न्यायिक फाइलों का गुम होना गंभीर कदाचार, इसे सख्ती से निपटने की जरूरत; इलाहाबाद हाईकोर्ट ने क्लर्क की याचिका खारिज की

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने न्यायिक फाइल गुम होने के मामले में एक कोर्ट क्लर्क की उस रिट याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उसकी चार वेतन वृद्धियों (increments) को संचयी प्रभाव (cumulative effect) से रोकने के अनुशासनात्मक आदेश को चुनौती दी गई थी। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि न्यायिक रिकॉर्ड का खोना एक गंभीर मामला है जो न्याय के प्रशासन को प्रभावित करता है।

याचिकाकर्ता महावीर सागर, जो रामपुर जिला न्यायपालिका में क्लर्क के रूप में कार्यरत थे, ने 2007 के अनुशासनात्मक आदेश और 2011 के अपीलीय आदेश को रद्द करने की मांग करते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। अनुशासनात्मक प्राधिकारी ने उनकी निगरानी में एक न्यायिक फाइल गुम होने के बाद उन्हें गंभीर कदाचार का दोषी पाया था। जस्टिस अनीश कुमार गुप्ता ने सजा को बरकरार रखते हुए कहा कि अनुशासनात्मक मामलों में न्यायिक समीक्षा का दायरा सीमित है और दी गई सजा दोष की गंभीरता के अनुरूप थी।

मामले की पृष्ठभूमि

मामले की शुरुआत तब हुई जब मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM), रामपुर ने शिकायत दर्ज कराई कि वर्ष 2005 के शिकायत केस संख्या 240 की फाइल कार्यालय में उपलब्ध नहीं है। फाइल को खोजने के निर्देश और कई अवसर दिए जाने के बावजूद, उसका पता नहीं चल सका।

प्रारंभिक जांच में यह पाया गया कि जिस समय फाइल गायब हुई, उस समय याचिकाकर्ता ही संबंधित क्लर्क थे। इसके बाद, याचिकाकर्ता के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू की गई। उन पर ‘उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक आचरण नियमावली, 1956’ के नियम-3 के तहत गंभीर कदाचार का आरोप लगाया गया। 3 अक्टूबर 2007 को कारण बताओ नोटिस और याचिकाकर्ता के जवाब के बाद, अनुशासनात्मक प्राधिकारी ने 23 अक्टूबर 2007 को याचिकाकर्ता की चार वेतन वृद्धियों को संचयी प्रभाव से रोकने का आदेश पारित किया। इस आदेश के खिलाफ दायर अपील को प्रशासनिक न्यायाधीश (अपीलीय प्राधिकारी) ने 11 मार्च 2011 को खारिज कर दिया था।

पक्षों के तर्क

याचिकाकर्ता के विद्वान वकील ने तर्क दिया कि जांच अधिकारी के निष्कर्ष गलत थे। यह तर्क दिया गया कि हालांकि कार्य विभाजन का आदेश था, लेकिन उसका कभी कड़ाई से पालन नहीं किया गया, जिससे याचिकाकर्ता की विशिष्ट जिम्मेदारी पर “गंभीर संदेह” पैदा होता है। याचिकाकर्ता ने आगे दावा किया कि जांच अधिकारी ने उन्हें दोषी ठहराने से पहले यह निश्चित रूप से पता नहीं लगाया कि फाइल खोने के लिए वास्तव में कौन जिम्मेदार था। हालांकि, हाईकोर्ट ने नोट किया कि याचिकाकर्ता कार्यवाही में किसी भी प्रक्रियात्मक दोष को बताने में विफल रहे।

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इसके विपरीत, उत्तरदाताओं (राज्य और न्यायपालिका) के वकील ने तर्क दिया कि न्यायिक समीक्षा का दायरा सीमित है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अनुशासनात्मक कार्यवाही के दौरान उचित प्रक्रिया का पालन किया गया, याचिकाकर्ता को अपना बचाव करने का पूरा अवसर दिया गया और दी गई सजा उनके दोष के अनुपात में थी।

कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

अभिलेखों की समीक्षा करने के बाद, हाईकोर्ट ने न्यायिक फाइलों के गुम होने की गंभीरता पर जोर दिया। जस्टिस अनीश कुमार गुप्ता ने कहा:

“न्यायपालिका के रिकॉर्ड से न्यायिक फाइल का विस्थापन या नुकसान बहुत गंभीर आरोप है, जो न्याय के प्रशासन को प्रभावित करता है और इससे लोहे की छड़ (सख्ती) के साथ निपटने की आवश्यकता है।”

कोर्ट ने पाया कि जांच अधिकारी ने याचिकाकर्ता को पर्याप्त अवसर देने के बाद विस्तृत जांच की थी। यह स्थापित किया गया कि फाइल गुम होने के लिए याचिकाकर्ता ही जिम्मेदार थे, जो 1956 की नियमावली के नियम-3 के तहत कदाचार की श्रेणी में आता है।

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पीठ ने आगे निम्नलिखित बातें नोट कीं:

  • जांच रिपोर्ट कारण बताओ नोटिस के साथ याचिकाकर्ता को साझा की गई थी।
  • अनुशासनात्मक प्राधिकारी ने दंड आदेश पारित करने से पहले याचिकाकर्ता के जवाब पर विस्तार से विचार किया था।
  • प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन या प्रक्रियात्मक अनियमितता का कोई आरोप नहीं था।
  • ऐसा कोई तर्क नहीं दिया गया जिससे लगे कि सजा याचिकाकर्ता के दोष के अनुपात में नहीं थी।

न्यायालय का निर्णय

यह दोहराते हुए कि न्यायिक समीक्षा का दायरा “बहुत सीमित” है, हाईकोर्ट को अनुशासनात्मक प्राधिकारी और अपीलीय प्राधिकारी द्वारा पारित आदेशों में कोई अवैधता नहीं मिली। याचिका में कोई योग्यता न पाते हुए, हाईकोर्ट ने रिट याचिका को खारिज कर दिया।

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मामले का विवरण:

  • केस टाइटल: महावीर सागर बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य
  • केस संख्या: रिट – ए संख्या 46382 वर्ष 2011
  • पीठ: जस्टिस अनीश कुमार गुप्ता
  • दिनांक: 3 अप्रैल, 2026

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