बच्चे के हित माता-पिता की इच्छा से अधिक महत्वपूर्ण: झारखंड हाईकोर्ट ने मां के पास बरकरार रखी बेटे की कस्टडी

झारखंड हाईकोर्ट ने एक नाबालिग बच्चे की कस्टडी उसकी मां के पास बनाए रखने के फैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा है। हाईकोर्ट ने कहा कि बच्चे की कस्टडी से जुड़े मामलों में माता-पिता की इच्छा के बजाय बच्चे का कल्याण सबसे महत्वपूर्ण है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि माता-पिता दोनों का प्यार, देखभाल और संरक्षण पाना बच्चे का बुनियादी मानवाधिकार है।

जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस अखिल कुमार की डिवीजन बेंच ने लगभग पांच साल छह महीने के बेटे की अस्थायी कस्टडी मांगने वाले पिता की अपील का निस्तारण करते हुए फैमिली कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा। कोर्ट ने 29 अक्टूबर के फैसले में कहा कि मौजूदा कस्टडी व्यवस्था में बदलाव से बच्चे की मानसिक और मनोवैज्ञानिक स्थिति प्रभावित हो सकती है।

हाईकोर्ट ने झारखंड राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (JHALSA) को निर्देश दिया कि वह पिता के मुलाकात के अधिकार (Visitation Rights) की निगरानी करे और बच्चे से उनकी मुलाकात सुनिश्चित कराए।

बच्चे का कल्याण ही सबसे महत्वपूर्ण आधार

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून के तहत पिता बच्चे का प्राकृतिक अभिभावक हो सकता है, लेकिन केवल इस आधार पर उसे कस्टडी नहीं दी जा सकती। कस्टडी का फैसला करते समय बच्चे के सर्वोत्तम हित और उसके समग्र कल्याण को प्राथमिकता देनी होगी।

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कोर्ट ने कहा कि बच्चे के हितों की रक्षा करना न्यायालय की जिम्मेदारी है, भले ही इसके लिए माता-पिता या अभिभावकों की इच्छाओं से अलग निर्णय लेना पड़े।

बेंच ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल आर्थिक संपन्नता या बच्चे के प्रति गहरा भावनात्मक लगाव कस्टडी तय करने का आधार नहीं हो सकता। सभी परिस्थितियों का संतुलित मूल्यांकन करके यह देखना आवश्यक है कि बच्चे के संपूर्ण विकास के लिए कौन-सी व्यवस्था बेहतर होगी।

कोर्ट ने कहा कि बच्चे के उचित पालन-पोषण के लिए माता-पिता दोनों का प्यार, स्नेह, देखभाल, साथ और संरक्षण आवश्यक है। यह केवल बच्चे की जरूरत नहीं, बल्कि उसका बुनियादी मानवाधिकार भी है।

पिता ने फैमिली कोर्ट के फैसले को दी थी चुनौती

मामले में पति-पत्नी की शादी 2016 में हुई थी और 2021 में उनके बेटे का जन्म हुआ।

पति के अनुसार, शुरुआत में वैवाहिक जीवन सामान्य था, लेकिन अगस्त 2023 में पत्नी अपने सामान और बच्चे को लेकर घर छोड़कर चली गई। पति ने आरोप लगाया कि पत्नी ने बिना किसी उचित कारण के उसे छोड़ दिया और वह किसी अन्य व्यक्ति के साथ अवैध संबंध में रह रही है।

उसने यह भी दावा किया कि पत्नी उसे बच्चे से मिलने नहीं दे रही है। पति के अनुसार, वह पत्नी और बेटे से बेहद जुड़ा हुआ है और उनके भोजन, कपड़े, आवास तथा शिक्षा का खर्च उठाता रहा है। उसने दोनों को अपने साथ रखने की इच्छा भी जताई।

बच्चे की अस्थायी कस्टडी प्राप्त करने के लिए पिता ने फैमिली कोर्ट में आवेदन किया था। सितंबर 2024 में फैमिली कोर्ट ने कस्टडी देने से इनकार कर दिया, लेकिन पिता को हर महीने एक बार दो घंटे बच्चे से मिलने और WhatsApp के माध्यम से बातचीत करने की अनुमति दी।

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इस आदेश के खिलाफ पिता ने झारखंड हाईकोर्ट में अपील की।

हाईकोर्ट में दोनों पक्षों की दलीलें

पिता की ओर से अधिवक्ता निखिल रंजन ने दलील दी कि उनके मुवक्किल का बच्चे से गहरा लगाव है और उन्होंने हमेशा उसकी देखभाल की है।

उन्होंने कहा कि पिता प्राकृतिक अभिभावक होने के साथ आर्थिक रूप से सक्षम भी है और बच्चे को बेहतर शिक्षा तथा सुरक्षित भविष्य दे सकता है। उनका दावा था कि मां की स्वतंत्र आय नहीं है और वह अपने परिवार पर निर्भर है, जो बच्चे को बेहतर शैक्षणिक सुविधाएं उपलब्ध नहीं करा सकता।

वहीं, मां की ओर से अधिवक्ता मनोज कुमार चौबे ने तर्क दिया कि केवल आर्थिक स्थिति के आधार पर बच्चे की कस्टडी तय नहीं की जा सकती।

उन्होंने कहा कि बच्चे के उचित पालन-पोषण और विकास के लिए मां का प्यार और देखभाल भी आवश्यक है। मां ने आरोप लगाया कि पति ने एक जिम्मेदार पिता की भूमिका नहीं निभाई और छोटी-छोटी बातों पर उसके साथ मारपीट करता था।

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पिता से मुलाकात सुनिश्चित करने के निर्देश

हाईकोर्ट ने बच्चे की कस्टडी मां के पास बनाए रखते हुए कहा कि इससे पिता और बेटे के बीच संपर्क समाप्त नहीं होना चाहिए।

बेंच ने स्पष्ट किया कि जब बच्चे की कस्टडी एक अभिभावक के पास हो, तब दूसरे अभिभावक को पर्याप्त मुलाकात का अधिकार मिलना चाहिए, ताकि बच्चे का माता-पिता दोनों से सामाजिक, शारीरिक और मनोवैज्ञानिक संपर्क बना रहे।

कोर्ट ने झारखंड राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण को निर्देश दिया कि वह पिता और बच्चे की मुलाकात की व्यवस्था को सुचारु रूप से लागू कराए और उसकी निगरानी करे।

प्राधिकरण को यह सुनिश्चित करने के लिए कहा गया कि पिता बिना किसी अनावश्यक परेशानी के अपने मुलाकात के अधिकार का प्रभावी ढंग से इस्तेमाल कर सके।

इन निर्देशों के साथ हाईकोर्ट ने पिता की अपील का निस्तारण कर दिया और नाबालिग बच्चे की कस्टडी मां के पास बरकरार रखी।

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