आय से अधिक संपत्ति मामले में अभियोजन को आय के हर संभावित स्रोत को गलत साबित करना जरूरी नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व सब-रजिस्ट्रार की सजा बरकरार रखी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि आय से अधिक संपत्ति के मामले में अभियोजन पक्ष पर यह जिम्मेदारी नहीं है कि वह आरोपी की आय के हर संभावित स्रोत को गलत साबित करे। एक बार ज्ञात आय के मुकाबले अधिक संपत्ति होने का तथ्य स्थापित हो जाए, तो संबंधित लोक सेवक को उस संपत्ति का संतोषजनक हिसाब देना होगा।

जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा की बेंच ने केरल के पूर्व सब-रजिस्ट्रार वी. गोपालकृष्णन की दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए उनकी अपील खारिज कर दी। उन्हें भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 13(2) के साथ पढ़ी जाने वाली धारा 13(1)(e) के तहत दोषी ठहराया गया था।

क्या था मामला?

वी. गोपालकृष्णन ने 13 मई 1971 को लोअर डिवीजन क्लर्क के रूप में सरकारी सेवा शुरू की थी। 22 सितंबर 1993 को वह सब-रजिस्ट्रार बने।

अभियोजन पक्ष का आरोप था कि उन्होंने 1 जनवरी 1993 से 16 जनवरी 2001 के बीच अपनी ज्ञात आय से अधिक संपत्ति अर्जित की।

अभियोजन की गणना के अनुसार, जांच अवधि में उन्होंने 10,43,822 रुपये की संपत्ति अर्जित की, जबकि उनकी संभावित बचत 5,18,693 रुपये थी। इस प्रकार 5,25,129 रुपये की संपत्ति का संतोषजनक स्रोत नहीं था, जो आरोपी और उसके परिवार की आय का 51.88 प्रतिशत था।

विशेष न्यायाधीश ने 27 अगस्त 2009 को उन्हें दोषी ठहराते हुए दो साल के कठोर कारावास और 5,50,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई।

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29 जनवरी 2025 को हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि बरकरार रखी, लेकिन मामले में हुई देरी, आरोपी की उम्र और उसके द्वारा झेली गई परेशानियों को ध्यान में रखते हुए सजा घटाकर एक साल का कठोर कारावास और दो लाख रुपये जुर्माना कर दिया।

आरोपी ने आय और खर्च की गणना पर सवाल उठाए

सुप्रीम कोर्ट में अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि अभियोजन का मामला वास्तविक साक्ष्यों के बजाय अनुमानों पर आधारित था।

उन्होंने घरेलू खर्च की गणना पर आपत्ति जताते हुए कहा कि इसे कृषि परिवार के मानकों के आधार पर निर्धारित किया गया था, जबकि वह सरकारी कर्मचारी थे।

उन्होंने यह भी दावा किया कि उनकी व्यावसायिक-सह-आवासीय इमारत की निर्माण लागत 8,59,153 रुपये नहीं, बल्कि 6,69,000 रुपये थी।

इसके अतिरिक्त उन्होंने चिट फंड में जमा रकम, किराये की आय, वेतन और सामान्य भविष्य निधि (GPF) से लिए गए ऋण से संबंधित गणना पर भी सवाल उठाए।

हर काल्पनिक आय स्रोत की जांच करना अभियोजन की जिम्मेदारी नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि इमारत का मूल्यांकन लोक निर्माण विभाग (PWD) की दरों के आधार पर किया गया था और अपीलकर्ता ने इसे गलत साबित करने के लिए कोई ठोस सामग्री पेश नहीं की।

बेंच ने कहा कि यदि निर्माण लागत में बताई गई 1,90,153 रुपये की अतिरिक्त राशि घटा भी दी जाए, तब भी आय से अधिक संपत्ति 3,34,976 रुपये होगी, जो 33 प्रतिशत से अधिक है।

इसी तरह घरेलू खर्च में दावा किए गए 67,200 रुपये के अंतर को भी घटाने पर 2,67,776 रुपये की आय से अधिक संपत्ति बचती है, जो 26 प्रतिशत से अधिक है।

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सबूत पेश करने की जिम्मेदारी स्पष्ट करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा:

“कानून अभियोजन पक्ष पर यह असंभव जिम्मेदारी नहीं डालता कि वह आय के हर उस काल्पनिक स्रोत को गलत साबित करे, जिससे आरोपी आय प्राप्त करने का दावा कर सकता है।”

अघोषित आय के स्रोतों की जानकारी आरोपी को देनी होगी

सुप्रीम कोर्ट ने State of Tamil Nadu v. R. Soundirarasu के फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13(1)(e) का स्पष्टीकरण जांच एजेंसी से असीमित जांच की अपेक्षा नहीं करता।

बेंच ने कहा:

“कानून जांच एजेंसी से उन स्रोतों की जांच करने की अपेक्षा नहीं करता, जिनका कभी खुलासा नहीं किया गया, जो कभी किसी रिकॉर्ड में दर्ज नहीं थे और जिनकी जानकारी संबंधित अवधि के दौरान अधिकारियों को कभी नहीं दी गई।”

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अघोषित आय के स्रोतों की जानकारी विशेष रूप से आरोपी के पास होती है।

भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 के समकक्ष भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 109 के संदर्भ में बेंच ने कहा कि लोक सेवक को ऐसी संपत्ति के संबंध में संतोषजनक और विश्वसनीय स्पष्टीकरण देना आवश्यक है।

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इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने P. Nallamal v. State और State of Madhya Pradesh v. Awadh Kishore Gupta के फैसलों का भी उल्लेख किया।

मामले के तथ्यों पर विचार करने के बाद बेंच ने निष्कर्ष निकाला:

“किसी भी दृष्टिकोण से देखने पर अपीलकर्ता जांच अवधि के दौरान अर्जित आय से अधिक संपत्ति का संतोषजनक स्पष्टीकरण देने में विफल रहा है।”

सुप्रीम कोर्ट ने अपील खारिज की, दो सप्ताह में आत्मसमर्पण का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट की दोषसिद्धि और उसे बरकरार रखने वाले हाईकोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं है।

बेंच ने अपील खारिज करते हुए 28 मार्च 2025 को दी गई अंतरिम जमानत समाप्त कर दी।

साथ ही, अपीलकर्ता को शेष सजा भुगतने के लिए दो सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया।

केस डिटेल्स

केस टाइटल: V. Gopalakrishanan v. The State of Kerala

केस नंबर: Criminal Appeal No. 5399 of 2025

पीठ: जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा

फैसले की तारीख: 28 अक्टूबर 2026

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