यूपी अवैध धर्मांतरण मामला: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 8 दोषियों को दी जमानत, मौलाना कलीम सिद्दीकी, उमर गौतम समेत 8 की याचिकाएं खारिज

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने उत्तर प्रदेश के अवैध धर्मांतरण मामले में दोषी ठहराए गए 16 लोगों की जमानत याचिकाओं पर अलग-अलग निर्णय देते हुए आठ को जमानत दे दी है, जबकि मौलाना कलीम सिद्दीकी और मोहम्मद उमर गौतम सहित आठ अन्य की जमानत याचिकाएं खारिज कर दी हैं।

जस्टिस राजेश सिंह चौहान और जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्र की डिवीजन बेंच ने 4 नवंबर 2026 को पारित साझा आदेश में कहा कि जिन आठ दोषियों को जमानत देने से इनकार किया गया है, उनके खिलाफ आरोप बेहद गंभीर हैं। वहीं, अन्य आठ दोषियों के खिलाफ आरोप और साक्ष्यों की प्रकृति तुलनात्मक रूप से कम गंभीर है।

यह आदेश 2024 में लखनऊ की विशेष NIA अदालत द्वारा सुनाई गई सजा के खिलाफ दाखिल 16 आपराधिक अपीलों में पारित किया गया।

इन आठ दोषियों को मिली जमानत

हाईकोर्ट ने मन्नू यादव, अब्दुल्ला उमर, धीरज गोविंदराव जगताप, भूप्रिया बांडो उर्फ अरसलान मुस्तफा, सरफराज अली जाफरी, मोहम्मद सलीम, कुणाल अशोक चौधरी उर्फ आतिफ और राहुल भोला को अपील लंबित रहने के दौरान जमानत देने का आदेश दिया।

वहीं, मोहम्मद उमर गौतम, मुफ्ती काजी जहांगीर कासमी, सलाहुद्दीन जैनुद्दीन शेख, प्रसाद रामेश्वर कावरे उर्फ आदम, मौलाना कलीम सिद्दीकी, इरफान शेख, कौसर आलम और डॉ. फराज बाबुल्लाह शाह की जमानत याचिकाएं खारिज कर दी गईं।

बेंच ने कहा कि इन आठ दोषियों के खिलाफ आरोपों की गंभीरता और उपलब्ध साक्ष्यों को देखते हुए दोषसिद्धि के बाद जमानत देने का कोई उचित आधार नहीं है।

2021 में ATS ने दर्ज किया था धर्मांतरण का मामला

मामले की शुरुआत 20 जून 2021 को हुई थी, जब उत्तर प्रदेश आतंकवाद निरोधक दस्ते (ATS) के एक उपनिरीक्षक ने लखनऊ के गोमतीनगर स्थित ATS थाने में एफआईआर दर्ज कराई थी।

एफआईआर में आरोप लगाया गया था कि विदेशी फंडिंग और प्रलोभन के माध्यम से मूक-बधिर व्यक्तियों, महिलाओं, बच्चों और कमजोर वर्गों के लोगों का बड़े पैमाने पर इस्लाम में धर्मांतरण कराया जा रहा था।

मामले में भारतीय दंड संहिता की धाराओं 120B, 153A, 153B, 295A, 417, 298, 121A और 123 के साथ उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम, 2021 की धाराओं 3, 5 और 8 तथा विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (FCRA), 2010 की धाराओं 11 और 35 के तहत आरोप लगाए गए थे।

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लखनऊ की विशेष NIA अदालत ने 11 सितंबर 2024 को चार संबंधित सत्र परीक्षणों में फैसला सुनाया था।

ट्रायल कोर्ट ने मोहम्मद उमर गौतम, अब्दुल्ला उमर और आईपीसी की धारा 121A के तहत दोषी ठहराए गए दस अपीलकर्ताओं को अधिकतम आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।

हालांकि, मन्नू यादव, मोहम्मद सलीम, कुणाल अशोक चौधरी उर्फ आतिफ और राहुल भोला को धारा 121A के तहत दोषी नहीं ठहराया गया था। उन्हें अधिकतम दस वर्ष कारावास की सजा मिली थी।

बचाव पक्ष ने एफआईआर और धारा 121A के इस्तेमाल पर उठाए सवाल

कुणाल अशोक चौधरी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता पूर्णेंदु चक्रवर्ती ने अधिवक्ता कृष्ण कुमार के सहयोग से दलील दी कि किसी भी अपीलकर्ता के खिलाफ आईपीसी की धारा 121A लगाने का पर्याप्त आधार नहीं था।

उन्होंने कहा कि एफआईआर में घटना की तारीख और समय का उल्लेख नहीं था। इसलिए यह स्थापित नहीं किया जा सकता कि कथित घटनाएं धर्मांतरण कानून लागू होने के बाद हुई थीं।

बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि अधिनियम की असंशोधित धारा 4 के तहत केवल पीड़ित व्यक्ति या उसका निकट संबंधी ही एफआईआर दर्ज करा सकता था, न कि पुलिस अधिकारी।

यह भी कहा गया कि पुलिस हिरासत में दिए गए कथित स्वीकारोक्ति बयान भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धाराओं 25 और 26 के तहत साक्ष्य के रूप में स्वीकार्य नहीं हैं।

अधिवक्ता सुशील कुमार सिंह ने भूप्रिया बांडो, मोहम्मद उमर गौतम, प्रसाद रामेश्वर कावरे और सलाहुद्दीन जैनुद्दीन शेख की ओर से सुप्रीम कोर्ट के Rajendra Bihari Lal v. State of UP फैसले का हवाला दिया।

उन्होंने तर्क दिया कि यदि एफआईआर दर्ज कराने वाला व्यक्ति कानूनी रूप से अधिकृत नहीं है, तो उसके आधार पर हुई आगे की कार्यवाही भी प्रभावित होती है।

उन्होंने State (NCT of Delhi) v. Navjot Sandhu मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि धारा 121A संसद पर हमले जैसे मामलों में लागू होती है, जबकि वर्तमान मामला मुख्यतः धर्मांतरण के आरोपों से संबंधित है।

अब्दुल्ला उमर की ओर से अधिवक्ता इंदु प्रकाश सिंह ने कहा कि उनका मुवक्किल MBA का छात्र था और उसे केवल मोहम्मद उमर गौतम का बेटा होने के कारण गलत तरीके से फंसाया गया। उन्होंने दावा किया कि किसी धर्मांतरण से उसे जोड़ने वाला कोई साक्ष्य नहीं है।

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अन्य अपीलकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता फुरकान पठान, जिया उल कय्यूम, अभिषेक सिंह और मोहम्मद आमिर नकवी ने भी जमानत के समर्थन में दलीलें दीं।

बचाव पक्ष ने कहा कि अपीलकर्ताओं ने ट्रायल के दौरान मिली जमानत का दुरुपयोग नहीं किया था और वे चार वर्ष सात महीने से लेकर चार वर्ष ग्यारह महीने तक हिरासत में रह चुके हैं।

राज्य सरकार ने कहा, 24 गवाहों और डिजिटल साक्ष्यों से अपराध साबित

उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से अपर महाधिवक्ता विनोद कुमार शाही ने अपर शासकीय अधिवक्ता एस.एन. तिलहरी के सहयोग से जमानत का विरोध किया।

उन्होंने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने 24 गवाहों के बयानों के साथ दस्तावेजी और डिजिटल साक्ष्यों के आधार पर दोषसिद्धि का फैसला दिया था। यह फैसला 265 से अधिक पृष्ठों का है।

राज्य सरकार ने दलील दी कि धर्मांतरण कानून की धारा 4 का संबंध धारा 3 के तहत अपराधों से है, न कि धारा 8 से।

यह भी कहा गया कि अपीलकर्ताओं ने न तो एफआईआर को चुनौती दी थी और न ही आरोपपत्र को।

सरकार के अनुसार, यदि एफआईआर दर्ज कराने की प्रक्रिया में कोई त्रुटि थी भी, तो दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 465 के तहत वह केवल प्रक्रियात्मक अनियमितता थी।

धारा 121A के संबंध में राज्य ने कहा कि इस प्रावधान में सरकार को बलपूर्वक भयभीत करने की साजिश भी शामिल है और इसके लिए वास्तव में बल प्रयोग होना आवश्यक नहीं है।

आठ दोषियों के खिलाफ आरोप अधिक गंभीर: हाईकोर्ट

दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने इस तथ्य को ध्यान में रखा कि अपीलकर्ता साढ़े चार वर्ष से अधिक समय जेल में बिता चुके हैं।

बेंच ने यह भी उल्लेख किया कि मोहम्मद सलीम, राहुल भोला, मन्नू यादव और कुणाल अशोक चौधरी को आईपीसी की धारा 121A के तहत दोषी नहीं ठहराया गया था।

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कोर्ट ने आरोपों और साक्ष्यों की प्रकृति में अंतर करते हुए कहा:

“अन्य आरोपियों, जिन्हें इनके सहयोगी बताया गया है और जो इनसे जुड़े हुए थे, के संबंध में आरोपों और संबंधित अपराधों के साक्ष्यों की प्रकृति तुलनात्मक रूप से कम गंभीर है।”

हालांकि, मोहम्मद उमर गौतम, मौलाना कलीम सिद्दीकी और छह अन्य के संबंध में बेंच ने कहा:

“वर्तमान आपराधिक अपील में दोषसिद्धि के बाद के चरण में उन्हें जमानत पर रिहा करने का हमें कोई उचित कारण नहीं मिलता।”

जमानत के साथ लगाई गईं शर्तें

जिन आठ दोषियों को जमानत दी गई है, उन्हें व्यक्तिगत मुचलका और दो जमानतदार प्रस्तुत करने होंगे।

हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि वे अपने पासपोर्ट जमा करेंगे और अपील की सुनवाई में सहयोग करेंगे। अदालत की अनुमति के बिना देश नहीं छोड़ सकेंगे और समान गतिविधियों में शामिल नहीं होंगे।

इसके अतिरिक्त उन्हें रिहाई के दो महीने के भीतर लगाए गए जुर्माने की 50 प्रतिशत राशि जमा करनी होगी। शेष 50 प्रतिशत जुर्माने की वसूली पर रोक रहेगी।

निर्धारित अवधि में रकम जमा नहीं करने पर उनकी जमानत स्वतः रद्द हो जाएगी।

हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का रिकॉर्ड मंगाने का निर्देश देते हुए अपीलों को जनवरी 2027 के पहले सप्ताह में सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने को कहा।

केस डिटेल्स

केस टाइटल: Kunal Ashok Chaudhari @ Atif v. State of U.P. and connected appeals

केस नंबर: Criminal Appeal No. 4008 of 2024 एवं संबंधित अपीलें

पीठ: जस्टिस राजेश सिंह चौहान और जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्र

आदेश की तारीख: 4 नवंबर 2026

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