सुप्रीम कोर्ट ने वेदांता लिमिटेड और रव्वा ऑयल (सिंगापुर) प्राइवेट लिमिटेड के पक्ष में दिए गए विदेशी मध्यस्थता अवॉर्ड (Arbitral Awards) को लागू करने की अनुमति देने वाले दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ केंद्र सरकार की अपील खारिज कर दी है। कोर्ट ने दशकों पुराने मध्यस्थता अवॉर्ड को लागू होने से रोकने के लिए सरकार की ओर से जारी कानूनी लड़ाई पर सवाल उठाए और कहा कि इससे भारत की मध्यस्थता व्यवस्था पर भरोसा कमजोर हो सकता है।
जस्टिस जेबी परदीवाला और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने सोमवार को सुनवाई के दौरान कहा कि दिल्ली हाईकोर्ट के 1 जुलाई 2026 के फैसले में कोई कानूनी त्रुटि नहीं है। हाईकोर्ट ने वर्ष 2004 और 2016 में दिए गए मध्यस्थता अवॉर्ड को लागू करने की अनुमति दी थी।
केंद्र सरकार के रवैये पर सुप्रीम कोर्ट ने उठाए सवाल
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से सवाल किया कि इतने पुराने मध्यस्थता अवॉर्ड को लागू करने के चरण में भी उसका विरोध क्यों किया जा रहा है।
पीठ ने इस बात पर भी सवाल उठाया कि एक ओर विभिन्न सम्मेलनों और सेमिनारों में मध्यस्थता को बढ़ावा देने की चर्चा होती है, जबकि दूसरी ओर मध्यस्थता अवॉर्ड को लागू कराने के लिए पक्षकारों को लंबे समय तक मुकदमेबाजी करनी पड़ती है।
कोर्ट ने चेतावनी दी कि इस तरह की कानूनी लड़ाई से मध्यस्थता प्रक्रिया की विश्वसनीयता प्रभावित होगी और लोगों का इस व्यवस्था पर भरोसा कम हो सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने विवाद की लंबी अवधि पर भी ध्यान दिया। पहला मध्यस्थता अवॉर्ड 2004 में आया था, जबकि अंतिम अवॉर्ड 2016 में दिया गया था।
1994 के तेल उत्पादन समझौते से जुड़ा है विवाद
यह मामला कृष्णा-गोदावरी बेसिन स्थित रव्वा तेल क्षेत्र के विकास के लिए वर्ष 1994 में केंद्र सरकार और कंपनियों के एक समूह के बीच हुए उत्पादन साझेदारी समझौते से संबंधित है।
समझौते की शर्तों की व्याख्या को लेकर विवाद होने पर कुआलालंपुर में मध्यस्थता कार्यवाही शुरू हुई।
अक्टूबर 2004 में मध्यस्थता ट्रिब्यूनल ने आंशिक अवॉर्ड दिया, लेकिन देय राशि के निर्धारण का मुद्दा लंबित रखा। वर्ष 2011 में मलेशिया की फेडरल कोर्ट ने इस अवॉर्ड को बरकरार रखा।
जुलाई 2014 में केंद्र सरकार ने कंपनियों को कारण बताओ नोटिस जारी कर लगभग 9.9 करोड़ डॉलर की वसूली की मांग की। इसके बाद पुनर्गठित मध्यस्थता ट्रिब्यूनल ने अक्टूबर 2016 में अंतिम अवॉर्ड पारित किया।
केंद्र सरकार ने अवॉर्ड लागू करने का विरोध करते हुए समय-सीमा, सार्वजनिक नीति और ट्रिब्यूनल के functus officio हो जाने का तर्क दिया। सरकार का कहना था कि ट्रिब्यूनल अपना अधिकार पहले ही समाप्त कर चुका था।
दिल्ली हाईकोर्ट ने खारिज की थीं सरकार की आपत्तियां
दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस जसमीत सिंह ने 1 जुलाई 2026 को केंद्र सरकार की आपत्तियां खारिज कर दी थीं।
हाईकोर्ट ने पाया कि मध्यस्थता अवॉर्ड लागू कराने की याचिका निर्धारित समय-सीमा के भीतर दाखिल की गई थी। साथ ही, ट्रिब्यूनल के पास देय राशि का निर्धारण करने का अधिकार बना हुआ था।
हाईकोर्ट ने बैंक गारंटी जारी करने का भी निर्देश दिया था।
केंद्र सरकार ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने सरकार द्वारा वसूली के लिए कारण बताओ नोटिस जारी किए जाने के बाद मध्यस्थता ट्रिब्यूनल के पुनर्गठन से संबंधित हाईकोर्ट की टिप्पणियों का भी उल्लेख किया।
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप से किया इनकार
केंद्र सरकार की अपील खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले में ऐसी कोई त्रुटि नहीं है जिसके आधार पर हस्तक्षेप किया जाए।
पीठ ने कहा, “हमारा विचार है कि हाईकोर्ट द्वारा पारित विवादित फैसले और आदेश में कोई त्रुटि, यहां तक कि कानून संबंधी कोई त्रुटि भी नहीं कही जा सकती।”
इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला बरकरार रखा, जिससे वेदांता लिमिटेड और रव्वा ऑयल के पक्ष में मध्यस्थता अवॉर्ड लागू करने का रास्ता साफ हो गया।
