छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि पत्नी कानूनन तय पात्रता पूरी करती है, तो केवल पति की उम्र निर्धारित सीमा से अधिक होने के आधार पर उसे सहायक प्रजनन तकनीक (आईवीएफ) से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने शादी के 22 साल बाद भी संतान सुख से वंचित एक दंपती के पक्ष में फैसला सुनाते हुए संबंधित प्राधिकारियों और एआरटी क्लीनिक को उनका इलाज शुरू करने का निर्देश दिया है।
कानून में संयुक्त आयु प्रतिबंध का नियम नहीं
जस्टिस अमितेन्द्र किशोर प्रसाद की पीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि सहायक प्रजनन प्रौद्योगिकी (विनियमन) अधिनियम की धारा 21(जी) में ऐसा कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है, जो यह कहता हो कि किसी एक जीवनसाथी के तय आयु सीमा पार कर जाने से दूसरा पात्र जीवनसाथी भी इलाज के लिए अयोग्य हो जाएगा।
अदालत के अनुसार, पति की उम्र को पत्नी के उपचार के रास्ते में पूर्ण बाधा मानना कानून में अपनी तरफ से एक संयुक्त आयु सीमा थोपने जैसा होगा, जिसकी मंशा संसद की कतई नहीं थी। पीठ ने रेखांकित किया कि इस तरह की संकीर्ण व्याख्या महिला के प्रजनन अधिकारों को गंभीर रूप से सीमित करती है, जबकि यह अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का अभिन्न अंग है।
अदालत ने यह भी जोड़ा कि नियमों की ऐसी कठोर और यांत्रिक व्याख्या नहीं की जानी चाहिए, जिससे चिकित्सकीय रूप से प्रक्रिया संभव होने और एक साथी के पात्र होने के बावजूद किसी दंपती से अनुचित रूप से माता-पिता बनने का अवसर छिन जाए।
दो दशक से संतान की आस में दंपती
मामले के याचिकाकर्ता दंपती की शादी को करीब 22 साल हो चुके हैं और उनकी कोई जीवित संतान नहीं है। महिला ने पूर्व में वर्ष 2013 में भी इलाज कराया था और 2015 में वह गर्भवती हुई थीं, लेकिन लगभग चार महीने बाद उनका गर्भपात हो गया।
इसके बाद दंपती ने आईवीएफ प्रक्रिया के लिए एआरटी क्लीनिक से संपर्क किया। चिकित्सकीय जांच और काउंसलिंग के बाद डॉक्टरों ने उन्हें इस प्रक्रिया के लिए पूरी तरह उपयुक्त पाया। इसके बावजूद, प्राधिकारियों ने उनकी अर्जी नामंजूर कर दी क्योंकि पति की उम्र 57 वर्ष हो चुकी थी, जो कानूनन पुरुषों के लिए निर्धारित ऊपरी आयु सीमा से अधिक थी।
इच्छा और क्षमता हो तो समय बीतने की दलील बेमानी
अधिकारियों के इस आदेश के खिलाफ दंपती ने हाईकोर्ट की शरण ली। अदालत ने पाया कि 57 वर्षीय पति कानून के विरुद्ध जाकर खुद के लिए कोई पात्रता नहीं मांग रहे हैं, बल्कि वे जरूरी नियमों का पालन करते हुए अपनी पत्नी के इलाज में केवल सहमति और सहयोग दे रहे हैं।
संतान प्राप्ति की मानवीय इच्छा पर टिप्पणी करते हुए अदालत ने कहा, “जहां शरीर सक्षम हो और दिल में चाह बाकी हो, वहां माता-पिता बनने की इच्छा को केवल यह कहकर खारिज नहीं किया जा सकता कि इसका समय बीत चुका है।”
अदालत के निर्देश और जरूरी शर्तें
हाईकोर्ट ने दंपती के आवेदन को खारिज करने वाले प्रशासनिक आदेश को रद्द कर दिया। अदालत ने निर्देश दिया कि यदि महिला सभी चिकित्सकीय मानकों को पूरा करती है और क्लीनिक कानूनी, नैतिक व नियामक सुरक्षा नियमों का पालन करता है, तो दंपती को तत्काल इलाज आगे बढ़ाने की अनुमति दी जाए।
इसके अलावा, प्रक्रिया में लगने वाले समय को देखते हुए पीठ ने यह सुरक्षात्मक निर्देश भी दिया कि यदि इस आदेश के तहत शुरू किए गए इलाज चक्र के दौरान महिला 50 वर्ष की हो जाती है, तो केवल इस आधार पर उसका इलाज बीच में नहीं रोका जाएगा, बशर्ते चिकित्सकीय सलाह और अन्य कानूनी नियम इसकी अनुमति देते हों।

