पिता ही है बच्चे का प्राकृतिक संरक्षक, ननिहाल से बच्चे को पिता के सुपुर्द करने का इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बंदी प्रत्यक्षीकरण (habeas corpus) याचिका को स्वीकार करते हुए निर्देश दिया है कि 13 महीने के मासूम की कस्टडी उसके पिता को सौंपी जाए। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून के तहत पिता ही बच्चे का प्राकृतिक संरक्षक है और किसी भी प्रतिकूल सामग्री के अभाव में वह बच्चे के पालन-पोषण के लिए सबसे उपयुक्त व्यक्ति है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला विपिन कुमार पांडेय द्वारा दायर किया गया था, जिनकी पत्नी दीपिका पांडेय का निधन 10 फरवरी 2025 को हो गया था। पत्नी की मृत्यु के बाद से उनका पुत्र, अक्षित पांडेय, प्रतिवादी संख्या 4 और 5 (बच्चे के मौसा-मौसी) की कस्टडी में था। याचिकाकर्ता ने अपने नाबालिग पुत्र की कस्टडी की मांग करते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। कोर्ट के पिछले आदेश के अनुपालन में बच्चे को मऊ पुलिस द्वारा अदालत में पेश किया गया।

पक्षकारों के तर्क

याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि ‘हिंदू अल्पसंख्यक और संरक्षकता अधिनियम’ की धारा 6 के तहत पिता ही प्राकृतिक और कानूनी संरक्षक है। यह दलील दी गई कि याचिकाकर्ता आर्थिक रूप से संपन्न है और बच्चे की समुचित परवरिश के लिए पूरी तरह सक्षम है। इसके अलावा, याचिकाकर्ता की बहन, श्रीमती सुनीता पांडेय, जो एक अनुभवी गृहिणी हैं, ने भी बच्चे की देखभाल में सहायता करने का आश्वासन दिया।

दूसरी ओर, निजी प्रतिवादियों ने विरोध करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता की पत्नी की मृत्यु एक असफल आईवीएफ (IVF) प्रक्रिया के दौरान हुई थी, जो पिता के आचरण पर संदेह उत्पन्न करती है। उन्होंने तर्क दिया कि बच्चा समय से पहले (premature) पैदा हुआ था और उसे विशेष देखभाल की आवश्यकता है, जो उसकी मौसी बेहतर तरीके से कर रही हैं। हालांकि, प्रतिवादियों ने स्वीकार किया कि याचिकाकर्ता के विरुद्ध कोई आपराधिक मामला लंबित नहीं है।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

न्यायमूर्ति संदीप जैन ने सुप्रीम कोर्ट के तेजस्विनी गौड़ बनाम शेखर जगदीश प्रसाद तिवारी (2019) और गौतम कुमार दास बनाम एनसीटी दिल्ली (2024) मामलों का संदर्भ लिया। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कोई व्यक्ति कानूनी अधिकार के बिना नाबालिग को अपनी कस्टडी में रखता है, तो उसे अवैध हिरासत माना जाएगा।

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हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में अवलोकन किया:

“केवल इस तथ्य को कि मृत्यु एक असफल आईवीएफ प्रक्रिया के दौरान हुई थी, याचिकाकर्ता की किसी गलती के रूप में नहीं देखा जा सकता और न ही इसके आधार पर उसे अपने नाबालिग बच्चे की कस्टडी से वंचित किया जा सकता है।”

कोर्ट ने आगे कहा कि बच्चे का कल्याण ‘सर्वोपरि’ है और पिता, जो कि एकमात्र जीवित प्राकृतिक संरक्षक है, ने न तो बच्चे को त्यागा है और न ही उसकी उपेक्षा की है। ननिहाल पक्ष के दावे पर कोर्ट ने टिप्पणी की कि बच्चे की नानी की आयु (71 वर्ष) को भी दीर्घकालिक कल्याण की दृष्टि से नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

भावनात्मक पक्ष पर कोर्ट ने कहा:

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“यदि इस स्तर पर पिता को कस्टडी नहीं दी जाती है, तो इस बात की प्रबल संभावना है कि बच्चा उसके साथ बिना किसी भावनात्मक जुड़ाव के बड़ा होगा, जो बच्चे के समग्र विकास और पिता के माता-पिता के अधिकारों के लिए हानिकारक होगा।”

निर्णय

हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए प्रतिवादी संख्या 4 और 5 को निर्देश दिया कि वे नाबालिग अक्षित पांडेय को तत्काल कोर्ट में ही उसके पिता विपिन कुमार पांडेय को सौंप दें। कोर्ट के आदेश के अनुपालन में बच्चे की कस्टडी पिता को हस्तांतरित कर दी गई।

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हालाँकि, बच्चे के ननिहाल पक्ष के साथ भावनात्मक लगाव को बनाए रखने के लिए, कोर्ट ने प्रतिवादियों को ‘विजिटेशन राइट्स’ (मुलाकात का अधिकार) प्रदान किए हैं। वे प्रत्येक रविवार शाम 4:00 बजे से दो घंटे के लिए पिता के आवास पर बच्चे से मिल सकेंगे। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि भविष्य में बच्चे के कल्याण के विरुद्ध कोई स्थिति उत्पन्न होती है, तो प्रतिवादी पुनः कानूनी उपचार ले सकते हैं।

केस का विवरण:

  • केस का शीर्षक: अक्षित पांडेय (नाबालिग) व अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व 6 अन्य
  • केस संख्या: बंदी प्रत्यक्षीकरण रिट याचिका संख्या 365 वर्ष 2025
  • पीठ: न्यायमूर्ति संदीप जैन
  • दिनांक: 21 अप्रैल, 2026

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