इलाहाबाद हाईकोर्ट ने न्यायमूर्ति अजय भनोत के खिलाफ चल रहे विरोध प्रदर्शन के दौरान वकीलों द्वारा कथित तौर पर कोर्ट रूम के प्रवेश द्वार बंद करने और अदालत के कर्मचारियों को अंदर जाने से रोकने पर आपत्ति जताई है। कोर्ट ने कहा कि वकीलों के जानबूझकर काम से अनुपस्थित रहने के कारण न्यायिक कार्यवाही ठप नहीं हो सकती।
न्यायमूर्ति अजय भनोत और न्यायमूर्ति दिवेश चंद्र सामंत की खंडपीठ ने 4 नवंबर के आदेश में दर्ज किया कि बड़ी संख्या में वकील कोर्ट रूम के बाहर एकत्र हुए और शोर-शराबा किया, जिससे अदालती कार्यवाही प्रभावित हुई।
खंडपीठ ने पाया कि वकीलों ने मुख्य प्रवेश द्वार से अदालत के कर्मचारियों को अंदर जाने से भी रोका। ऐसी स्थिति में कोर्ट को कर्मचारियों को न्यायाधीशों के लिए निर्धारित प्रवेश द्वार से कोर्ट रूम में आने का निर्देश देना पड़ा।
सरकारी वकीलों की अनुपस्थिति पर मांगी रिपोर्ट
हाईकोर्ट ने ये टिप्पणियां फर्रुखाबाद निवासी सलमान अख्तर की ओर से दायर आपराधिक रिट याचिका की सुनवाई के दौरान कीं। याचिका में शादी का झूठा वादा कर शारीरिक संबंध बनाने, आपराधिक धमकी, दंगा और अन्य आरोपों से संबंधित एफआईआर को चुनौती दी गई थी।
मामले की दोबारा पुकार होने पर भी याचिकाकर्ताओं की ओर से कोई वकील उपस्थित नहीं हुआ, जबकि उनके अधिवक्ताओं के नाम वाद सूची में दर्ज थे।
सुनवाई के दौरान अतिरिक्त सरकारी अधिवक्ता (AGA) भी अनुपस्थित रहे। इस पर खंडपीठ ने सरकारी अधिवक्ता (GA) को उनकी अनुपस्थिति का कारण स्पष्ट करते हुए रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया।
न्यायमूर्ति भनोत के खिलाफ विरोध प्रदर्शन की पृष्ठभूमि
यह विवाद 27 अक्टूबर को कोर्ट संख्या 49 में हुई एक घटना से शुरू हुआ था, जहां न्यायमूर्ति अजय भनोत खंडपीठ की अध्यक्षता कर रहे थे।
इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोसिएशन (HCBA) ने 28 अक्टूबर को मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली को पत्र लिखकर आरोप लगाया कि न्यायमूर्ति भनोत ने अदालती कार्यवाही के दौरान एक अधिवक्ता को अपमानित किया।
एसोसिएशन के अनुसार, एक अधिवक्ता ने कोर्ट रूम में पुलिस अधिकारी के एक विशेष सीट पर बैठने पर आपत्ति जताई थी। आरोप है कि इसके बाद न्यायमूर्ति भनोत ने अधिवक्ता को जेल भेजने का आदेश दिया और उन्हें पुलिस अधिकारी से माफी मांगने के लिए मजबूर किया।
बार एसोसिएशन ने चेतावनी दी थी कि उचित कार्रवाई नहीं होने पर वकील न्यायमूर्ति भनोत की अदालत का बहिष्कार करेंगे।
इसके बाद अधिवक्ताओं ने विरोध प्रदर्शन किया। इस दौरान कुछ वकीलों पर न्यायमूर्ति भनोत के कोर्ट रूम में फर्नीचर तोड़ने का भी आरोप लगा।
तोड़फोड़ और हमले को प्रथम दृष्टया आपराधिक अवमानना माना
इस विवाद के बीच न्यायमूर्ति भनोत और न्यायमूर्ति सामंत की खंडपीठ ने 2 नवंबर को एक अन्य आदेश पारित किया था।
खंडपीठ ने राज्य के विधि अधिकारियों, अदालत के कर्मचारियों और सुरक्षाकर्मियों पर कथित हमले तथा कोर्ट रूम में तोड़फोड़ की घटनाओं को प्रथम दृष्टया आपराधिक अवमानना माना था।
कोर्ट ने मुख्य न्यायाधीश से अनुरोध किया था कि इन घटनाओं में कथित रूप से शामिल वकीलों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के निर्देश जारी करने पर विचार किया जाए।
इसके अलावा घटनाओं के संबंध में सोशल मीडिया पर कथित रूप से झूठी पोस्ट प्रसारित करने वाले व्यक्तियों के खिलाफ भी एफआईआर दर्ज करने पर विचार करने का अनुरोध किया गया था।
