जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सरकार किसी व्यक्ति से जमीन लेने के बदले उसे स्थायी सरकारी नौकरी देने का वादा नहीं कर सकती। कोर्ट ने कहा कि इस तरह सरकारी नौकरियां देना उन्हें बेचने के समान होगा और यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत सरकारी नियुक्तियों में समान अवसर देने के सिद्धांत के खिलाफ है। हालांकि, हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि जमीन दान करने के बाद 10 साल से अधिक समय तक अस्थायी कर्मचारी के रूप में काम करने वाले लोग संबंधित नियमों के तहत नियमित नियुक्ति का लाभ पाने के हकदार हो सकते हैं।
जस्टिस संजीव कुमार और जस्टिस एम ए चौधरी की डिवीजन बेंच ने यह फैसला जम्मू-कश्मीर प्रशासन और तीन अन्य की याचिका पर सुनाया। इसमें केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) की जम्मू बेंच के 3 फरवरी के आदेश को चुनौती दी गई थी। अधिकरण ने सिंचाई एवं बाढ़ नियंत्रण विभाग में काम कर रहे उन कर्मचारियों को नियमित करने का निर्देश दिया था, जिन्होंने ट्यूबवेल बनाने के लिए सरकार को अपनी जमीन दान की थी।
5 अक्टूबर के अपने आदेश में हाईकोर्ट ने कहा कि सरकारी विभागों में स्थायी नियुक्ति केवल लागू भर्ती नियमों और निष्पक्ष चयन प्रक्रिया के जरिए ही की जा सकती है।
जमीन के बदले सरकारी नौकरी देना पदों को बेचने जैसा
हाईकोर्ट ने कहा कि सरकार या उसके अधिकारियों को यह अधिकार नहीं है कि वे सार्वजनिक कार्यों के लिए जमीन देने वाले किसी व्यक्ति को बदले में स्थायी सरकारी नौकरी देने का वादा करें।
कोर्ट के मुताबिक, सरकारी नौकरियों में नियुक्ति की प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के अनुरूप होनी चाहिए, ताकि सभी पात्र उम्मीदवारों को समान अवसर मिल सके।
बेंच ने टिप्पणी की कि जमीन के बदले स्थायी सरकारी नौकरी देने का वादा करना सरकारी पदों को बेचने के समान है। ऐसी व्यवस्था संविधान और कानून के शासन के अनुरूप नहीं है।
हाईकोर्ट ने बिना विज्ञापन जारी किए और निष्पक्ष चयन प्रक्रिया अपनाए लोगों को दैनिक वेतनभोगी, अस्थायी या संविदा कर्मचारी के रूप में नियुक्त करने की सरकारी व्यवस्था पर भी सवाल उठाए।
कोर्ट ने कहा कि सरकार अपनी पसंद के लोगों को पहले अस्थायी कर्मचारी के रूप में नियुक्त नहीं कर सकती और फिर उन्हें स्थायी नौकरी देने के लिए नियमितीकरण की नीति नहीं बना सकती। बेंच ने ऐसी प्रक्रिया को संविधान के साथ धोखा बताया।
2014 में जमीन दान की, लेकिन स्थायी नौकरी नहीं मिली
यह विवाद वर्ष 2014 से जुड़ा है। उस समय कुछ लोगों ने ट्यूबवेल निर्माण के लिए सरकार को एक-एक कनाल जमीन दान की थी।
जमीन दान करने से संबंधित दस्तावेजों में बदले में सरकारी नौकरी दिए जाने की शर्त शामिल थी। हालांकि, सरकार ने इन लोगों को स्थायी नियुक्ति देने के बजाय सिंचाई एवं बाढ़ नियंत्रण विभाग में अस्थायी कर्मचारियों के रूप में काम पर रखा।
करीब पांच साल बाद, 2019 में इन कर्मचारियों ने अपनी सेवाएं नियमित करने की मांग को लेकर हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 के बाद मामला केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण को स्थानांतरित कर दिया गया।
अधिकरण के सामने सरकार ने कहा कि इन कर्मचारियों की नियुक्ति वर्ष 2017 के नियमों के तहत आती है और पात्रता पूरी करने पर उनके नियमितीकरण पर विचार किया जा सकता है।
10 साल की लगातार सेवा पूरी करने पर नियमित नियुक्ति का प्रावधान
जम्मू-कश्मीर सरकार ने 21 दिसंबर 2017 को अस्थायी कर्मचारियों को नियमित रूप से नियुक्त करने से संबंधित नियम अधिसूचित किए थे।
इन नियमों में ऐसे लोगों को भी शामिल किया गया था, जिन्होंने सरकार को जमीन दान की थी और इसके बाद उन्हें अस्थायी कर्मचारी के रूप में काम पर रखा गया था।
नियमों के अनुसार, निर्धारित शर्तें पूरी करने और लगातार 10 साल की सेवा देने वाले कर्मचारियों के नियमितीकरण पर विचार किया जा सकता है।
जब मामला अधिकरण के सामने आया, तब तक संबंधित कर्मचारियों की सेवा 10 साल से अधिक हो चुकी थी।
इस आधार पर अधिकरण ने माना कि कर्मचारी नियमितीकरण का लाभ पाने के हकदार हैं। उसने उपलब्ध पदों पर लागू सेवा शर्तों के अनुसार उनकी नियुक्ति नियमित करने का निर्देश दिया।
सिर्फ जमीन दान करने से स्थायी नौकरी का अधिकार नहीं मिलता
अधिकरण के फैसले को चुनौती देते हुए जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने हाईकोर्ट में कहा कि जमीन के बदले सरकारी नौकरी देने का वादा जरूरी नहीं कि स्थायी नौकरी देने का वादा हो।
प्रशासन का तर्क था कि कर्मचारियों का नियमितीकरण केवल संबंधित सरकारी नियमों या समय-समय पर जारी आदेशों के तहत ही किया जा सकता है।
वहीं, कर्मचारियों ने कहा कि जमीन दान करने के दस्तावेजों में स्थायी सरकारी नौकरी देने की शर्त थी, न कि केवल अस्थायी कर्मचारी के रूप में काम देने की।
दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जमीन दान करने के आधार पर कोई व्यक्ति सीधे स्थायी सरकारी नौकरी का दावा नहीं कर सकता।
हालांकि, बेंच ने माना कि इस मामले में कर्मचारियों ने 10 साल से अधिक समय तक लगातार काम किया है। इसलिए उन्हें 2017 के नियमों के तहत नियमित नियुक्ति का लाभ मिल सकता है, बशर्ते वे नियमों में तय सभी शर्तें पूरी करते हों।
हाईकोर्ट ने अधिकरण का आदेश बदला, कर्मचारियों को मिलेगा लाभ
हाईकोर्ट ने पाया कि अधिकरण ने अपने फैसले में 2017 के नियमों का उल्लेख तो किया था, लेकिन अंतिम निर्देश में कर्मचारियों को सीधे नियमित नियुक्ति देने का आदेश दे दिया।
बेंच ने कहा कि नियमित नियुक्ति का लाभ नियमों में निर्धारित पात्रता और अन्य शर्तों के अनुसार ही दिया जा सकता है।
इसलिए हाईकोर्ट ने अधिकरण के आदेश को पूरी तरह रद्द करने के बजाय उसमें संशोधन किया।
कोर्ट ने निर्देश दिया कि जिन कर्मचारियों ने अस्थायी या दैनिक वेतनभोगी के रूप में लगातार 10 साल की सेवा पूरी कर ली है, उनके मामलों पर 2017 के नियमों के अनुसार तत्काल विचार किया जाए।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पात्र कर्मचारियों को नियमित नियुक्ति का लाभ उस तारीख से मिलेगा, जिस दिन उन्होंने लगातार 10 साल की सेवा पूरी की थी। इसके साथ ही वे इससे जुड़े अन्य सभी लाभ पाने के भी हकदार होंगे।
इस तरह हाईकोर्ट ने एक ओर जमीन के बदले स्थायी सरकारी नौकरी देने की व्यवस्था को असंवैधानिक माना, वहीं दूसरी ओर लंबे समय से काम कर रहे कर्मचारियों को नियमों के तहत मिलने वाले नियमितीकरण के लाभ से वंचित नहीं किया।

