सुप्रीम कोर्ट ने मध्यस्थता अवार्ड (Arbitral Award) को लागू कराने और उसकी वसूली से जुड़ी कानूनी एवं प्रक्रियागत व्यवस्था की समीक्षा करने के लिए भारतीय कानून आयोग से अध्ययन करने का अनुरोध किया है। कोर्ट ने इस बात पर चिंता जताई कि उसके सामने मौजूद मामले में अवार्ड पारित होने के 24 साल से अधिक समय बाद भी पक्षकार उसे लागू कराने के लिए मुकदमेबाजी कर रहे हैं।
जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस अपरेश कुमार सिंह की बेंच ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी कानूनी प्रश्न का निर्णय करने के बाद सुप्रीम कोर्ट से स्पष्टीकरण के नाम पर लंबित निष्पादन कार्यवाही की निगरानी करने या उससे जुड़े प्रत्येक विवाद का फैसला करने की मांग नहीं की जा सकती।
क्या था मामला?
विदेश में संचालित मध्यस्थता कार्यवाही में 10 अगस्त 2002 को मेसर्स रॉयल कंस्ट्रक्शन कंपनी प्राइवेट लिमिटेड के पक्ष में अवार्ड पारित हुआ था। अवार्ड की राशि इराकी दीनार में निर्धारित थी और मेसर्स नेशनल प्रोजेक्ट्स कंस्ट्रक्शन कॉर्पोरेशन को इसका भुगतान करना था।
भारतीय अदालतों में अवार्ड को चुनौती दिए जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 24 फरवरी 2015 के फैसले में न्यायिक हस्तक्षेप सीमित रखने पर जोर देते हुए अवार्ड में दिए गए निर्देश बहाल किए थे।
निष्पादन कार्यवाही के दौरान दिल्ली हाईकोर्ट ने 26 जुलाई 2017 को अवार्ड के तहत देय रकम समझौते की तारीख पर लागू विनिमय दर के अनुसार भारतीय मुद्रा में चुकाने की अनुमति दी।
हालांकि, 17 दिसंबर 2019 को हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने यह आदेश रद्द कर दिया और अवार्ड की रकम भारतीय रुपये में बदलने के लिए प्रासंगिक तारीख से संबंधित महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न सुप्रीम कोर्ट के विचारार्थ प्रमाणित किया।
10 अक्टूबर 2023 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मुद्रा परिवर्तन की कोई तारीख निर्धारित करने का अवसर ही नहीं था। कोर्ट ने समझौते, अवार्ड और अपने 2015 के निर्देशों में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
भुगतान को लेकर दोबारा उठा विवाद
निष्पादन कार्यवाही जारी रहने के दौरान अवार्ड के तहत भुगतान करने वाली कंपनी ने दावा किया कि उसने हाईकोर्ट के आदेशों के अनुसार मूल रकम का भुगतान 2009 में ही कर दिया था।
16 फरवरी 2026 को हाईकोर्ट ने अंतरिम आदेश में पक्षकारों को इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट से स्पष्टीकरण मांगने की स्वतंत्रता दी। अवार्ड प्राप्त करने वाली कंपनी ने इस आदेश को चुनौती दी।
अपीलकर्ता की ओर से अधिवक्ता ऋषभ संचेती और प्रतिवादी की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल विक्रमजीत बनर्जी पेश हुए।
स्पष्टीकरण के नाम पर निष्पादन कार्यवाही की निगरानी नहीं कर सकता सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 2023 में उसके सामने केवल हाईकोर्ट द्वारा भेजा गया महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न था। उस कार्यवाही में संबंधित प्रश्न से बाहर के तथ्यात्मक विवादों की जांच नहीं की गई थी।
बेंच ने स्पष्ट किया कि विदेशी मुद्रा में भुगतान संबंधी प्रश्न का निर्णय करने के बाद जमा या निकाली गई रकम से जुड़े तथ्यात्मक मुद्दों पर स्पष्टीकरण देने का कोई आधार नहीं था।
कोर्ट ने कहा:
“स्पष्टीकरण मांगने के बहाने इस कोर्ट से जारी निष्पादन कार्यवाही की निगरानी की भूमिका निभाने या उसमें उत्पन्न होने वाले प्रत्येक मुद्दे का निर्णय करने की अपेक्षा नहीं की जा सकती।”
बेंच ने कहा कि ऐसे विवादों का निर्णय निष्पादन अदालत और उसके आदेशों के खिलाफ अपील सुनने वाली अदालत को करना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा:
“एक बार इस कोर्ट को भेजे गए महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न का उत्तर दे दिया गया, तो पहले की अपीलीय कार्यवाही का दायरा समाप्त हो गया।”
अवार्ड मिलने के बाद भी वर्षों तक मुकदमेबाजी पर चिंता
फैसले के अंतिम भाग में सुप्रीम कोर्ट ने मध्यस्थता अवार्ड लागू कराने में होने वाली देरी पर चिंता व्यक्त की।
बेंच ने कहा कि संबंधित मध्यस्थता उस समय शुरू हुई थी, जब मध्यस्थता अधिनियम, 1940 लागू था। मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 लागू हुए लगभग तीन दशक बीतने के बावजूद पक्षकार अवार्ड के प्रवर्तन को लेकर मुकदमेबाजी कर रहे हैं।
कोर्ट ने टिप्पणी की:
“मध्यस्थता का उद्देश्य अधूरा रह जाता है, यदि मध्यस्थता प्रक्रिया पूरी कर चुका कोई पक्षकार अवार्ड का लाभ प्राप्त करने के लिए मुकदमेबाजी की एक और लंबी प्रक्रिया से गुजरने को मजबूर हो।”
बेंच ने कहा कि 1996 के अधिनियम की धारा 36 के तहत मध्यस्थता अवार्ड को अदालत की डिक्री की तरह लागू किया जा सकता है। इसके लिए सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 की निष्पादन व्यवस्था का उपयोग होता है।
हालांकि, अवार्ड लागू कराने में कई व्यावहारिक समस्याएं सामने आती हैं, जिनकी विस्तृत समीक्षा आवश्यक है।
कानून आयोग को किन मुद्दों का अध्ययन करने को कहा गया?
सुप्रीम कोर्ट ने कानून आयोग से अवार्ड के तहत देय रकम की समय पर वसूली में आने वाली व्यावहारिक बाधाओं की पहचान करने और अन्य देशों की व्यवस्थाओं का अध्ययन करने का अनुरोध किया।
बेंच ने विशेष रूप से अवार्ड के तहत भुगतान करने वाले पक्ष की संपत्तियों की पहचान और उनके खुलासे, निष्पादन के विभिन्न तरीकों के बीच समन्वय, बार-बार दाखिल की जाने वाली या देरी कराने वाली आपत्तियों के निपटारे तथा निष्पादन पूरा होने में लगने वाले समय की समीक्षा करने को कहा।
कोर्ट ने आयोग से यह भी विचार करने को कहा कि घरेलू और विदेशी मध्यस्थता अवार्ड के लिए अलग-अलग प्रवर्तन प्रक्रियाएं आवश्यक हैं या उचित सुरक्षा उपायों के साथ एक साझा व्यवस्था बनाई जा सकती है।
आयोग से आवश्यक विधायी और प्रक्रियागत सुधारों की सिफारिश करने का भी अनुरोध किया गया।
अपील का निपटारा, निष्पादन अदालत में आपत्तियां उठाने की छूट
सुप्रीम कोर्ट ने अपील का निपटारा करते हुए रजिस्ट्री को फैसले की प्रति भारतीय कानून आयोग के अध्यक्ष को भेजने का निर्देश दिया।
बेंच ने अवार्ड के तहत भुगतान करने वाली कंपनी का वह विविध आवेदन भी खारिज कर दिया, जिसमें 2023 के फैसले में संशोधन की मांग की गई थी। कंपनी का दावा था कि उसके द्वारा जमा की गई रकम अवार्ड प्राप्तकर्ता ने 2009 में निकाल ली थी।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने कंपनी को इन राशियों के समायोजन या सेट-ऑफ से संबंधित सभी आपत्तियां निष्पादन अदालत के समक्ष उठाने की स्वतंत्रता दी।
केस डिटेल्स
केस टाइटल: M/s Royal Construction Company Pvt. Ltd. v. M/s National Projects Construction Corporation
केस नंबर: Civil Appeal arising out of SLP (C) No. 14005 of 2026, with M.A. Diary No. 48152 of 2026 in Civil Appeal No. 1991 of 2019
पीठ: जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस अपरेश कुमार सिंह
फैसले की तारीख: 28 अक्टूबर 2026
