फार्मास्यूटिकल कंपनियों द्वारा डॉक्टरों को अनैतिक उपहार, यात्रा सुविधाएं और कमीशन देकर दवाएं लिखवाने की प्रथा पर रोक लगाने और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत स्वास्थ्य के मौलिक अधिकार की रक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा कदम उठाया है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने केंद्र सरकार को दो सप्ताह के भीतर एक तीन सदस्यीय उच्चस्तरीय समिति गठित करने का निर्देश दिया है। यह समिति फार्मा उद्योग में अनैतिक मार्केटिंग पर नकेल कसने के लिए एक प्रभावी वैधानिक और विनियामक ढांचा तैयार करने की सिफारिश करेगी। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि समिति सभी संबंधित पक्षों और विशेषज्ञों से व्यापक विचार-विमर्श कर अपनी पहली बैठक के दो महीने के भीतर रिपोर्ट सौंपेगी, जिस पर केंद्र सरकार को जल्द से जल्द तर्कसंगत नीतिगत निर्णय लेना होगा।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला फेडरेशन ऑफ मेडिकल एंड सेल्स रिप्रेजेंटेटिव्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (देश के करीब 300 शहरों में फील्ड वर्कर्स का प्रतिनिधित्व करने वाला पंजीकृत ट्रेड यूनियन), उसके सचिव और जन स्वास्थ्य अभियान के राष्ट्रीय समन्वयक द्वारा अनुच्छेद 32 के तहत दायर रिट याचिका से जुड़ा है। याचिकाकर्ताओं ने शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाते हुए कहा कि दवा कंपनियों द्वारा अपनाई जाने वाली अनैतिक मार्केटिंग प्रथाएं मरीजों के स्वास्थ्य और दवाओं की कीमतों पर सीधा प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं, जो सीधे तौर पर स्वास्थ्य के अधिकार का उल्लंघन है।
याचिका में आरोप लगाया गया कि दवा कंपनियां डॉक्टरों की पर्ची (प्रिस्क्रिप्शन) को प्रभावित करने के लिए उन्हें नकद लाभ, उपहार, घरेलू व विदेशी यात्राएं, आतिथ्य और मनोरंजन के साधन मुहैया कराती हैं। इस वजह से डॉक्टर अक्सर मरीजों को गैर-जरूरी या जरूरत से ज्यादा दवाएं, अतार्किक दवाओं के संयोजन (कॉम्बिनेशन) और अत्यधिक महंगी ब्रांडेड दवाएं लिखते हैं। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि इससे मरीजों पर आर्थिक बोझ तो बढ़ता ही है, साथ ही रोगाणुरोधी प्रतिरोध (एंटीमाइक्रोबियल/एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस) और प्रतिकूल दवा प्रतिक्रियाओं जैसे गंभीर जनस्वास्थ्य संकट भी पैदा होते हैं।
याचिकाकर्ताओं ने मौजूदा नियमों में एक बड़ी विसंगति की ओर ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि इंडियन मेडिकल काउंसिल (प्रोफेशनल कंडक्ट, एटिकेट एंड एथिक्स) रेगुलेशंस, 2002 के तहत यदि कोई डॉक्टर उपहार या प्रलोभन स्वीकार करता है, तो उस पर अनुशासनात्मक कार्रवाई हो सकती है और उसका लाइसेंस भी रद्द हो सकता है। इसके विपरीत, डॉक्टरों को ऐसे प्रलोभन देने वाली फार्मा कंपनियों पर मुकदमा चलाने या उन्हें दंडित करने के लिए कोई बाध्यकारी कानून मौजूद नहीं है। वर्ष 2015 में लाया गया ‘यूनिफ़ॉर्म कोड फ़ॉर फ़ार्मास्युटिकल मार्केटिंग प्रैक्टिसेज’ (यूसीपीएमपी, 2015) महज स्वैच्छिक था, जिसमें किसी उल्लंघन पर दंडात्मक कार्रवाई या जवाबदेही का अभाव था।
पक्षकारों की दलीलें
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता संजय पारिख ने दलील दी कि मार्केटिंग कोड का स्वैच्छिक होना ही इसकी सबसे बड़ी विफलता है। उन्होंने अदालत को बताया कि सितंबर 2022 में भी नीति आयोग के सदस्य (स्वास्थ्य) की अध्यक्षता में कानूनी रूप से बाध्यकारी तंत्र बनाने के लिए एक उच्चस्तरीय समिति बनाई गई थी, जिसे 90 दिनों में रिपोर्ट देनी थी, लेकिन उससे कोई ठोस वैधानिक समाधान निकलकर सामने नहीं आया। हालांकि, वरिष्ठ अधिवक्ता ने साफ किया कि याचिकाकर्ताओं को केंद्र सरकार द्वारा अब प्रस्तावित तीन सदस्यीय समिति के गठन पर कोई आपत्ति नहीं है, क्योंकि नियामक ढांचा तैयार करना कार्यपालिका की नीति का विषय है। उन्होंने केवल यह आग्रह किया कि इस समिति को याचिकाकर्ताओं और सभी हितधारकों के सुझावों को सुनकर एक सार्थक परामर्श प्रक्रिया पूरी करनी चाहिए। हस्तक्षेपकर्ताओं (इंटरवेंशनर्स) के वकीलों ने भी इस दलील का समर्थन किया।
केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय तथा रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय (फार्मास्यूटिकल्स विभाग) की ओर से संयुक्त हलफनामा पेश किया। उन्होंने याचिकाकर्ताओं के इस दावे का खंडन किया कि पुरानी कवायद का कोई नतीजा नहीं निकला। सॉलिसिटर जनरल ने स्पष्ट किया कि वर्ष 2022 में डॉ. वी.के. पॉल की अध्यक्षता वाली समिति ने वैश्विक प्रथाओं के साथ-साथ आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 और औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 के तहत उपलब्ध विकल्पों का गहराई से अध्ययन किया था।
सॉलिसिटर जनरल ने बताया कि उसी समिति की सिफारिशों के आधार पर सरकार ने यूसीपीएमपी, 2024 लागू किया। इस नए कोड में कंपनियों के मुख्य कार्यकारी अधिकारियों (सीईओ) द्वारा अनिवार्य स्व-घोषणा, उपहारों, सैंपल्स और सीएमई कार्यक्रमों पर कड़े प्रतिबंध, ऑडिट तंत्र और फार्मास्युटिकल्स विभाग के सचिव की अध्यक्षता में ‘एपेक्स कमेटी फॉर फार्मा मार्केटिंग प्रैक्टिसेज’ (एसीपीएमपी) का गठन किया गया है। उन्होंने अदालत को अवगत कराया कि सरकार अब एक तीन सदस्यीय समिति बनाने का प्रस्ताव रखती है, जो यह परखेगी कि क्या कंपनियों को जवाबदेह बनाने के लिए किसी अतिरिक्त वैधानिक कानून की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि तब तक यूसीपीएमपी, 2024 लागू रहेगा।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने माना कि यह मामला आम जनता के सुलभ और किफायती इलाज से जुड़ा एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है। अदालत ने रेखांकित किया कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री यह दर्शाती है कि मौजूदा तंत्र अनैतिक प्रथाओं पर पूरी तरह लगाम लगाने में प्रभावी साबित नहीं हुआ है।
सुप्रीम कोर्ट ने नियामक व्यवस्था की प्रभावकारिता पर जोर देते हुए गंभीर टिप्पणी की:
“ऐसे क्षेत्र में जिसका सीधा सरोकार नागरिकों के स्वास्थ्य और कल्याण से है, नियामक ढांचे की प्रभावशीलता का मूल्यांकन केवल निर्धारित नियमों की मौजूदगी से नहीं किया जा सकता; इसे उनकी प्रभावशीलता, क्रियान्वयन और प्रवर्तन के आधार पर भी परखा जाना चाहिए।”
निगरानी और पारदर्शिता की अनिवार्यता को स्पष्ट करते हुए पीठ ने कहा:
“किसी भी नियामक ढांचे की प्रभावशीलता केवल उसमें निर्धारित मानकों और दायित्वों पर ही निर्भर नहीं करती, बल्कि क्रियान्वयन, निगरानी, पारदर्शिता और जवाबदेही के प्रभावी तंत्र की मौजूदगी पर भी समान रूप से निर्भर करती है।”
अदालत ने न्यायिक समीक्षा और कार्यपालिका के अधिकारों के बीच संतुलन पर बात करते हुए शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत को रेखांकित किया:
“इस अदालत को अपने संवैधानिक क्षेत्राधिकार का प्रयोग करते हुए शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत का ध्यान रखना होगा और वह कार्यपालिका की नीतिगत प्राथमिकताओं की जगह अपने विवेक को प्रतिस्थापित नहीं कर सकती।”
इसके साथ ही पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि न्यायिक संयम का अर्थ जनहित के मुद्दों पर आंखें मूंद लेना नहीं है:
“इसके साथ ही, न्यायिक संयम का यह अर्थ कतई नहीं निकाला जा सकता कि अदालत तब भी मूकदर्शक बनी रहे जब उसके सामने मौजूद सामग्री सार्वजनिक स्वास्थ्य और स्वास्थ्य के अधिकार पर सीधा असर डालने वाली गंभीर चिंताओं को उजागर करती हो।”
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सीधे कानून बनाने या नीति तय करने के बजाय अदालत की संवैधानिक भूमिका यह सुनिश्चित करना है कि एक पारदर्शी, संरचित और निष्पक्ष परामर्श प्रक्रिया चले, जिससे उद्योग के वैध हितों और मरीजों के संरक्षण के बीच सही संतुलन साधा जा सके।
अदालत के निर्देश और समयसीमा
सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 21, 32 और 142 के तहत मिली शक्तियों का प्रयोग करते हुए निम्नलिखित निर्देश जारी किए:
- समिति का गठन: केंद्र सरकार यदि पहले से गठित न किया हो, तो इस आदेश की तारीख से दो सप्ताह के भीतर प्रस्तावित तीन सदस्यीय समिति का गठन करे।
- समिति का कार्यक्षेत्र: समिति अनैतिक फार्मास्यूटिकल मार्केटिंग के सभी पहलुओं, मौजूदा कानूनों की पर्याप्तता, वर्तमान निगरानी तंत्र और प्रवर्तन को मजबूत करने के उपायों की समग्र समीक्षा करेगी।
- परामर्श प्रक्रिया: समिति याचिकाकर्ताओं, हस्तक्षेपकर्ताओं और अन्य संबंधित हितधारकों द्वारा रखे गए तथ्यों व सुझावों पर विचार करेगी और उन्हें अपना पक्ष रखने का उचित अवसर देगी।
- विशेषज्ञों का सहयोग: समिति को तकनीकी, चिकित्सा, फार्मास्यूटिकल और अन्य विषय विशेषज्ञों अथवा संस्थानों से परामर्श और सहायता लेने की पूरी स्वतंत्रता होगी।
- रिपोर्ट सौंपने की मियाद: समिति अपनी पहली बैठक की तारीख से दो महीने के भीतर अपनी विस्तृत सिफारिशें केंद्र सरकार को सौंपेगी।
- सरकार का निर्णय: रिपोर्ट मिलने के बाद केंद्र सरकार व्यापक जनहित और अनुच्छेद 21 के जनादेश को ध्यान में रखते हुए शीघ्र ही एक उचित और तर्कसंगत नीतिगत निर्णय लेगी।
- अनुपालन हलफनामा: समिति की दो महीने की अवधि पूरी होने के दो सप्ताह के भीतर केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट में विस्तृत अनुपालन हलफनामा दाखिल करेगी, जिसमें समिति के गठन, बैठकों, परामर्श प्रक्रिया, सिफारिशों और सरकार द्वारा लिए गए निर्णयों का पूरा ब्योरा दर्ज होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के अनुपालन हलफनामे पर विचार करने के लिए इस मामले को 29 जनवरी, 2027 को आंशिक रूप से सुने गए (पार्ट-हर्ड) मामले के तौर पर सूचीबद्ध करने का आदेश दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: फेडरेशन ऑफ मेडिकल एंड सेल्स रिप्रेजेंटेटिव्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया व अन्य बनाम भारत संघ व अन्य
वाद संख्या: रिट याचिका (सिविल) संख्या 323/2021
पीठ: जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता
निर्णय की तिथि: 8 अक्टूबर, 2026

