कलकत्ता हाईकोर्ट ने नागरिकों को ‘उपद्रवी’ बताने वाले चुनाव आयोग के आदेश पर लगाई रोक

चुनावों के दौरान नागरिक स्वतंत्रता की रक्षा की दिशा में एक अहम कदम उठाते हुए, कलकत्ता हाईकोर्ट ने बुधवार को चुनाव आयोग (EC) के एक पुलिस ऑब्जर्वर के उस आदेश पर रोक लगा दी है, जिसमें कई सौ नागरिकों को “उपद्रवी” (troublemakers) की श्रेणी में रखा गया था। कोर्ट ने कहा कि ऑब्जर्वर ने विशिष्ट कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किए बिना “व्यापक निर्देश जारी करने में त्रुटि” की है।

यह मामला एक जनहित याचिका (PIL) के माध्यम से हाईकोर्ट पहुंचा था, जिसमें 21 अप्रैल, 2026 के एक आदेश को चुनौती दी गई थी। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में तैनात एक पुलिस ऑब्जर्वर द्वारा जारी इस आदेश में विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों के लगभग 800 व्यक्तियों को “उपद्रवी” के रूप में चिन्हित किया गया था और अधिकारियों को उनके खिलाफ कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया था।

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता और तृणमूल कांग्रेस सांसद कल्याण बनर्जी ने दलील दी कि इस सूची में सांसद, विधायक और स्थानीय पार्षदों सहित कई निर्वाचित प्रतिनिधि शामिल हैं। बनर्जी ने तर्क दिया कि यह आदेश संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन करता है, जो गारंटी देता है कि कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अलावा किसी भी व्यक्ति को उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जाएगा।

याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि चुनाव आयोग के ज्ञापन में आरोप लगाया गया था कि ये व्यक्ति “मतदाताओं को डराने-धमकाने और चुनावी प्रक्रिया में व्यवधान पैदा करने में सक्रिय रूप से शामिल हैं।” हालांकि, उन्होंने तर्क दिया कि विशिष्ट आपराधिक आरोपों या उचित कानूनी प्रक्रिया के बिना नागरिकों को इस तरह व्यापक रूप से चिन्हित करना असंवैधानिक है।

भारत निर्वाचन आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता डी.एस. नायडू ने तर्क दिया कि आयोग का मुख्य उद्देश्य “स्वतंत्र, निष्पक्ष और शांतिपूर्ण चुनाव” सुनिश्चित करना है। उन्होंने कहा कि यह ज्ञापन पुलिस अधिकारियों को उनके कर्तव्यों की याद दिलाने के लिए था और इसमें कानून का उल्लंघन करने का कोई निर्देश नहीं दिया गया था।

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चीफ जस्टिस सुजय पॉल और जस्टिस पार्थ सारथी सेन की खंडपीठ ने इस कानूनी सवाल की जांच की कि क्या चुनाव आयोग संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत ऐसी सामान्य हिदायतें जारी कर सकता है, जबकि चुनाव से संबंधित अपराध पहले से ही भारतीय न्याय संहिता (BNS) और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 जैसे विशिष्ट कानूनों के दायरे में आते हैं।

खंडपीठ ने टिप्पणी की:

“हमारी राय में, निर्णय के लिए एक महत्वपूर्ण संवैधानिक/कानूनी प्रश्न उभरा है कि क्या संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत शक्ति का प्रयोग करते हुए, चुनाव आयोग वर्तमान निर्देश जैसा सामान्य निर्देश जारी कर सकता है, जबकि चुनाव से संबंधित अपराध वैधानिक रूप से बीएनएस और आरपी अधिनियम, 1951 आदि के तहत कवर किए गए हैं।”

हाईकोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि जहां अधिकारियों के पास व्यवस्था बनाए रखने की शक्ति है, वहीं उन्हें मौजूदा दंडात्मक कानूनों के दायरे में रहकर ही काम करना चाहिए। कोर्ट ने आगे स्पष्ट किया कि “किसी नागरिक की स्वतंत्रता को केवल कानून के तहत निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार ही कम किया जा सकता है।”

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कलकत्ता हाईकोर्ट ने 21 अप्रैल के आदेश के प्रभाव और संचालन पर 30 जून, 2024 तक रोक लगा दी है। हालांकि, खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि यह रोक नामित व्यक्तियों को किसी भी अपराध के लिए छूट नहीं देती है।

कोर्ट ने निर्देश दिया:

“भले ही वे व्यक्ति, जिनके नाम 21 अप्रैल, 2026 के पत्र के एनेक्सचर-ए में हैं, कोई अपराध करते हैं, तो यह अंतरिम आदेश अधिकारियों को कानून के अनुसार अपने स्वतंत्र विवेक से उनके खिलाफ कार्रवाई करने से नहीं रोकेगा।”

खंडपीठ ने आगे यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी “निवारक हिरासत या कार्रवाई” (preventive detention/action) के लिए अधिकारी ऑब्जर्वर के व्यापक वर्गीकरण के बजाय संबंधित हिरासत कानूनों के अनुसार ही आगे बढ़ सकते हैं।

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चुनाव आयोग को अपना जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया गया है। मामले की अगली सुनवाई पांच सप्ताह बाद होगी।

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