बीबीएमबी बिजली बकाया विवाद: पंजाब केंद्र के कैशलेस फॉर्मूले को मानने के करीब, सुप्रीम कोर्ट में 20 अगस्त को अगली सुनवाई

भाखड़ा ब्यास प्रबंध बोर्ड (बीबीएमबी) की परियोजनाओं से जुड़े दशकों पुराने बिजली बकाए के निपटारे को लेकर एक महत्वपूर्ण प्रगति सामने आई है। केंद्र सरकार ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट को अवगत कराया कि पंजाब सरकार हिमाचल प्रदेश के लंबित बकाए का समाधान करने के लिए प्रस्तावित फॉर्मूले को स्वीकार करने के बेहद करीब है।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ के समक्ष सुनवाई के दौरान महान्यायवादी आर. वेंकटरमणी ने बताया कि संबंधित राज्यों के बीच सहमति बन रही है और बचे हुए मतभेदों को तेजी से सुलझाया जा रहा है। हिमाचल प्रदेश की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने अदालत को सूचित किया कि पीठ ने पंजाब के रुख का मूल्यांकन करने के लिए ही आज का दिन निर्धारित किया था। शीर्ष अदालत ने मामले की अंतिम स्थिति की समीक्षा के लिए अगली सुनवाई 20 अगस्त तय की है।

कैशलेस समझौते का प्रस्ताव और वित्तीय समायोजन

केंद्र सरकार द्वारा तैयार किए गए नए ढांचे के तहत बिजली के बकाए का निपटारा नकद भुगतान के बजाय ऊर्जा आवंटन के आधार पर किया जाएगा। पंजाब और हरियाणा द्वारा हिमाचल प्रदेश को दिए जाने वाले कुल 13,066 मिलियन यूनिट बकाए में से 12,000 मिलियन यूनिट से अधिक बिजली का समायोजन इसी कैशलेस व्यवस्था से होगा।

इसके अलावा, हिमाचल प्रदेश को पंजाब और हरियाणा को दिए जाने वाले लगभग 420 करोड़ रुपये के पूंजीगत शुल्क (कैपिटल कॉस्ट) के भुगतान से छूट दी जाएगी। इस राशि को 13,066 मिलियन यूनिट के संचित बिजली बकाए के एवज में ही सीधे समायोजित किया जाएगा। केंद्र का कहना है कि पंजाब पुनर्गठन अधिनियम, 1966 के कड़े प्रावधानों के कारण समाधान संभव नहीं हो पा रहा था, इसलिए गैर-मौद्रिक तरीका अपनाना आवश्यक हो गया था।

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पंजाब की आपत्तियां और अदालत की टिप्पणी

इससे पहले 30 जुलाई की सुनवाई के दौरान हिमाचल प्रदेश और हरियाणा ने केंद्र के फॉर्मूले पर सैद्धांतिक सहमति व्यक्त की थी, जबकि पंजाब ने दर को लेकर विरोध जताया था। पंजाब सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता निदेश गुप्ता ने तर्क दिया था कि 2.50 रुपये प्रति यूनिट की प्रस्तावित दर अत्यधिक है, जिससे राज्य को करीब 2,000 करोड़ रुपये का वित्तीय नुकसान होगा।

अदालत ने उस समय पंजाब सरकार के ढुलमुल रवैये पर सख्त नाराजगी व्यक्त की थी और अतीत में अदालती फैसलों का पालन न करने के इतिहास का उल्लेख किया था। पीठ ने स्पष्ट किया था कि यदि पंजाब सौहार्दपूर्ण समाधान पर सहमत नहीं होता है, तो अदालत मामले का फैसला उसके गुण-दोष के आधार पर करेगी।

दशकों पुराना बिजली बंटवारा विवाद

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यह विवाद 1966 में पंजाब के पुनर्गठन के बाद परिसंपत्तियों के बंटवारे से उत्पन्न हुआ था। हिमाचल प्रदेश ने 1996 में सुप्रीम कोर्ट में मूल वाद दायर कर उत्तराधिकारी राज्य के रूप में बीबीएमबी की परियोजनाओं में 7.19 प्रतिशत हिस्सेदारी का दावा किया था।

मामले में 27 सितंबर 2011 को सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए हिमाचल प्रदेश की हिस्सेदारी 7.19 प्रतिशत तय की थी, जबकि पंजाब को 51.80 प्रतिशत, हरियाणा को 37.51 प्रतिशत और केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ को 3.50 प्रतिशत हिस्सा आवंटित किया था। इस निर्णय के अनुसार हिमाचल को भाखड़ा परियोजना से 1 नवंबर 1966, देहर परियोजना से नवंबर 1977 और पोंग बांध परियोजना से जनवरी 1978 से पूर्वव्यापी प्रभाव से अपना हिस्सा पाने का अधिकार दिया गया।

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बोर्ड द्वारा 1 नवंबर 2011 से हिमाचल प्रदेश को उसका 7.19 प्रतिशत बिजली हिस्सा दिया जा रहा है, लेकिन पंजाब और हरियाणा ने उससे पहले की अवधि के 13,066 मिलियन यूनिट बकाए का भुगतान नहीं किया है। हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने 13 जुलाई को कहा था कि राज्य को एक दशक से अधिक समय से उसके अधिकार और वित्तीय लाभों से वंचित रखा गया है तथा लगभग 4,200 करोड़ रुपये के बकाया राजस्व को वसूलने के लिए कानूनी व प्रशासनिक प्रयास जारी हैं।

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