सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 11 के तहत मध्यस्थ नियुक्त करने की शक्ति का प्रयोग करने वाला हाईकोर्ट धारा 29A के तहत मध्यस्थ का कार्यकाल नहीं बढ़ा सकता। यह अधिकार केवल अधिनियम की धारा 2(1)(e) में परिभाषित ‘कोर्ट’ को प्राप्त है।
जस्टिस उज्जल भुयान और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की बेंच ने इस मुद्दे पर पटना हाईकोर्ट के निष्कर्ष को रद्द कर दिया। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने तीन सदस्यीय मध्यस्थता ट्रिब्यूनल की शर्त छोड़ने और दिवाला कार्यवाही का सामना कर रही कंपनी के मध्यस्थता जारी रखने के अधिकार संबंधी हाईकोर्ट के निष्कर्षों को बरकरार रखा।
कोर्ट ने साउथ बिहार पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड की अपीलें खारिज करते हुए एकमात्र मध्यस्थ को छह सप्ताह के भीतर अवार्ड पारित करने का निर्देश दिया।
क्या था मामला?
साउथ बिहार पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड ने 31 दिसंबर 2013 को इंडिया पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड और उसकी विशेष प्रयोजन कंपनी इंडिया पावर कॉर्पोरेशन (बोधगया) लिमिटेड के साथ डिस्ट्रीब्यूशन फ्रेंचाइजी समझौता किया था।
समझौते की धारा 17.2.5 में विवादों के समाधान के लिए तीन मध्यस्थों वाले ट्रिब्यूनल का प्रावधान था।
विवाद उत्पन्न होने पर पटना हाईकोर्ट ने 2018 में पक्षकारों की सहमति से जस्टिस शशांक कुमार सिंह को एकमात्र मध्यस्थ नियुक्त किया। उनके कार्य जारी नहीं रख पाने पर हाईकोर्ट ने 10 मार्च 2021 को पक्षकारों की सहमति से पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा को मध्यस्थ नियुक्त किया।
बाद में सहमति से मध्यस्थ का कार्यकाल छह महीने बढ़ाया गया। इसके बाद प्रतिवादियों ने चार महीने के अतिरिक्त विस्तार के लिए हाईकोर्ट में आवेदन किया।
कंपनी ने इसका विरोध करते हुए कहा कि हाईकोर्ट को कार्यकाल बढ़ाने का अधिकार नहीं है और समझौते के अनुसार तीन सदस्यीय ट्रिब्यूनल आवश्यक था।
15 सितंबर 2023 को पटना हाईकोर्ट ने माना कि कंपनी अपने आचरण से तीन सदस्यीय ट्रिब्यूनल की शर्त पर आपत्ति करने का अधिकार छोड़ चुकी थी। हाईकोर्ट ने यह भी माना कि दिवाला कार्यवाही के बावजूद कॉर्पोरेट देनदार मध्यस्थता जारी रख सकता है और धारा 29A के तहत हाईकोर्ट को कार्यकाल बढ़ाने का अधिकार है। इसके आधार पर कार्यकाल चार महीने बढ़ा दिया गया।
अपीलें लंबित रहने के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने 21 जनवरी 2026 को पटना जिला अदालत को कार्यकाल विस्तार के अलग आवेदन पर निर्णय लेने का निर्देश दिया। इसके बाद प्रधान जिला न्यायाधीश-सह-वाणिज्यिक न्यायालय, पटना ने 23 मार्च 2026 को मध्यस्थ का कार्यकाल छह महीने बढ़ा दिया।
पक्षकारों की दलीलें
अपीलकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सुंदरम ने कहा कि समझौते के तहत केवल तीन सदस्यीय ट्रिब्यूनल ही मध्यस्थता कर सकता था। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि पहला प्रतिवादी केवल औपचारिक पक्षकार था और कॉर्पोरेट देनदार का अस्तित्व समाप्त हो चुका था।
संबंधित अपील में वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन ने इन दलीलों का समर्थन करते हुए नया तीन सदस्यीय ट्रिब्यूनल गठित करने की मांग की।
दूसरे प्रतिवादी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता आत्माराम नाडकर्णी ने हाईकोर्ट के फैसले का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि मध्यस्थता कार्यवाही काफी आगे बढ़ चुकी है और इस चरण पर उसे समाप्त करने से प्रतिवादियों को गंभीर नुकसान होगा।
धारा 11 और धारा 29A के अधिकार अलग-अलग
सुप्रीम कोर्ट ने State of West Bengal v. Associated Contractors, Jagdeep Chowgule v. Sheela Chowgule और C. Velusamy v. K. Indhera के फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि धारा 11 का संबंध केवल मध्यस्थता ट्रिब्यूनल की नियुक्ति से है।
बेंच ने कहा:
“धारा 11 में उल्लिखित सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट को धारा 2(1)(e) में परिभाषित ‘कोर्ट’ नहीं माना जा सकता।”
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 29A के तहत कार्यकाल विस्तार का अधिकार मूल क्षेत्राधिकार वाले प्रधान सिविल न्यायालय या सामान्य मूल सिविल क्षेत्राधिकार रखने वाले हाईकोर्ट को है।
सुप्रीम कोर्ट ने धारा 29A के तहत अपने अधिकार क्षेत्र के संबंध में पटना हाईकोर्ट के निष्कर्ष को कानूनी रूप से स्पष्टतः अस्थिर बताते हुए रद्द कर दिया।
हालांकि, बेंच ने कहा कि जिला अदालत पहले ही मध्यस्थ का कार्यकाल बढ़ा चुकी है, इसलिए इस निष्कर्ष से मामले के परिणाम पर कोई महत्वपूर्ण प्रभाव नहीं पड़ेगा।
सहमति देने के बाद तीन सदस्यीय ट्रिब्यूनल की मांग नहीं कर सकती कंपनी
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि अपीलकर्ता ने दो बार हाईकोर्ट के समक्ष एकमात्र मध्यस्थ की नियुक्ति पर सहमति दी थी और नियुक्ति संबंधी आदेशों को कभी चुनौती नहीं दी।
कंपनी ने छह महीने के कार्यकाल विस्तार पर भी सहमति दी थी। इसके अतिरिक्त उसने मध्यस्थ के समक्ष काउंटर क्लेम और पूरक काउंटर क्लेम भी दाखिल किए थे।
बेंच ने धारा 4 और 16 तथा Union of India v. Pam Development के फैसले का उल्लेख करते हुए कहा:
“अपने आचरण से अपीलकर्ता ने स्पष्ट रूप से कानून में निर्धारित समय-सीमा के भीतर मध्यस्थता ट्रिब्यूनल के गठन पर आपत्ति करने का अपना अधिकार छोड़ दिया था।”
इस आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने तीन सदस्यीय ट्रिब्यूनल संबंधी आपत्ति खारिज कर दी।
दिवाला कार्यवाही के दौरान भी कंपनी अपना दावा आगे बढ़ा सकती है
सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाईकोर्ट के इस निष्कर्ष से भी सहमति जताई कि दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (IBC) की धारा 14 के तहत मोरेटोरियम कॉर्पोरेट देनदार को अपनी बकाया रकम की वसूली के लिए मध्यस्थता कार्यवाही जारी रखने से नहीं रोकता।
बेंच ने कहा:
“मोरेटोरियम से कॉर्पोरेट देनदार के किसी दावे, जैसे मध्यस्थता संबंधी दावे, पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा। ऐसा दावा सफल होने पर उसकी वित्तीय स्थिति मजबूत होगी और कॉर्पोरेट देनदार का मूल्य बढ़ेगा।”
कोर्ट ने यह भी पाया कि समाधान पेशेवर ने मध्यस्थता कार्यवाही आगे बढ़ाने के लिए अधिकृत हस्ताक्षरकर्ताओं को अनुमति दी थी, जिसे ऋणदाताओं की समिति ने मंजूरी दी थी।
छह सप्ताह में मध्यस्थता अवार्ड पारित करने का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने धारा 29A के तहत अधिकार क्षेत्र संबंधी पटना हाईकोर्ट का निष्कर्ष रद्द कर दिया, लेकिन तीन सदस्यीय ट्रिब्यूनल की शर्त छोड़ने और IBC के तहत मध्यस्थता जारी रखने के अधिकार संबंधी निष्कर्ष बरकरार रखे।
बेंच ने बिना किसी खर्च संबंधी आदेश के अपीलें खारिज कर दीं।
साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने 12 फरवरी 2024 के अपने उस आदेश को हटा दिया, जिसके तहत मध्यस्थता अवार्ड घोषित करने पर रोक लगाई गई थी। कोर्ट ने एकमात्र मध्यस्थ को छह सप्ताह के भीतर अवार्ड पारित करने का निर्देश दिया।
केस डिटेल्स
केस का नाम: South Bihar Power Distribution Company Ltd. v. India Power Corporation Ltd. & Anr.
केस नंबर: Civil Appeal No. 9313 of 2026 और Civil Appeal No. 9325 of 2026
पीठ: जस्टिस उज्जल भुयान और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर
फैसले की तारीख: 28 अक्टूबर 2026
