बॉम्बे हाई कोर्ट : रजिस्ट्रार ‘जटिल मामला’ बताकर अधिकार क्षेत्र से नहीं बच सकता

बॉम्बे हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सहकारी समितियों के रजिस्ट्रार किसी मामले को “अत्यधिक जटिल” बताकर अपने वैधानिक दायित्व से नहीं बच सकते। अदालत ने कहा कि महाराष्ट्र सहकारी समितियां अधिनियम, 1960 के तहत बकाया राशि की वसूली के लिए एक त्वरित और प्रभावी तंत्र उपलब्ध है, जिसे ईमानदारी से लागू किया जाना चाहिए।

यह आदेश सराफ कास्कर इंडस्ट्रियल प्रिमाइसेस को-ऑपरेटिव सोसाइटी लिमिटेड की याचिका पर आया, जिसने 1982 से बकाया रखरखाव राशि वसूलने के लिए आवेदन किया था। सोसाइटी ने उप-रजिस्ट्रार से वसूली की मांग की थी, लेकिन रजिस्ट्रार ने यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिया कि मामला “जटिल कानूनी प्रश्नों” से जुड़ा है और इसके लिए सहकारी अदालत में पूरा मुकदमा चलाना होगा।

रजिस्ट्रार का कहना था कि कुछ सदस्यों ने आंशिक भुगतान किए थे जो सोसाइटी के खातों में दर्ज नहीं थे, रिकॉर्ड स्पष्ट नहीं थे और सोसाइटी ने दशकों तक कोई कार्रवाई नहीं की, जिसका कोई ठोस कारण नहीं बताया गया।

न्यायमूर्ति अमित बोरकर ने रजिस्ट्रार के आदेश को रद्द करते हुए कहा कि अधिनियम के तहत निर्धारित प्रावधान का उद्देश्य सोसाइटियों को बकाया वसूली के लिए तेज और प्रभावी उपाय उपलब्ध कराना है। यह प्रावधान रजिस्ट्रार को अधिकार देता है कि वह सोसाइटी के बकाए को भूमि राजस्व की तरह मानकर वसूली प्रमाणपत्र जारी करे, बशर्ते कि सोसाइटी अपने खाते और सहायक दस्तावेज पेश करे।

अदालत ने स्पष्ट किया कि यह कार्यवाही संक्षिप्त प्रकृति की होती है, जिसमें मुख्य रूप से खाते, रसीदें, प्रस्ताव और नियमित रूप से रखे गए अन्य अभिलेखों पर भरोसा किया जाता है। इसके लिए पूर्ण मुकदमा, गवाहों की जिरह या लंबी सुनवाई आवश्यक नहीं है।

न्यायालय ने कहा, “रजिस्ट्रार से अपेक्षा है कि वह दोनों पक्षों द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों का गंभीरता से परीक्षण करे। वह न तो निराधार आपत्तियों के कारण वसूली को बाधित होने दे सकता है और न ही अभिलेखों से समर्थित वास्तविक विवादों को नज़रअंदाज़ कर सकता है।”

न्यायमूर्ति बोरकर ने आगे कहा, “रजिस्ट्रार अपने वैधानिक दायित्व से बचने के लिए मामले को जटिल बताने जैसी अस्पष्ट टिप्पणियों का सहारा नहीं ले सकता। जब तक विवाद स्पष्ट रूप से संक्षिप्त जांच के दायरे से बाहर न हो, तब तक रजिस्ट्रार को दस्तावेज़ों के आधार पर तय करना होगा कि बकाया राशि देय है या नहीं।”

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अदालत ने उप-रजिस्ट्रार के आदेश को गलत ठहराते हुए निरस्त कर दिया और निर्देश दिया कि दोनों पक्ष 29 सितंबर को के-वेस्ट वार्ड के उप-रजिस्ट्रार के समक्ष उपस्थित हों। अदालत ने कहा कि रजिस्ट्रार तीन महीने के भीतर मामले का निपटारा करे और दोनों पक्षों को निष्पक्ष सुनवाई का अवसर देकर प्रस्तुत दस्तावेज़ों के आधार पर निर्णय दर्ज करे।

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