सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से जुड़े कथित एकतरफा फैसलों के मामले में तत्काल निलंबित करने की मांग पर एकतरफा अंतरिम आदेश देने से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि किसी भी अंतरिम कार्रवाई से पहले चुनाव आयोग और अन्य संबंधित पक्षों को सुना जाना जरूरी है।
भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने केंद्र सरकार, चुनाव आयोग, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी, उप चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग तथा डीजी (आईटी) सीमा खन्ना को नोटिस जारी किया।
कोर्ट ने कहा कि वह पहले आधिकारिक रिकॉर्ड और प्रमाणित जानकारी देखेगा। पीठ ने संकेत दिया कि यदि बाद में किसी फैसले में कानूनी उल्लंघन पाया जाता है तो उसे रद्द किया जा सकता है।
CEC के तत्काल निलंबन पर कोर्ट ने उठाए सवाल
याचिकाकर्ता राकेश कुमार सिंह की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट विकास सिंह ने ज्ञानेश कुमार को तत्काल मुख्य चुनाव आयुक्त के पद से काम करने से रोकने की मांग की।
उन्होंने दलील दी कि SIR से जुड़े कथित एकतरफा फैसले चुनावी लोकतंत्र के लिए गंभीर चिंता पैदा करते हैं।
इस पर पीठ ने पूछा कि यदि मुख्य चुनाव आयुक्त को काम करने से रोक दिया जाए तो चुनाव कौन कराएगा।
विकास सिंह ने जवाब दिया कि अन्य दो चुनाव आयुक्त आयोग के जरूरी कामकाज को संभाल सकते हैं।
CJI सूर्यकांत ने कहा कि आयोग के कामकाज से जुड़ा वैधानिक ढांचा बाध्यकारी है और यदि किसी तरह का उल्लंघन पाया जाता है तो कोर्ट उसे सुधार सकता है।
जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने भी सवाल किया कि चुनाव आयोग को सुने बिना इस तरह की राहत कैसे दी जा सकती है। उन्होंने कहा कि यदि रिकॉर्ड से बाद में यह सामने आता है कि फैसले सर्वसम्मति या बहुमत से नहीं लिए गए थे, तो कोर्ट उनकी वैधता की जांच कर सकता है।
मुख्य न्यायाधीश ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल अखबारों की रिपोर्ट के आधार पर आदेश पारित नहीं किया जा सकता।
14 फैसलों पर दो चुनाव आयुक्तों की आपत्ति का दावा
याचिका में आरोप लगाया गया है कि SIR से जुड़े कम से कम 14 महत्वपूर्ण फैसले चुनाव आयोग के नाम पर लिए गए, जबकि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने उन पर आपत्तियां दर्ज की थीं।
याचिका के अनुसार, ये आपत्तियां अक्टूबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच दर्ज की गईं।
याचिका में दावा किया गया है कि आयोग की मंजूरी के बिना चुनाव आयोग के नाम से संचार जारी किए गए, एक साल से अधिक समय तक बैठकों के एजेंडा और मिनट्स प्रसारित नहीं किए गए और चुनावी रोल से जुड़े सिस्टम में बदलाव दोनों चुनाव आयुक्तों की भागीदारी या मंजूरी के बिना किए गए।
याचिकाकर्ता का कहना है कि संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग को एक बहु-सदस्यीय संवैधानिक संस्था के रूप में दी गई शक्तियों का इस्तेमाल मुख्य चुनाव आयुक्त अकेले नहीं कर सकते।
Form 6 में बदलाव का मुद्दा भी उठाया गया
याचिका में SIR के दौरान Form 6 में कथित बदलाव का मुद्दा भी उठाया गया है।
याचिका के अनुसार, चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने आपत्ति जताई थी कि Registration of Electors Rules, 1960 में संशोधन किए बिना Form 6 में SIR से जुड़ी अतिरिक्त जानकारी मांगी नहीं जा सकती। याचिका में कहा गया है कि बाद में चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने भी इस आपत्ति का समर्थन किया।
याचिका में चुनावी रोल के डेटाबेस के कथित केंद्रीकरण और ERONet/ECINet तक वैधानिक फील्ड अधिकारियों की पहुंच को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं।
इसके मुताबिक, विवेक जोशी ने डेटाबेस एक्सेस क्रेडेंशियल्स के स्वतंत्र ऑडिट का प्रस्ताव दिया था, जबकि सुखबीर सिंह संधू ने सवाल उठाया था कि चुनाव आयोग के डीजी (आईटी) को वैधानिक चुनाव अधिकारियों की उपलब्ध पहुंच सीमित करने का अधिकार किस आधार पर है।
एक अन्य मुद्दा पश्चिम बंगाल के अपीलीय ट्रिब्यूनल में चुनाव आयोग के नाम से दायर अपीलों से जुड़ा है। ये अपीलें उन मतदाताओं के खिलाफ बताई गई हैं जिनके नाम शामिल करने का निर्देश न्यायिक अधिकारियों ने दिया था। याचिका के अनुसार, संधू ने सवाल उठाया था कि इन अपीलों को किसने और किस अधिकार से मंजूरी दी।
धारा 18 के तहत सामूहिक निर्णय प्रक्रिया का हवाला
याचिका में Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners Act, 2023 की धारा 18 पर भरोसा किया गया है।
याचिकाकर्ता का कहना है कि इस प्रावधान के तहत आयोग का काम जहां तक संभव हो सर्वसम्मति से होना चाहिए और मतभेद की स्थिति में फैसला बहुमत से लिया जाना चाहिए।
अंतरिम राहत के तौर पर याचिका में चुनावी रोल से जुड़े डेटा और ऑडिट ट्रेल को सुरक्षित रखने, Form 6 में आगे कोई महत्वपूर्ण बदलाव न करने और मामले के लंबित रहने तक चुनावी डेटा में ऐसे बदलावों पर रोक लगाने की मांग की गई है जिन्हें बाद में वापस न किया जा सके।
याचिका में यह भी मांग की गई है कि ज्ञानेश कुमार को अंतरिम रूप से मुख्य चुनाव आयुक्त के कार्य करने से रोका जाए और आयोग का कामकाज अन्य दो चुनाव आयुक्तों द्वारा संचालित किया जाए।

