सरकारी वकीलों की कमी स्थायी समस्या बनी, समाधान के लिए गंभीर कदम उठाने का कोई प्रमाण नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने सरकारी वकील की अनुपस्थिति के कारण ट्रायल कोर्ट द्वारा राज्य सरकार पर लगाए गए 5,000 रुपये के जुर्माने पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि सरकारी अभियोजकों की कमी लगातार बनी रहने वाली समस्या बन गई है और रिकॉर्ड में ऐसा कुछ नहीं है, जिससे पता चले कि राज्य ने इसके समाधान के लिए गंभीर कदम उठाए हैं।

हालांकि, जस्टिस गिरीश कठपालिया ने ट्रायल कोर्ट के उस निर्देश पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दी, जिसमें जुर्माने की रकम अभियोजन निदेशक के वेतन से वसूलने को कहा गया था।

क्या था मामला?

तीस हजारी, दिल्ली में अभियोजन निदेशक के पद पर तैनात मकसूद अहमद ने अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश के 6 अक्टूबर 2026 के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

ट्रायल कोर्ट में बार-बार मामले की सुनवाई टाले जाने के बावजूद सुबह 11:30 बजे तक कोई सरकारी अभियोजक उपस्थित नहीं हुआ था।

इस पर ट्रायल कोर्ट ने राज्य सरकार पर 5,000 रुपये का जुर्माना लगाया और निर्देश दिया कि यह रकम बाद में अभियोजन निदेशक के वेतन से वसूली जाए।

सरकारी वकीलों की भारी कमी का दिया हवाला

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याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रमेश गुप्ता और अधिवक्ता हेमंत गुप्ता पेश हुए।

उन्होंने दलील दी कि ट्रायल कोर्ट को सरकारी अभियोजकों और अतिरिक्त सरकारी अभियोजकों की भारी कमी के बारे में बताया गया था, लेकिन इसके बावजूद जुर्माना लगा दिया गया।

उन्होंने कहा कि सरकारी वकीलों की कमी का मामला पहले से ही हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के समक्ष लंबित है।

यह भी तर्क दिया गया कि कई सरकारी अभियोजक छुट्टी पर थे, जिसके कारण याचिकाकर्ता उचित कार्रवाई नहीं कर सका।

ट्रायल कोर्ट के सामने लंबित मामलों का भारी दबाव

जस्टिस गिरीश कठपालिया ने ट्रायल कोर्ट की परिस्थितियों पर विचार करते हुए कहा:

“विवादित आदेश ट्रायल जज की पीड़ा की स्पष्ट अभिव्यक्ति है, जिन्हें लंबित मामलों के भारी बोझ और जमानत मामलों तथा मुकदमों के शीघ्र निपटारे को लेकर उच्च अदालतों की अपेक्षाओं के दबाव का सामना करना पड़ता है।”

हालांकि, हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता की ओर से किसी विशिष्ट गलत आचरण या कर्तव्य के अनुचित निर्वहन के संबंध में कोई टिप्पणी किए बिना उसके वेतन से जुर्माना वसूलने का निर्देश प्रथम दृष्टया उचित नहीं है।

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इस आधार पर कोर्ट ने अभियोजन निदेशक के वेतन से रकम वसूलने के निर्देश पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दी।

राज्य पर लगाए गए जुर्माने पर रोक से इनकार

राज्य सरकार पर लगाए गए जुर्माने पर भी रोक लगाने की मांग पर हाईकोर्ट ने कहा कि वरिष्ठ अधिवक्ता याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए हैं, राज्य की ओर से नहीं।

कोर्ट ने टिप्पणी की:

“सरकारी अभियोजकों की कमी एक स्थायी समस्या बन गई है, जिसका आपराधिक मुकदमों और यहां तक कि जमानत मामलों के निपटारे पर गंभीर प्रभाव पड़ता है।”

हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि रिकॉर्ड में ऐसा कुछ नहीं है, जिससे सरकारी वकीलों की कमी दूर करने के लिए राज्य द्वारा गंभीर कदम उठाए जाने का संकेत मिले।

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कोर्ट ने ध्यान दिया कि राज्य सरकार ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को चुनौती भी नहीं दी है। इसलिए राज्य पर लगाए गए 5,000 रुपये के जुर्माने पर रोक लगाने से इनकार कर दिया गया।

अगली सुनवाई 3 फरवरी 2027 को

अतिरिक्त सरकारी अभियोजक मंजीत आर्य ने जांच अधिकारी/सब-इंस्पेक्टर अंकित की सहायता से नोटिस स्वीकार किया।

हाईकोर्ट ने उन्हें अगली सुनवाई से कम से कम एक सप्ताह पहले विस्तृत जवाब या स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने की अनुमति दी।

मामले की अगली सुनवाई 3 फरवरी 2027 को होगी।

केस डिटेल्स

केस का नाम: Maqsood Ahmed v. State NCT of Delhi

केस नंबर: CRL.M.C. 7915/2026

पीठ: जस्टिस गिरीश कठपालिया

आदेश की तारीख: 27 अक्टूबर 2026

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