इंटरसेप्ट किए गए संदेशों की प्रतियों को नष्ट करने का निर्देश दिया जाता है, यदि इसमें कोई कानूनी बाधा न हो।
  3. 30 जून 2025 की एफआईआर संख्या आरसी 2182025ए0014, 28 अगस्त 2025 की चार्जशीट संख्या 18/2025, 25 फरवरी 2026 के समन आदेश और लंबित आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की मांग अस्वीकार की जाती है।
  4. विशेष जज (भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम), रायपुर को निर्देश दिया जाता है कि वे रद्द की गई इंटरसेप्शन कार्यवाही से प्रभावित हुए बिना, रिकॉर्ड पर उपलब्ध अन्य कानूनी रूप से स्वीकार्य सामग्री के आधार पर कानून के अनुसार मुकदमे की सुनवाई आगे बढ़ाएं।
  5. याचिकाकर्ता को निर्देश दिया जाता है कि वह ट्रायल कोर्ट के साथ पूरा सहयोग करे और सभी तय तारीखों पर उपस्थित रहे।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: श्री रवि शंकर जी महाराज बनाम केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो व अन्य

वाद संख्या: सीआरएमपी संख्या 1504/2026

पीठ: चीफ जस्टिस जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल

निर्णय की तिथि: 03.08.2026

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles