दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस संजीव नरूला ने स्पष्ट किया कि बाद में हुई शादी, बच्चे का जन्म और आपसी समझौता किसी नाबालिग के साथ बनाए गए शारीरिक संबंधों को पूर्वव्यापी (retrospective) प्रभाव से वैध नहीं ठहरा सकता और न ही इससे प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसेस एक्ट, 2012 (पॉक्सो) के तहत वैधानिक आपराधिक दायित्व समाप्त हो सकता है। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (बीएनएसएस) की धारा 528 के तहत आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की मांग वाली याचिका को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि बच्चों के संरक्षण के लिए संसद द्वारा तय की गई कानूनी आयु सीमा को बाद के पारिवारिक घटनाक्रमों या व्यक्तिगत रज़ामंदी के आधार पर दरकिनार नहीं किया जा सकता।
मामले की पृष्ठभूमि
इस मामले में आपराधिक कार्यवाही की शुरुआत 6 अप्रैल 2024 को हुई, जब पीड़िता की मां ने दिल्ली के रूप नगर थाने में अपनी बेटी के लापता होने की शिकायत दर्ज कराई। मां को आशंका थी कि उनकी बेटी को बहला-फुसलाकर ले जाया गया है, जिसके आधार पर भारतीय दंड संहिता, 1860 (आईपीसी) की धारा 363 के तहत एफआईआर दर्ज की गई। जब पीड़िता घर से निकली थी, तब उसकी जन्मतिथि (14 सितंबर 2007) के अनुसार उसकी उम्र 16 वर्ष और 7 महीने से कुछ कम थी, जबकि याचिकाकर्ता की उम्र 20 वर्ष (जन्मतिथि 31 जनवरी 2004) थी।
पीड़िता को अक्टूबर 2024 में बरामद किया गया। हिंदू राव अस्पताल में 10 अक्टूबर 2024 को हुए मेडिकल परीक्षण में उसके 28 सप्ताह और 3 दिन के गर्भ की पुष्टि हुई। अगले दिन दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (सीआरपीसी) की धारा 164 के तहत दर्ज अपने बयान में पीड़िता ने कहा कि वह बिना किसी दबाव के अपनी मर्जी से गई थी। उसने याचिकाकर्ता के साथ हैदराबाद, दरभंगा और नेपाल की यात्रा की और दरभंगा में शादी की रस्म भी निभाई, हालांकि उस समय उसने अपनी मां के साथ रहने की इच्छा व्यक्त की थी।
बाद में वह अपनी मां का घर छोड़कर दोबारा चली गई। 20 अगस्त 2025 को याचिकाकर्ता को दरभंगा से गिरफ्तार किया गया, जहां पीड़िता उसके और अपने नवजात बेटे (जन्म दिसंबर 2024) के साथ रह रही थी। पीड़िता 14 सितंबर 2025 को बालिग हुई। इसके दो दिन बाद याचिकाकर्ता की जमानत अर्जी की सुनवाई के दौरान उसने याचिकाकर्ता की रिहाई का विरोध नहीं किया और उसके साथ ही रहने की इच्छा जताई। स्पेशल कोर्ट ने पीड़िता के बयान और याचिकाकर्ता के बेदाग रिकॉर्ड को देखते हुए उसे जमानत दे दी। इसके बाद दोनों पक्षों ने बालिग होने पर 29 सितंबर 2025 को औपचारिक रूप से विवाह कर लिया और मई 2026 में एक समझौता विलेख तैयार किया। जांच पूरी होने के बाद पुलिस ने पॉक्सो की धारा 5(j)(ii) सहपठित धारा 6 के तहत आरोप पत्र (चार्जशीट) दाखिल किया, जो आरोप तय करने के स्तर पर लंबित है।
पक्षकारों की दलीलें
हाईकोर्ट के समक्ष पीड़िता व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हुई और उसने याचिका का समर्थन किया। उसने अपनी जन्मतिथि की पुष्टि करते हुए कहा कि वह अपनी मर्जी से याचिकाकर्ता के साथ गई थी, उसे याचिकाकर्ता से कोई शिकायत नहीं है और वे अपने बच्चे के साथ एक परिवार की तरह खुशी-खुशी रह रहे हैं। पीड़िता की मां ने भी कहा कि उन्होंने शुरुआत में केवल गुमशुदगी की वजह से शिकायत दर्ज कराई थी, लेकिन अब वे इस शादी को स्वीकार कर चुकी हैं और मुकदमे को आगे नहीं बढ़ाना चाहती हैं।
याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि यह रिश्ता शुरू से ही पूरी तरह सहमति पर आधारित था। पीड़िता ने लगातार किसी भी तरह के दबाव से इनकार किया है और यह भी कहा है कि उसने याचिकाकर्ता को अपनी सही उम्र नहीं बताई थी। इस याचिका के संदर्भ में बच्चे का पिता होने की बात स्वीकार करते हुए वकील ने तर्क दिया कि मुकदमे को जारी रखने से इस युवा परिवार पर भारी अनिश्चितता और संकट आ जाएगा, जिससे किसी उद्देश्य की पूर्ति नहीं होगी। याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों—स्टेट ऑफ एमपी बनाम लक्ष्मी नारायण, रामगोपाल एवं अन्य बनाम स्टेट ऑफ एमपी, और विशेष रूप से के. किरुबाकरण बनाम स्टेट ऑफ तमिलनाडु पर भरोसा जताया।
राज्य की ओर से पेश अतिरिक्त लोक अभियोजक (एपीपी) तरंग श्रीवास्तव ने याचिका का विरोध किया। उन्होंने घटना के समय पीड़िता के निर्विवाद रूप से नाबालिग होने, गर्भावस्था के मेडिकल साक्ष्यों और जांच के दौरान जुटाए गए तथ्यों का हवाला देते हुए कहा कि बाद के घटनाक्रम इस मुकदमे को समाप्त करने का आधार नहीं बन सकते।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और प्रमुख टिप्पणियां
जस्टिस नरूला ने पीड़िता के रुख की गंभीरता को समझा और इस याचिका के सीमित उद्देश्य के लिए उसके स्वैच्छिक संबंध के बयान को स्वीकार किया। हाईकोर्ट ने माना कि पीड़िता द्वारा किसी दबाव से इनकार करना जांच के शुरुआती दौर से ही दर्ज है और यह शादी केवल मुकदमे से बचने के लिए रचाया गया कोई हथकंडा नहीं है। इसके बावजूद, हाईकोर्ट ने जोर देकर कहा कि सहमति या रज़ामंदी कानूनन तय आपराधिक दायित्व को खत्म नहीं कर सकती:
“पॉक्सो की धारा 2(1)(डी) के तहत 18 वर्ष से कम आयु के व्यक्ति को बच्चा माना गया है। धारा 3 के अंतर्गत किसी बच्चे के साथ किए गए पेनेट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट में सहमति का अभाव कोई आवश्यक घटक नहीं है। इसी तरह आईपीसी की धारा 375 का छठा खंड 18 वर्ष से कम उम्र की लड़की के साथ शारीरिक संबंध को अपराध मानता है, चाहे सहमति हो या न हो। रज़ामंदी रिश्ते की व्याख्या तो कर सकती है, लेकिन यह कथित कृत्य को कानून के दायरे से बाहर नहीं ले जाती।”
संसद द्वारा तय किए गए एक समान सुरक्षा मानक पर टिप्पणी करते हुए हाईकोर्ट ने कहा:
“कानून यह नहीं मानता कि सभी बच्चों में एक जैसी समझ या परिपक्वता होती है। फिर भी संसद ने एक समान आयु सीमा तय की है, न कि हर मामले में यह जांच करने का विकल्प चुना कि किसी बच्चे में इतनी समझ थी या नहीं कि उसे कानून के संरक्षण से बाहर कर दिया जाए। अदालत संसद के इस विधायी चयन की जगह बच्चे की परिपक्वता के अपने मूल्यांकन को प्रतिस्थापित नहीं कर सकती।”
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि बहलाने-फुसलाने (ग्रूमिंग), धोखे या जबरन बल प्रयोग का अभाव किसी बच्चे के साथ शारीरिक संबंध के आरोप का कानूनी बचाव नहीं बन सकता:
“एक स्थायी रिश्ता पूर्वव्यापी रूप से कानूनी सहमति नहीं दे सकता।”
पीड़िता के “लगभग अठारह वर्ष” की होने के तर्क को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने नोट किया कि घर छोड़ते समय वह बालिग होने से करीब 17 महीने छोटी थी। सुप्रीम कोर्ट के फैसले स्टेट ऑफ उत्तर प्रदेश बनाम अनुरुद्ध का उल्लेख करते हुए, जिसमें केंद्र सरकार को किशोरवय प्रेम संबंधों के लिए “रोमियो-जूलियट” क्लॉज पर विचार करने का सुझाव दिया गया था, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह केवल एक सुझाव था और इसने मौजूदा कानून में कोई अपवाद नहीं जोड़ा है। ऐसा कोई भी अपवाद तय करना पूरी तरह संसद का विधायी क्षेत्राधिकार है।
विवाह के कानूनी प्रभाव की जांच करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 (पीसीएमए) की धारा 3 किसी बच्चे के साथ शारीरिक संबंध बनाने की अनुमति नहीं देती। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों इंडिपेंडेंट थॉट बनाम भारत संघ और सोसायटी फॉर एनलाइटनमेंट एंड वॉलंटरी एक्शन बनाम भारत संघ का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा:
“विवाह उस संरक्षण को समाप्त नहीं करता जो कानून एक बच्चे को प्रदान करता है।”
बीएनएसएस की धारा 528 के तहत अपनी अंतर्निहित शक्तियों के दायरे का विश्लेषण करते हुए हाईकोर्ट ने लक्ष्मी नारायण और रामगोपाल के फैसलों को अलग बताया और कहा कि बच्चों के खिलाफ यौन अपराध निजी या वैवाहिक विवाद नहीं होते। कोर्ट ने इन री: राइट टू प्राइवेसी ऑफ एडोलेसेंट्स का भी उल्लेख किया, जहां सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि रोमांटिक रिश्ता पॉक्सो के अनिवार्य कानूनी तत्वों को नहीं बदल सकता और अदालतें कानून के खिलाफ नहीं जा सकतीं।
हाईकोर्ट ने उन पिछले फैसलों के अंतर को भी स्पष्ट किया जहां कार्यवाहियां रद्द की गई थीं:
- अय्यूब मलिक बनाम उत्तराखंड राज्य में उम्र पर विवाद था और लगभग छह साल का वैवाहिक जीवन बीत चुका था, जबकि वर्तमान मामले में पीड़िता का नाबालिग होना और नाबालिग रहते हुए ही गर्भधारण करना रिकॉर्ड पर निर्विवाद है।
- महेश मुकुंद पटेल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य में रिकॉर्ड से यह साबित हो चुका था कि कथित अपराध के समय महिला बालिग थी।
- दिल्ली हाईकोर्ट की समन्वय पीठ द्वारा दिए गए हरमीत सिंह बनाम दिल्ली राज्य के फैसले में पीड़िता की उम्र अधिक (लगभग 17 साल 2 महीने) थी और राज्य ने कार्यवाही रद्द करने पर स्पष्ट रूप से कोई आपत्ति नहीं जताई थी।
- हाईकोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के ही अन्य फैसलों—प्रिंस कुमार शर्मा बनाम दिल्ली राज्य और मोहम्मद दिलशाद उर्फ आदिल बनाम राज्य के दृष्टिकोण से सहमति जताई, जिनमें यह माना गया था कि बाद में हुई शादी और बच्चे का जन्म नाबालिग अवस्था में किए गए अपराध के कानूनी घटकों को नहीं मिटा सकते।
याचिकाकर्ता द्वारा दिए गए के. किरुबाकरण बनाम तमिलनाडु राज्य और इन री: राइट टू प्राइवेसी ऑफ एडोलेसेंट्स (2025) के संदर्भ पर हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि उन मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत मिली अपनी असाधारण शक्तियों का उपयोग करके राहत दी थी और स्पष्ट निर्देश दिया था कि उन्हें नज़ीर न माना जाए। इंडियन बैंक बनाम एबीएस मरीन प्रोडक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड के आधार पर हाईकोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 142 के आदेशों को बीएनएसएस की धारा 528 के तहत एक सामान्य नियम के रूप में लागू नहीं किया जा सकता।
कानून के मूल सिद्धांत को रेखांकित करते हुए हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:
“दिए गए तर्कों के आधार पर मुकदमे को समाप्त करने का मतलब यह होगा कि बाद में हुई शादी, मातृत्व-पितृत्व और परिवार की स्वीकृति को उस संरक्षण पर तरजीह दे दी जाए जो उसे एक बच्चे के रूप में प्राप्त था। वह संरक्षण केवल इस बात पर निर्भर नहीं हो सकता कि कोई रिश्ता टिकता है या उसे अंततः मंज़ूरी मिल जाती है।”
हाईकोर्ट का निर्णय
दिल्ली हाईकोर्ट ने कार्यवाही रद्द करने की याचिका खारिज करते हुए कहा कि यह मुकदमा स्पष्ट रूप से झूठा, दुर्भावनापूर्ण या अदालती प्रक्रिया का दुरुपयोग साबित नहीं हुआ है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस आदेश की सभी टिप्पणियां केवल कार्यवाही रद्द करने की अर्जी तक ही सीमित हैं।
हाईकोर्ट ने स्पेशल कोर्ट को निर्देश दिया कि वह हाईकोर्ट की किसी भी प्रथम दृष्ट्या टिप्पणी से प्रभावित हुए बिना, आरोपों, साक्ष्यों और कानून में उपलब्ध हर बचाव पर स्वतंत्र रूप से विचार करे। हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस याचिका के खारिज होने से याचिकाकर्ता को पहले से मिली जमानत पर कोई असर नहीं पड़ेगा और याचिकाकर्ता अपने परिवार की असाधारण परिस्थितियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अनुच्छेद 142 के तहत राहत पाने के लिए जाने को स्वतंत्र है।

