बंगाल चुनाव में ‘वोटर लिस्ट’ के फेरबदल का बड़ा आरोप: सुप्रीम कोर्ट पहुंची याचिका, 91 लाख मतदाताओं के नाम हटाने पर उठे सवाल

पश्चिम बंगाल के हालिया विधानसभा चुनाव परिणामों को लेकर एक बड़ा कानूनी और राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। राज्य की मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर किए गए बदलावों को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की गई है। इस याचिका में मांग की गई है कि निर्वाचन आयोग ‘विशेष गहन संशोधन’ (SIR) के तहत हटाए गए मतदाताओं का विधानसभा क्षेत्रवार पूरा ब्योरा सार्वजनिक करे।

यह याचिका पश्चिम बंगाल प्रदेश कांग्रेस कमेटी की ‘एसआईआर कमेटी’ के अध्यक्ष प्रसेनजीत बोस की ओर से वकील नेहा राठी के माध्यम से दायर की गई है। याचिका में भारत निर्वाचन आयोग (ECI), पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी और राज्य सरकार को पक्षकार बनाते हुए संशोधन प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी का आरोप लगाया गया है।

गौरतलब है कि हाल ही में मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की एक पीठ ने चुनाव आयोग को विशेष गहन संशोधन (SIR) करने का अधिकार दिया था, जिसके तहत कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि आधार कार्ड नागरिकता का प्रमाण नहीं है।

चुनावी नतीजों पर असर: 82 सीटों का गणित और राजनीतिक समीकरण

याचिकाकर्ता का दावा है कि चुनाव से ठीक पहले मतदाता सूची में किए गए इस असाधारण बदलाव ने राज्य के राजनीतिक परिदृश्य को पूरी तरह प्रभावित किया। इन चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने 294 सदस्यीय विधानसभा में 207 सीटें जीतकर दो-तिहाई बहुमत हासिल किया और तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 15 साल के शासन को समाप्त कर दिया।

हालांकि, याचिका में पेश किए गए आंकड़ों के विश्लेषण से चुनावी नतीजों पर गंभीर सवाल खड़े किए गए हैं:

  • भाजपा ने जिन सीटों पर जीत दर्ज की, उनमें से 82 विधानसभा सीटों पर मतदाता सूची में किया गया फेरबदल (नामों को जोड़ना और हटाना) जीत-हार के अंतिम अंतर से भी अधिक था।
  • इन 82 महत्वपूर्ण सीटों में से 70 सीटें राज्य के उन 12 जिलों में थीं जो मुस्लिम-बहुल माने जाते हैं।
  • महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि साल 2021 के पिछले विधानसभा चुनावों में भाजपा इन 70 सीटों में से केवल 9 सीटों पर ही जीत हासिल कर सकी थी।
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याचिका में तर्क दिया गया है कि इन आंकड़ों से साफ पता चलता है कि मतदाता सूची में किए गए इस व्यापक बदलाव ने इन 82 विधानसभा क्षेत्रों के चुनावी परिणामों को सीधे तौर पर प्रभावित किया होगा।

लाखों मतदाताओं के नाम गायब: आंकड़ों का हैरान करने वाला खेल

याचिका में मतदाता सूची से हटाए गए नामों की संख्या और पूरी प्रक्रिया की विसंगतियों को मुख्य आधार बनाया गया है:

  • भारी गिरावट: नवंबर से शुरू हुई संशोधन प्रक्रिया के बाद 28 फरवरी 2026 को जारी आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, राज्य के कुल मतदाता आधार में से लगभग 8.3 प्रतिशत यानी 63.66 लाख नाम हटा दिए गए। इससे राज्य के मतदाताओं की संख्या 7.66 करोड़ से घटकर 7.04 करोड़ रह गई।
  • अप्रैल का आंकड़ा: इसके बाद, 7 अप्रैल 2026 को चुनाव आयोग द्वारा जारी आंकड़ों में यह संख्या और बढ़कर सामने आई, जिसके अनुसार पश्चिम बंगाल में कुल मिलाकर लगभग 91 लाख मतदाताओं के नाम काटे गए।
  • प्रक्रियात्मक खामियां: याचिका के अनुसार, प्रारंभिक गणना चरण के दौरान ही 58 लाख से अधिक मतदाताओं को बाहर कर दिया गया था। दावा और आपत्ति चरण में नाम जोड़ने के लिए 9.64 लाख आवेदन और नाम हटाने के लिए 99,118 आवेदन आए, लेकिन 28 फरवरी की अंतिम मतदाता सूची में केवल 1.82 लाख नए नाम ही जोड़े जा सके।
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याचिका में आरोप लगाया गया है कि माता-पिता की उम्र के अंतर, नाम की वर्तनी में विसंगति या एक से अधिक संतान जैसे कारणों को ‘तार्किक विसंगतियां’ बताकर 60 लाख से अधिक मामलों को चिह्नित किया गया। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम में इन पैमानों का कोई उल्लेख नहीं है, जिसके कारण बिना किसी पारदर्शी नियम के लाखों लोगों के मताधिकार छीन लिए गए।

न्याय की सुस्त रफ्तार: न्यायाधिकरणों के फेर में फंसे मतदाता

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्देशों के तहत प्रभावित मतदाताओं की शिकायतों के निपटारे के लिए 19 अपीलीय न्यायाधिकरण (Appellate Tribunals) गठित किए गए थे। लेकिन याचिका का दावा है कि यह व्यवस्था आम और गरीब नागरिकों को समय पर राहत देने में पूरी तरह विफल रही है।

याचिका में न्यायाधिकरणों की कार्यप्रणाली पर निम्नलिखित सवाल उठाए गए हैं:

  • तीन सदस्यीय न्यायिक समिति द्वारा 7 अप्रैल को तैयार की गई मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) को कभी सार्वजनिक नहीं किया गया। इससे मतदाताओं को यह पता ही नहीं चल पाया कि अपील कैसे करनी है, सुनवाई कब होगी या नोटिस कैसे जारी होंगे।
  • करीब 25 लाख अपीलों में से मई के मध्य तक केवल एक बेहद मामूली हिस्से का ही निपटारा किया जा सका था।
  • 14 मई तक केवल 6,581 अपीलों पर निर्णय आया, जिनमें से 4,043 अपीलों को स्वीकार किया गया। यानी जिन मामलों की समीक्षा की गई, उनमें से अधिकांश में नाम काटने की प्रक्रिया गलत पाई गई और मतदाताओं के नाम दोबारा जोड़ने के आदेश दिए गए।
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याचिकाकर्ता की प्रमुख मांगें

इस पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही बहाल करने के लिए याचिका में सुप्रीम कोर्ट से निम्नलिखित निर्देश देने का अनुरोध किया गया है:

  1. सटीक डेटा सार्वजनिक हो: चुनाव आयोग और राज्य सरकार को निर्देश दिया जाए कि वे प्रत्येक विधानसभा क्षेत्रवार फॉर्म 6 (नाम जोड़ने के लिए) और फॉर्म 7 (नाम हटाने/आपत्ति के लिए) के तहत आए आवेदनों, उनके स्वीकृत या खारिज होने और न्यायाधिकरणों में लंबित मामलों का पूरा ब्योरा सार्वजनिक करें।
  2. सरल मार्गदर्शन: अपीलीय न्यायाधिकरणों की एसओपी को सार्वजनिक किया जाए और इसके नियमों को बेहद सरल भाषा में बांग्ला, हिंदी और अंग्रेजी में जारी किया जाए।
  3. अपील का स्वचालित अधिकार: संशोधन प्रक्रिया के दौरान जिस भी नागरिक का नाम मतदाता सूची से कटा है, उसे सीधे अपीलीय न्यायाधिकरण में जाकर अपना नाम बहाल कराने का बिना किसी बाधा के अधिकार दिया जाए।

याचिका के अंत में कहा गया है कि इन आंकड़ों और प्रक्रियाओं को पारदर्शी न रखना चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता, जवाबदेही और सार्वजनिक भरोसे पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

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