आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 की धारा 5-A के तहत अदालत के निर्देश पर जांच कराए जाने के बाद धारा 6 के अंतर्गत जारी नई घोषणा भी धारा 4(1) की अधिसूचना से एक वर्ष के भीतर प्रकाशित होनी चाहिए। नई घोषणा को पिछली घोषणा का परिशिष्ट (Addendum) बताकर इस समय-सीमा से छूट नहीं ली जा सकती।
जस्टिस रवि नाथ तिलहरी और जस्टिस सुनीता गंधम की डिवीजन बेंच ने इस सिद्धांत के आधार पर चार रिट अपीलें स्वीकार करते हुए पश्चिम गोदावरी जिले के दोरासानीपाडु और द्वारका तिरुमला में अपीलकर्ताओं की जमीन से संबंधित अधिग्रहण कार्यवाही रद्द कर दी।
क्या था मामला?
राज्य सरकार ने भूमि अधिग्रहण अधिनियम की धारा 4(1) और धारा 17(4) के तहत दो अधिसूचनाएं जारी की थीं। इनमें धारा 5-A के तहत आपत्तियों की जांच की प्रक्रिया को आवश्यक नहीं माना गया था।
पहली अधिसूचना 2 फरवरी 2005 को दोरासानीपाडु गांव की 103 एकड़ 8 सेंट भूमि के लिए और दूसरी 23 फरवरी 2005 को द्वारका तिरुमला गांव में भवनों तथा शेड से संबंधित 0.49½ एकड़ भूमि के लिए जारी हुई थी।
इसके बाद धारा 6 के तहत क्रमशः 10 मार्च और 16 मार्च 2005 को घोषणाएं प्रकाशित की गईं।
29 अगस्त 2005 को हाईकोर्ट ने W.P. No. 5784/2005 और संबंधित याचिकाओं में पाया कि धारा 5-A की जांच से छूट देने के लिए आवश्यक तात्कालिकता मौजूद नहीं थी। कोर्ट ने भूमि अधिग्रहण अधिकारी को धारा 5-A के तहत जांच करने का निर्देश दिया।
बिना नई घोषणा जारी किए धारा 9(3) और 10 के तहत दिए गए नोटिस भी 27 दिसंबर 2005 को रद्द कर दिए गए।
इसके बाद सरकार ने 12 अप्रैल 2007 को धारा 6 के तहत नई घोषणा प्रकाशित की।
इस घोषणा को चुनौती देने वाली याचिकाएं एकल पीठ ने 8 जून 2010 को खारिज कर दीं। एकल पीठ ने माना कि पहले की घोषणाएं रद्द नहीं हुई थीं और वर्ष 2007 की घोषणा उन्हीं की निरंतरता थी, जिस पर शुद्धिपत्र और परिशिष्ट का सिद्धांत लागू होता था।
अपीलकर्ताओं ने एक वर्ष की समय-सीमा का मुद्दा उठाया
रिट अपील संख्या 848/2010 में अपीलकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता के.एस. मूर्ति और अधिवक्ता पी.एस.पी. सुरेश कुमार पेश हुए।
उन्होंने दलील दी कि स्थगन आदेश की अवधि हटाने के बाद भी 2007 की घोषणा धारा 4(1) की अधिसूचना से एक वर्ष के बाद प्रकाशित हुई थी। इसलिए अधिग्रहण कार्यवाही समाप्त हो चुकी थी।
उन्होंने यह भी कहा कि धारा 6 के तहत दूसरी घोषणा को पहली घोषणा का परिशिष्ट मानने का कोई कानूनी आधार नहीं है।
इस संबंध में Padma Sundara Rao, Vijay Narayan Thatte और Anil Kumar Gupta सहित अन्य फैसलों का हवाला दिया गया।
अन्य अपीलों में अधिवक्ता पी. दुर्गा प्रसाद और एस. लक्ष्मीनारायण रेड्डी की ओर से अधिवक्ता एस. सुमन राजू ने इन दलीलों का समर्थन किया।
प्रतिवादियों ने नई घोषणा को पुरानी घोषणा का हिस्सा बताया
श्री वेंकटेश्वर स्वामीवारी देवस्थानम की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता वी. वेणुगोपाल राव और अधिवक्ता पुलिपति राधिका ने कहा कि पहले दौर की मुकदमेबाजी में धारा 4(1) की अधिसूचना या धारा 6 की घोषणाओं को रद्द नहीं किया गया था।
उनका तर्क था कि 2007 की घोषणा पहले की घोषणाओं का परिशिष्ट थी, इसलिए एक वर्ष की समय-सीमा लागू नहीं होती।
उन्होंने यह भी कहा कि W.P. No. 7223/2005 में दिए गए स्थगन आदेश के कारण अधिग्रहण कार्यवाही रुकी रही थी।
भूमि अधिग्रहण के सरकारी अधिवक्ता ने भी इन दलीलों का समर्थन किया।
धारा 6 की समय-सीमा अनिवार्य: हाईकोर्ट
डिवीजन बेंच ने सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के Padma Sundara Rao फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि धारा 6(1) के परंतुक में निर्धारित एक वर्ष की समय-सीमा अनिवार्य है। इसकी गणना से केवल स्थगन आदेश की अवधि को बाहर किया जा सकता है।
कोर्ट ने पाया कि स्थगन अवधि हटाने के बाद भी 12 अप्रैल 2007 की घोषणा एक वर्ष की सीमा से बाहर थी और इस तथ्य पर कोई विवाद नहीं था।
वर्ष 2005 में पारित आदेशों के प्रभाव पर बेंच ने कहा:
“भले ही विद्वान एकल न्यायाधीश ने धारा 6 के तहत अधिसूचना को स्पष्ट रूप से रद्द नहीं किया हो, लेकिन धारा 5-A के तहत जांच कराने का निर्देश दिए जाने का आवश्यक परिणाम धारा 6(1) के तहत प्रकाशित घोषणा का स्वतः निरस्त होना या रद्द माना जाना होगा।”
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दोनों घोषणाओं की कानूनी स्थिति अलग थी। पहली घोषणा बिना जांच के जारी हुई थी, जबकि दूसरी जांच के बाद सरकार की संतुष्टि के आधार पर प्रकाशित की गई थी।
बेंच ने कहा:
“यह नहीं कहा जा सकता कि जांच के बाद की गई दूसरी घोषणा, पहली घोषणा की निरंतरता है।”
परिशिष्ट के जरिए समय-सीमा नहीं बढ़ाई जा सकती
हाईकोर्ट ने शुद्धिपत्र या परिशिष्ट संबंधी तर्क खारिज करते हुए कहा कि यह सिद्धांत धारा 4(1) की अधिसूचना पर ही लागू हो सकता है। इसके आधार पर धारा 6(1) की वैधानिक समय-सीमा नहीं बढ़ाई जा सकती।
बेंच ने स्पष्ट किया:
“इस कानूनी सिद्धांत पर कोई विवाद नहीं है कि धारा 6(1) के तहत एक से अधिक घोषणाएं या प्रकाशन हो सकते हैं, लेकिन हमारे विचार में, पद्म सुंदर राव के फैसले के अनुसार, स्थगन आदेश की अवधि हटाने के बाद ऐसी सभी घोषणाएं वैधानिक समय-सीमा के भीतर की जानी चाहिए।”
कोर्ट ने Moti Ratan Estates के फैसले को भी अलग बताया, क्योंकि वर्तमान मामले में उठाया गया प्रश्न उस फैसले में विचाराधीन नहीं था।
एक अन्य याचिका में दिए गए स्थगन आदेश के संबंध में बेंच ने कहा:
“अलग भूमि के संबंध में किसी एक व्यक्ति के मामले में दिया गया स्थगन आदेश अन्य याचिकाकर्ताओं के मामलों पर लागू नहीं किया जा सकता, जिनके मामलों में अदालत ने विशिष्ट निर्देश दिया था और उसका पालन भी किया गया था।”
अपीलकर्ताओं की जमीन का अधिग्रहण रद्द
आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने चारों रिट अपीलें स्वीकार करते हुए एकल पीठ का 8 जून 2010 का आदेश रद्द कर दिया।
बेंच ने 10 मार्च 2005, 16 मार्च 2005 और 12 अप्रैल 2007 की घोषणाओं को केवल अपीलकर्ताओं की भूमि के संबंध में रद्द किया।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इन जमीनों के लिए मौजूदा अधिग्रहण कार्यवाही आगे नहीं बढ़ सकती। हालांकि, प्रतिवादियों को कानून के अनुसार नए सिरे से कार्यवाही शुरू करने की स्वतंत्रता दी गई।
हाईकोर्ट ने मुकदमे के खर्च के संबंध में कोई आदेश नहीं दिया।
केस डिटेल्स
केस का नाम: Avanigadda Seetha Rama Rao and Others v. State of Andhra Pradesh and Others
केस नंबर: Writ Appeal Nos. 848, 637, 849 and 919 of 2010
पीठ: जस्टिस रवि नाथ तिलहरी और जस्टिस सुनीता गंधम
फैसले की तारीख: 14 अक्टूबर 2026
