फैसले पर असर नहीं डालने वाली टाइपिंग की गलतियों के लिए न्यायिक अधिकारी की कठोर आलोचना अनुचित: सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की टिप्पणियां हटाईं

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी फैसले में अनजाने में हुई टाइपिंग की गलतियों के लिए न्यायिक अधिकारी की कठोर आलोचना करना उचित नहीं है, खासकर जब उन गलतियों से मामले के परिणाम पर कोई असर नहीं पड़ा हो। कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट द्वारा एक महिला न्यायिक अधिकारी के खिलाफ की गई प्रतिकूल टिप्पणियां रिकॉर्ड से हटाने का आदेश दिया है।

जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय की बेंच ने न्यायिक अधिकारी को फैसले लिखने का प्रशिक्षण देने और हाईकोर्ट के आदेश को उनकी वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (ACR) में दर्ज करने के निर्देश भी रद्द कर दिए।

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि हाईकोर्ट ने न्यायिक अधिकारी को अपना पक्ष रखने का अवसर दिए बिना न्यायिक कार्यवाही के दौरान उनके खिलाफ कठोर टिप्पणियां की थीं। यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत था।

हाईकोर्ट को अधीनस्थ न्यायपालिका के संरक्षक की भूमिका निभानी चाहिए

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत अधीक्षण की शक्ति का इस्तेमाल करते समय हाईकोर्ट को जिला न्यायपालिका के अधिकारियों के प्रति अधिक उदार दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।

बेंच ने कहा:

“हाईकोर्ट को अधिक उदारता दिखानी चाहिए थी और संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत जिला न्यायपालिका के अधिकारियों के संरक्षक के रूप में अपनी भूमिका की वास्तविक भावना के अनुरूप कार्य करना चाहिए था।”

कोर्ट ने आगे कहा:

“किसी फैसले में अनजाने में हुई टाइपिंग की गलतियों के लिए न्यायिक अधिकारी की कठोर आलोचना करना अनुचित था, जबकि उन गलतियों से मामले के परिणाम पर किसी भी तरह का प्रभाव नहीं पड़ा था।”

सुप्रीम कोर्ट ने चेतावनी दी कि इस तरह की टिप्पणियों के गंभीर परिणाम हो सकते हैं।

बेंच ने कहा:

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“ऐसी प्रतिकूल टिप्पणियां न्यायिक अधिकारी के करियर को नष्ट करने वाला प्रभाव डाल सकती हैं और पूरी जिला न्यायपालिका पर भी भय पैदा करने वाला असर डाल सकती हैं।”

दो अलग-अलग मुकदमों के फैसलों में हुई थीं गलतियां

मामला राजस्थान के झुंझुनूं जिले में दर्ज एक एफआईआर से जुड़ा था। इसमें IPC की धारा 376-D और POCSO अधिनियम की धारा 3 और 4 के तहत आरोप लगाए गए थे।

एक आरोपी कानून से संघर्षरत बालक था, जिसे किशोर न्याय बोर्ड ने वयस्क के रूप में मुकदमे का सामना करने के लिए भेजा था।

किशोर न्याय अधिनियम, 2015 की धारा 23 के तहत ऐसे बालक और वयस्क आरोपी की संयुक्त सुनवाई पर रोक होने के कारण दोनों के खिलाफ अलग-अलग मुकदमे चलाए गए।

20 जनवरी 2024 को संबंधित महिला न्यायिक अधिकारी ने दोनों मामलों में अलग-अलग फैसले सुनाए। दोनों आरोपियों को दोषी ठहराते हुए प्रत्येक को 20 वर्ष के कठोर कारावास की सजा दी गई।

हालांकि, दोनों मुकदमों के फैसलों में साक्ष्यों के कुछ अंश और संख्यात्मक विवरण गलती से एक-दूसरे में शामिल हो गए थे।

हाईकोर्ट ने ‘कट, कॉपी और पेस्ट’ तरीके पर की थी टिप्पणी

एक दोषी की सजा निलंबित करने की अर्जी पर सुनवाई के दौरान राजस्थान हाईकोर्ट के एकल न्यायाधीश ने 1 मई 2025 को ट्रायल कोर्ट के फैसले लिखने के तरीके पर गंभीर टिप्पणियां की थीं।

हाईकोर्ट ने कहा था कि न्यायिक अधिकारी ने ‘कट, कॉपी और पेस्ट’ का तरीका अपनाया और संभवतः फैसला स्टेनोग्राफर या क्लर्क ने लिखा था, जिस पर बिना पढ़े हस्ताक्षर कर दिए गए।

हाईकोर्ट ने यह भी टिप्पणी की थी कि जो न्यायिक अधिकारी पूरा फैसला स्वयं डिक्टेट नहीं करता, वह अपनी जिम्मेदारी से बच रहा है और “ऐसा न्यायिक अधिकारी न्यायपालिका की सेवा में बने रहने का हकदार नहीं है।”

इसके साथ ही न्यायिक अधिकारी को फैसले लिखने का प्रशिक्षण देने और आदेश को उनकी ACR में दर्ज करने का निर्देश दिया गया था।

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न्यायिक अधिकारी ने बताई टाइपिंग की गलतियों की वजह

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अपीलकर्ता न्यायिक अधिकारी ने बताया कि दोनों मुकदमों के तथ्य आपस में जुड़े हुए थे। गवाह और महत्वपूर्ण साक्ष्य भी लगभग समान थे।

उन्होंने कहा कि POCSO अदालतों के पास सीमित संसाधन होते हैं, जबकि कानून के तहत मामलों का समयबद्ध निस्तारण करना आवश्यक है।

संबंधित विशेष अदालत का एकमात्र स्टेनोग्राफर छुट्टी पर था। इस कारण उन्होंने फैसले का कुछ हिस्सा सीधे लोअर डिवीजन क्लर्क को कंप्यूटर पर डिक्टेट कराया और बाकी हिस्सा स्टेनोग्राफर के लौटने के बाद लिखवाया।

न्यायिक अधिकारी ने स्पष्ट किया कि अभियोजन गवाहों के गलत क्रमांक सहित अन्य त्रुटियां अनजाने में हुई टाइपिंग की गलतियां थीं। उनसे फैसले के मूल निष्कर्ष या परिणाम में कोई बदलाव नहीं हुआ।

न्यायिक अधिकारी को स्पष्टीकरण का अवसर देना जरूरी

सुप्रीम कोर्ट ने Kaushal Singh v. State of Rajasthan के फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि हाईकोर्ट को सामान्यतः न्यायिक कार्यवाही के दौरान अधीनस्थ न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ कठोर टिप्पणियां करने से बचना चाहिए।

यदि किसी अधिकारी के आचरण को लेकर चिंता हो, तो मामला प्रशासनिक स्तर पर मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखा जा सकता है, जहां संबंधित अधिकारी को स्पष्टीकरण देने का अवसर मिले।

बेंच ने Shuvendu Saha v. State of West Bengal का भी उल्लेख किया। इसके अनुसार, फैसले की गुणवत्ता से संबंधित टिप्पणियां रिमार्क स्लिप में दर्ज करके प्रशासनिक न्यायाधीश या मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखी जा सकती हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि न्यायिक अधिकारी से कोई गलती हुई भी थी, तो उनके खिलाफ कार्रवाई से पहले स्पष्टीकरण का अवसर दिया जाना चाहिए था।

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बेंच ने कहा:

“हाईकोर्ट द्वारा अपनाया गया तरीका ‘ऑडी अल्टरम पार्टम’ अर्थात दूसरे पक्ष को भी सुनने के मौलिक सिद्धांत के विपरीत था।”

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले की शुरुआत अलेक्जेंडर पोप की क्षमा संबंधी प्रसिद्ध पंक्ति और संस्कृत उक्ति ‘क्षमा वीरस्य भूषणम्’ से की।

बेंच ने कहा:

“गलती करना मानव स्वभाव का अंतर्निहित पहलू है और क्षमा करना अधिकार रखने वाले व्यक्ति के साथ-साथ प्रत्येक मनुष्य का सबसे श्रेष्ठ गुण है।”

सुप्रीम कोर्ट ने प्रतिकूल टिप्पणियां और निर्देश रद्द किए

सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक अधिकारी की अपील स्वीकार करते हुए राजस्थान हाईकोर्ट के 1 मई 2025 के आदेश के पैराग्राफ 9, 10 और 11 में दर्ज प्रतिकूल टिप्पणियां हटा दीं।

इसके अलावा पैराग्राफ 17 और 18 में दिए गए फैसले लिखने के प्रशिक्षण तथा आदेश को ACR में दर्ज करने संबंधी निर्देश भी रद्द कर दिए।

कोर्ट ने अपनी रजिस्ट्री को फैसले की प्रति राजस्थान हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को भेजने का निर्देश दिया, ताकि इसे मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखा जा सके।

केस डिटेल्स

केस टाइटल: In Re: XXX, A Judicial Officer in the District Judge Cadre of Rajasthan Judicial Services

केस नंबर: Criminal Appeal No. ___ of 2026 (Arising out of SLP (Crl.) No. 13501 of 2025)

पीठ: जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय

फैसले की तारीख: 2 नवंबर 2026

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