15 साल से अधिक समय से संविदा पर पढ़ा रहे शिक्षकों के भविष्य को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार से अपना रुख स्पष्ट करने को कहा है। अदालत ने टिप्पणी की कि राष्ट्र निर्माण में योगदान देने वाले शिक्षकों को लंबी सेवा के बाद इस तरह बेसहारा या बिना आजीविका के नहीं छोड़ा जा सकता।
बुधवार को मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस पंकज भाटिया की पीठ ने बेसिक शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव को व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया। राज्य सरकार से पूछा गया है कि क्या 15 वर्ष से अधिक समय से कार्यरत संविदा शिक्षकों को नियमित करने के लिए कोई नीतिगत कदम उठाए जा रहे हैं।
16 साल की सेवा के बाद अनुबंध समाप्त करने का मामला
यह आदेश अमेठी के कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालय में तैनात संविदा शिक्षिका अर्चना बौद्ध की याचिका पर आया। 16 जनवरी 2010 से कार्यरत अर्चना का अनुबंध समय-समय पर बढ़ाया जाता रहा था, लेकिन 16 जून को जारी एक आदेश के जरिए उनका अनुबंध रिन्यू करने से मना कर दिया गया।
याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत के सामने तर्क दिया कि 16 वर्षों की समर्पित सेवा के बाद नियमितीकरण पर विचार करने के बजाय उन्हें नौकरी से हटा दिया गया। लगभग 39 वर्ष की आयु में अब वे किसी नई शिक्षक भर्ती के लिए आवेदन करने के योग्य भी नहीं रही हैं, जिससे उनके सामने जीविका का गंभीर संकट खड़ा हो गया है।
याचिकाकर्ता पर कोई व्यक्तिगत आरोप नहीं
मामले की सुनवाई के दौरान अधिकारियों द्वारा प्रस्तुत निर्देशों का अध्ययन करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि छात्रों से संबंधित अनुशासनहीनता के मामलों में तीन अन्य शिक्षकों का तबादला किया गया था। हालांकि, याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई व्यक्तिगत शिकायत या आरोप दर्ज नहीं था।
जस्टिस पंकज भाटिया ने कहा कि 16 साल तक सेवा देने के बाद किसी शिक्षक की संविदा अचानक समाप्त कर देना और उन्हें आजीविका के साधन से वंचित कर देना एक गंभीर विषय है, जो व्यापक विचार की मांग करता है।
याचिकाकर्ता को अंतरिम राहत, 8 सितंबर को अगली सुनवाई
अदालत ने याचिकाकर्ता को बड़ी राहत देते हुए निर्देश दिया कि उन्हें अगली सुनवाई तक संविदा के आधार पर अपने पद पर कार्य करने की अनुमति दी जाए।
इसके साथ ही हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और संबंधित उत्तरदाताओं को अपना जवाबी हलफनामा दाखिल करने का आदेश दिया है। अदालत अब 15 वर्ष से अधिक सेवा दे चुके संविदा शिक्षकों से जुड़े इस बड़े नीतिगत मुद्दे पर 8 सितंबर को अगली सुनवाई करेगी।

