बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ के जस्टिस वाई. जी. खोब्रागड़े ने स्पष्ट किया है कि अनुसूचित जाति की किसी महिला की आपत्तिजनक तस्वीरें और वीडियो खींचकर उन्हें व्हाट्सएप जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रसारित करना अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत “सार्वजनिक दृष्टि” (पब्लिक व्यू) के दायरे में आता है। अदालत ने माना कि जहां प्रथम दृष्टया अपराध बनता दिखाई देता है, वहां इस अधिनियम की धारा 18 के तहत अग्रिम जमानत पर वैधानिक रोक लागू होती है। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने अग्रिम जमानत की मांग वाली आपराधिक अपील को खारिज करते हुए कहा कि गिरफ्तारी से बचने और फरार रहने वाला आरोपी अग्रिम जमानत का हकदार नहीं है।
मामले की पृष्ठभूमि
अपीलकर्ता ने विशेष न्यायाधीश (एट्रोसिटीज एक्ट) एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, चंद्रपुर द्वारा 21 फरवरी 2026 को पारित आदेश के खिलाफ एससी/एसटी एक्ट की धारा 14-ए के तहत हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। विशेष अदालत ने चंद्रपुर जिले के घुग्गस पुलिस स्टेशन में दर्ज अपराध संख्या 215/2025 में अपीलकर्ता की अग्रिम जमानत याचिका (एबीए संख्या 73/2026) खारिज कर दी थी।
यह मामला 5 नवंबर 2025 को भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 77 और 78, सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 66(ई) व 67 तथा एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(1)(आर), 3(1)(डब्ल्यू)(ii) और 3(2)(वीए) के तहत दर्ज किया गया था।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, शिकायतकर्ता अनुसूचित जाति से संबंधित एक विवाहित महिला है और वह उसी इलाके में रहती है जहां गैर-एससी/एसटी समुदाय से ताल्लुक रखने वाला आरोपी रहता है। 4 नवंबर 2025 को आरोपी ने पीड़िता से शारीरिक संबंध बनाने की मांग की। पीड़िता द्वारा इस मांग को ठुकरा दिए जाने पर, आरोपी ने उसकी नग्न तस्वीरें और आपत्तिजनक वीडियो रिकॉर्ड कर व्हाट्सएप के जरिए उसके पति, ननद और अन्य करीबी रिश्तेदारों को भेज दिए। इसके अलावा, पीड़िता की बहन को भी आरोपी के मोबाइल नंबर से कॉल और व्हाट्सएप संदेश आए, जिसमें उसने पीड़िता से बात कराने को कहा था।
शुरुआत में आरोपी ने निचली अदालत में अग्रिम जमानत की अर्जी लगाई थी, जिसे खारिज कर दिया गया। इसके बाद उसने हाईकोर्ट में क्रिमिनल अपील संख्या 599/2025 दायर की, लेकिन चार्जशीट दाखिल होने के बाद नई अर्जी दाखिल करने की छूट मांगते हुए 9 फरवरी 2026 को अपील वापस ले ली। चार्जशीट दाखिल होने के बाद, विशेष अदालत ने 21 फरवरी 2026 को उसकी नई जमानत अर्जी (एबीए संख्या 73/2026) फिर खारिज कर दी, जिसके बाद उसने हाईकोर्ट में वर्तमान अपील दायर की। हालांकि हाईकोर्ट ने 12 मार्च 2026 को कुछ शर्तों पर उसे अंतरिम अग्रिम जमानत दी थी, लेकिन मुख्य अपील अंतिम सुनवाई के लिए लंबित थी।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता के वकील ने दलील दी कि यदि एफआईआर की सामग्री को सच भी मान लिया जाए, तो भी इसमें ऐसा कोई आरोप नहीं है कि अपीलकर्ता ने सार्वजनिक दृष्टि में पीड़िता को उसकी जाति के आधार पर अपमानित किया या अपशब्द कहे। वकील ने कहा कि केवल व्हाट्सएप पर तस्वीरें या वीडियो साझा करने से एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(1)(आर), 3(1)(डब्ल्यू)(ii) या 3(2)(वीए) के तहत अपराध नहीं बनता। इसलिए धारा 18 के तहत अग्रिम जमानत पर रोक लागू नहीं होती और निचली अदालत ने जमानत खारिज करने में गलती की है।
इसके विपरीत, राज्य की ओर से अतिरिक्त लोक अभियोजक और पीड़िता के लिए नियुक्त वकील ने अपील का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कहा कि अपराध दर्ज होने के दिन से ही अपीलकर्ता फरार चल रहा था। उन्होंने रेखांकित किया कि अपीलकर्ता को पीड़िता की जाति की पूरी जानकारी थी और शारीरिक संबंध बनाने से इनकार करने पर उसने जानबूझकर ये अश्लील वीडियो और तस्वीरें उसके परिजनों को भेजीं। अभियोजन ने यह भी कहा कि जिस मोबाइल फोन से वीडियो रिकॉर्ड और प्रसारित किए गए, उसे अभी तक जब्त नहीं किया गया है। इसलिए मामले की जांच पूरी करने और मोबाइल की बरामदगी के लिए आरोपी को हिरासत में लेकर पूछताछ करना आवश्यक है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
जस्टिस वाई. जी. खोब्रागड़े ने रिकॉर्ड का अवलोकन करते हुए पाया कि प्रथम दृष्टया यह साफ है कि अपीलकर्ता को पीड़िता की जाति की जानकारी थी और अपनी यौन इच्छाएं पूरी न होने के कारण उसने पीड़िता के नग्न फोटो और वीडियो व्हाट्सएप के जरिए उसके रिश्तेदारों को भेजे।
आरोपी के फरार रहने के पहलू पर अदालत ने कहा कि एफआईआर दर्ज होने के बाद से ही अपीलकर्ता फरार था। सुप्रीम कोर्ट के लवेश बनाम राज्य (एनसीटी दिल्ली) फैसले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि जब कोई आरोपी फरार हो और उसे घोषित अपराधी मान लिया गया हो, तो सामान्यतः अग्रिम जमानत देने का सवाल ही नहीं उठता। अदालत ने माना कि अपीलकर्ता खुद गिरफ्तारी से बच रहा था और जांच अधिकारी के लिए साक्ष्य जुटाने में बाधा उत्पन्न कर रहा था।
इस दलील को खारिज करते हुए कि डिजिटल माध्यम से सामग्री भेजना कानूनन “सार्वजनिक दृष्टि” के दायरे में नहीं आता, अदालत ने टिप्पणी की:
“अपीलकर्ता द्वारा प्रतिवादी संख्या 2/शिकायतकर्ता के आपत्तिजनक वीडियो/तस्वीरें खींचना और उन्हें व्हाट्सएप जैसे सोशल मीडिया के माध्यम से शिकायतकर्ता के पति, उसके करीबी रिश्तेदारों तथा अन्य लोगों को भेजना निश्चित रूप से एट्रोसिटीज एक्ट, 1989 की धारा 3 के अर्थ के भीतर सार्वजनिक दृष्टि के दायरे में आता है।”
12 मार्च 2026 के अपने पहले के अंतरिम आदेश पर अदालत ने स्पष्ट किया कि पूरे रिकॉर्ड पर गौर करने के बाद प्रथम दृष्टया एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(1)(डब्ल्यू)(ii) और 3(2)(वीए) के तहत आवश्यक तत्व मौजूद हैं। सुप्रीम कोर्ट के किरण बनाम राजकुमार जीवराज जैन एवं अन्य फैसले का उल्लेख करते हुए पीठ ने दोहराया कि ऐसे मामलों में एससी/एसटी एक्ट की धारा 18 अग्रिम जमानत दिए जाने पर स्पष्ट वैधानिक रोक लगाती है।
फैसला
निचली अदालत के आदेश में हस्तक्षेप का कोई आधार न पाते हुए हाईकोर्ट ने आपराधिक अपील खारिज कर दी। इसके साथ ही अदालत ने शिकायतकर्ता के नियुक्त वकील की फीस नियमानुसार तय कर भुगतान करने का निर्देश दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: निखिल पिता मधुकर थेपले बनाम महाराष्ट्र राज्य एवं अन्य
वाद संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 127/2026
पीठ: जस्टिस वाई. जी. खोब्रागड़े
निर्णय की तिथि: 29/09/2026

