फर्जी डीड के जरिए संपत्ति हड़पने की कोशिश नाकाम; दिल्ली हाईकोर्ट ने “अधकचरे सबूतों” पर महिला पार्टनर को फटकारा, लगाया ₹1 लाख का जुर्माना

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में मध्यस्थता कानून की धारा 37 के तहत दायर एक अपील को ₹1,00,000 के अनुकरणीय जुर्माने के साथ खारिज कर दिया है। जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस मधु जैन की खंडपीठ ने उस मध्यस्थता आदेश (Arbitral Award) को बरकरार रखा है जिसमें नारायणा स्थित पार्टनरशिप संपत्ति को दो भागीदारों के बीच 50-50 प्रतिशत बांटने का निर्देश दिया गया था। हाईकोर्ट ने अपीलकर्ता के आचरण को “गैर-ईमानदार” (non-bonafide) करार देते हुए कहा कि 1974 की मूल पार्टनरशिप डीड 2015 तक कानूनी रूप से “जीवित” थी और उसे फर्जी दस्तावेजों के आधार पर खत्म नहीं माना जा सकता।

मामले की पृष्ठभूमि

यह कानूनी विवाद ‘मेसर्स श्री नारायण राजकुमार’ नामक एक पारिवारिक पार्टनरशिप फर्म से जुड़ा है, जिसकी स्थापना 1973 में हुई थी और 22 जुलाई 1974 को इसका पुनर्गठन किया गया था। इस फर्म के भागीदारों में श्री नित्यानंद यादव, श्रीमती प्रेम लता सुरेखा (अपीलकर्ता) और श्री चक्रधारी सुरेखा (प्रतिवादी) शामिल थे। फर्म ने 1980 में नारायणा, नई दिल्ली स्थित प्लॉट नंबर Y-10 को पट्टे पर लिया था।

2003 में पार्टनर नित्यानंद यादव की मृत्यु के बाद भागीदारों के बीच संबंध बिगड़ गए। श्री चक्रधारी सुरेखा ने आरोप लगाया कि अपीलकर्ता और उनके पति श्री विष्णु कुमार सुरेखा ने 1985 से 1999 के बीच कई फर्जी पार्टनरशिप डीड तैयार कीं, ताकि चक्रधारी सुरेखा का इस्तीफा दिखाया जा सके और पति को पार्टनर के रूप में शामिल किया जा सके। 23 मार्च 2015 को प्रतिवादी ने फर्म को भंग करने का नोटिस दिया और मध्यस्थता की मांग की। मध्यस्थ (Sole Arbitrator) ने दोनों जीवित भागीदारों को संपत्ति में 50-50% हिस्सा देने का फैसला सुनाया, जिसे अपीलकर्ता ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।

पक्षकारों की दलीलें

अपीलकर्ता की दलीलें: वरिष्ठ अधिवक्ता राजशेखर राव के माध्यम से अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि 1974 की डीड के बाद कई नए समझौते हुए और प्रतिवादी ने दशकों पहले इस्तीफा दे दिया था। इसके अलावा, एक तकनीकी चुनौती देते हुए कहा गया कि मध्यस्थता अधिनियम की धारा 29A के तहत मध्यस्थ का कार्यकाल समाप्त हो चुका था क्योंकि मध्यस्थता की दूसरी प्रक्रिया जुलाई 2016 में शुरू हुई थी।

प्रतिवादी की दलीलें: प्रतिवादी ने तर्क दिया कि अपीलकर्ता किसी भी पुनर्गठित डीड के अस्तित्व को साबित करने में विफल रही और केवल फोटोकॉपी पेश की गई, जो ‘रजिस्ट्रार ऑफ फर्म्स’ के आधिकारिक रिकॉर्ड से मेल नहीं खाती थी। यह भी कहा गया कि चूंकि मध्यस्थता का पहला नोटिस मार्च 2015 (2015 के संशोधन से पहले) भेजा गया था, इसलिए धारा 29A की समय सीमा यहां लागू नहीं होती।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण

प्रक्रियात्मक समय सीमा (धारा 29A) पर: कोर्ट ने अपीलकर्ता की तकनीकी आपत्ति को खारिज कर दिया। संशोधन अधिनियम की धारा 26 का हवाला देते हुए पीठ ने टिप्पणी की:

“मध्यस्थता की कार्यवाही 23.03.2015 को शुरू हुई थी, जब मध्यस्थ की नियुक्ति के लिए पहला नोटिस भेजा गया था, जो संशोधन अधिनियम के लागू होने से काफी पहले था। इसलिए, यह निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए कि धारा 29A और उसमें निर्धारित समय सीमा इस मामले में लागू नहीं होती है।”

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पार्टनरशिप डीड की वैधता पर: हाईकोर्ट ने मध्यस्थ के इस निष्कर्ष की पुष्टि की कि अपीलकर्ता का बचाव “अधकचरे सबूतों” (half-baked evidence) पर आधारित था। कोर्ट ने नोट किया कि अपीलकर्ता ने गवाही देने से इनकार कर दिया और जो दस्तावेज पेश किए गए, वे आधिकारिक रिकॉर्ड से बिल्कुल अलग थे। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि एक पार्टनरशिप “एट विल” तब तक जीवित रहती है जब तक कि उसे औपचारिक रूप से भंग न कर दिया जाए:

“1974 की पार्टनरशिप ने भले ही कोई व्यवसाय न किया हो, लेकिन औपचारिक रूप से भंग होने तक यह जीवित रही। खराब स्थिति में यह कहा जा सकता है कि यह ‘वेंटिलेटर’ पर थी और केवल तब मृत हुई जब दावेदार ने 23 मार्च, 2015 को प्लग खींच लिया।”

धारा 37 के तहत हस्तक्षेप पर: MMTC लिमिटेड बनाम वेदांत लिमिटेड और कोंकण रेलवे कॉर्पोरेशन लिमिटेड बनाम चिनाब ब्रिज प्रोजेक्ट मामलों का संदर्भ देते हुए कोर्ट ने कहा कि धारा 37 “सामान्य अपीलीय क्षेत्राधिकार” नहीं है। पीठ ने कहा कि वह तथ्यों के निष्कर्षों में तब तक हस्तक्षेप नहीं करेगी जब तक कि उनमें कोई गंभीर विसंगति न हो।

कोर्ट का निर्णय

अपील को “पूरी तरह योग्यताहीन” पाते हुए हाईकोर्ट ने इसे खारिज कर दिया। कोर्ट ने अपीलकर्ता द्वारा बिना अनुमति के संपत्ति का एक तिहाई हिस्सा बेचने के आचरण पर गंभीर रुख अपनाया।

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पीठ ने अपीलकर्ता पर ₹1,00,000 का जुर्माना लगाते हुए कहा:

“अपीलकर्ता का आचरण ईमानदारी वाला नहीं है… सौहार्दपूर्ण समाधान के सभी उचित प्रस्तावों को अपीलकर्ता ने ठुकरा दिया। इसके अलावा, अपीलकर्ता ने फर्म के दूसरे साथी की अनुमति के बिना विवादित भूमि का 1/3 हिस्सा बेच दिया है।”

हाईकोर्ट ने अपीलकर्ता को दो सप्ताह के भीतर यह राशि प्रतिवादी को भुगतान करने का निर्देश दिया है।

मामले का विवरण:

  • मामले का शीर्षक: श्रीमती प्रेम लता सुरेखा बनाम श्री चक्रधारी सुरेखा एवं अन्य
  • मामला संख्या: FAO(OS) (COMM) 70/2025 एवं CM APPL. 24573/2025
  • पीठ: जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस मधु जैन
  • दिनांक: 21 अप्रैल, 2026

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