दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि जब किसी समझौते में विवादों की सुनवाई के लिए किसी विशेष स्थान की अदालतों का अधिकार क्षेत्र तय किया गया हो, तो केवल प्रतिवादी के दूसरे शहर में रहने के आधार पर उस शर्त को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (MoU) के आधार पर कानूनी अधिकारों का दावा करने वाले पक्षकार को उसकी सभी शर्तों का पालन करना होगा, जिनमें अधिकार क्षेत्र से संबंधित शर्त भी शामिल है।
जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस भरत पाराशर की डिवीजन बेंच ने शेयर ट्रांसफर विवाद में दाखिल अपील खारिज करते हुए कहा कि संबंधित MoU से उत्पन्न विवादों की सुनवाई केवल उत्तर प्रदेश के बरेली की सक्षम अदालतों में हो सकती है।
हाईकोर्ट ने सिंगल जज के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र के अभाव में वादपत्र वापस करने का निर्देश दिया गया था।
शेयर ट्रांसफर विवाद में दिल्ली की अदालत में दाखिल हुआ था मुकदमा
मामला रेहबर फूड इंडस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड के शेयरों के ट्रांसफर से संबंधित है।
वादी रेहबर ग्रुप/मरया ग्रुप के सदस्य हैं, जिनके पास कंपनी के 50 प्रतिशत शेयर थे।
समूह के सदस्यों के बीच 12 दिसंबर 2022 को बरेली में एक MoU पर हस्ताक्षर किए गए थे। इसमें समूह के सदस्यों द्वारा शेयरों के ट्रांसफर की शर्तें निर्धारित की गई थीं।
समझौते के अनुसार, किसी सदस्य को अपने शेयर बेचने से पहले उन्हें समूह के भीतर ही प्रस्तावित करना था। समूह के बाहर किसी व्यक्ति को शेयर ट्रांसफर करने के लिए अन्य सभी सदस्यों की सर्वसम्मत लिखित सहमति आवश्यक थी।
विवाद उस समय शुरू हुआ जब प्रतिवादी संख्या 3 फिरोज अहमद जहीर अहमद शेख ने अपने 1,45,833 इक्विटी शेयर प्रतिवादी संख्या 1 राशिद कुरैशी को ट्रांसफर करने का प्रस्ताव दिया। राशिद कुरैशी समूह के सदस्य नहीं थे।
20 जनवरी 2026 को वादियों ने कुछ शर्तों के साथ इस ट्रांसफर पर सहमति दी।
इस सहमति के लिए यह आश्वासन आवश्यक था कि सभी सदस्यों की पूर्व लिखित अनुमति के बिना शेयर समूह के बाहर ट्रांसफर नहीं किए जाएंगे।
216 रुपये प्रति शेयर की बोली के बाद बढ़ा विवाद
वादियों का आरोप था कि प्रतिवादी संख्या 1 ने समूह के सदस्यों के साथ बाहरी शेयरधारकों से भी बोलियां आमंत्रित करके सहमति की शर्तों का उल्लंघन किया।
26 जून 2026 को प्रतिवादी संख्या 2 मोहम्मद इमरान को 216 रुपये प्रति शेयर की दर से सफल बोलीदाता घोषित किया गया।
इसके बाद वादियों ने दिल्ली में मुकदमा दाखिल कर शेयर ट्रांसफर को अमान्य घोषित करने, निषेधाज्ञा जारी करने और समझौते के विशिष्ट पालन की मांग की।
प्रतिवादी संख्या 2 ने अदालत के क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र पर आपत्ति जताई।
उसने MoU की धारा 9(f) और 10 का हवाला देते हुए कहा कि समझौते से संबंधित विवादों की सुनवाई के लिए बरेली की अदालतों को चुना गया था।
6 अक्टूबर 2026 को दिल्ली हाईकोर्ट के सिंगल जज ने सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश VII नियम 10 के तहत वादपत्र वापस करने का निर्देश दिया।
इसी आदेश को डिवीजन बेंच के समक्ष चुनौती दी गई।
वादी पक्ष ने कहा, समझौते से इनकार करने वाले प्रतिवादी उसकी शर्त का लाभ नहीं ले सकते
अपीलकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता पराग पी. त्रिपाठी ने अधिवक्ता उदिता सिंघा, करण ग्रोवर और अपराजितो सेन के साथ दलीलें पेश कीं।
उन्होंने कहा कि प्रतिवादी एक ही समझौते को अपने हित के अनुसार स्वीकार और अस्वीकार नहीं कर सकते।
उनका तर्क था कि जब प्रतिवादी स्वयं MoU के अस्तित्व या उसकी वैधता को विवादित बता रहे हैं, तो वे उसी समझौते की अधिकार क्षेत्र संबंधी शर्त का सहारा लेकर दिल्ली की अदालत का अधिकार क्षेत्र समाप्त नहीं कर सकते।
अपीलकर्ताओं ने यह भी कहा कि प्रतिवादी संख्या 1 दिल्ली में रहता है। इसके अलावा रेहबर ग्रुप की शेयरधारिता से संबंधित दो अन्य मुकदमे भी दिल्ली में लंबित हैं।
दूसरी ओर, प्रतिवादी संख्या 2 की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि वादियों का पूरा मुकदमा MoU के कथित उल्लंघन पर आधारित है। इसलिए वे समझौते में निर्धारित अधिकार क्षेत्र की शर्त से बंधे हैं।
उन्होंने कहा कि अन्य मुकदमे अलग आधारों पर दाखिल किए गए थे और उनके आधार पर मौजूदा विवाद में दिल्ली की अदालतों को अधिकार क्षेत्र प्राप्त नहीं हो सकता।
प्रतिवादियों की ओर से अधिवक्ता मिलिंद श्रीवास्तव और मोहित गुप्ता तथा वरिष्ठ अधिवक्ता अंकित जैन के साथ अधिवक्ता मनमीत सिंह, अनुग्रह रॉबिन फ्रे, पलक नागर और रिशिता खंडेलवाल भी पेश हुए।
MoU की सभी शर्तें माननी होंगी, केवल सुविधाजनक शर्तें नहीं: हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने MoU की धारा 9(f) और 10 का संयुक्त रूप से अध्ययन करते हुए पाया कि पक्षकारों का उद्देश्य समझौते से उत्पन्न विवादों को केवल बरेली की अदालतों के अधिकार क्षेत्र में रखना था।
पीठ ने कहा कि वादियों ने अपने कानूनी दावों का आधार स्वयं MoU को बनाया है। ऐसी स्थिति में वे उसके अधिकार क्षेत्र संबंधी प्रावधान को अलग नहीं कर सकते।
कोर्ट ने कहा:
“प्रतिवादियों द्वारा गुण-दोष के आधार पर MoU से इनकार किए जाने से न तो विवाद की प्रकृति बदल सकती है और न ही वादियों के लिए उपलब्ध न्यायिक मंच का दायरा बढ़ सकता है।”
पीठ ने स्पष्ट किया कि प्रतिवादियों द्वारा समझौते को चुनौती देने मात्र से वादियों को उस स्थान के अतिरिक्त किसी अन्य अदालत में मुकदमा चलाने का अधिकार नहीं मिल जाता, जिस पर वे पहले ही सहमत हो चुके हैं।
हाईकोर्ट ने कहा:
“जब वादियों ने अपना मामला उक्त MoU के आधार पर स्थापित किया है, तो उन्हें उसकी सभी शर्तों का पालन करना होगा, जिसमें उसमें शामिल अधिकार क्षेत्र संबंधी शर्त भी है।”
दिल्ली में प्रतिवादी का निवास होना पर्याप्त नहीं
हाईकोर्ट ने प्रतिवादी संख्या 1 के दिल्ली में रहने के आधार पर क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र का दावा भी स्वीकार नहीं किया।
पीठ ने कहा:
“किसी एक प्रतिवादी का निवास स्थान उस न्यायिक मंच को बदल नहीं सकता, जिस पर वादियों ने स्वयं MoU के हस्ताक्षरकर्ता होने के नाते उससे उत्पन्न विवादों के निपटारे के लिए सहमति दी है।”
कोर्ट ने पाया कि प्रतिवादी संख्या 2 दिल्ली में नहीं रहता और वादियों ने यह भी नहीं दिखाया कि वाद का कोई महत्वपूर्ण कारण दिल्ली में उत्पन्न हुआ था।
इसलिए वादी CPC की धारा 20 के तहत दिल्ली की अदालतों का क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र स्थापित करने में विफल रहे।
पीठ ने यह भी कहा कि किसी समझौते को स्वीकार करने और उसी समय उससे इनकार करने पर रोक लगाने वाला सिद्धांत (Doctrine of Approbation and Reprobation) यदि लागू होता है, तो वह वादियों के खिलाफ लागू होगा।
ऐसा इसलिए क्योंकि वादी MoU के आधार पर अधिकार लागू कराना चाहते थे, लेकिन उसी समझौते की अधिकार क्षेत्र संबंधी शर्त को मानने से इनकार कर रहे थे।
दिल्ली में अन्य मुकदमे लंबित होने से अधिकार क्षेत्र नहीं मिलेगा
हाईकोर्ट ने रेहबर ग्रुप की शेयरधारिता से संबंधित दिल्ली में दाखिल अन्य मुकदमों पर भी विचार किया।
पीठ ने पाया कि मोहम्मद इरफान और अन्य की ओर से दाखिल पहला मुकदमा संबंधित MoU पर आधारित नहीं था और उसका निपटारा समझौते के आधार पर डिक्री पारित करके किया गया था।
दूसरे मुकदमे में क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र से संबंधित आपत्ति पर अभी निर्णय नहीं हुआ था।
कोर्ट ने कहा:
“केवल इस तथ्य से कि कोई मुकदमा इस अदालत में लंबित है, मौजूदा कार्यवाही में दिल्ली की अदालतों को स्वतः क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र प्राप्त नहीं हो सकता।”
इस प्रकार हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि अलग-अलग मुकदमों में अधिकार क्षेत्र का निर्धारण संबंधित विवाद और उसके कानूनी आधार के अनुसार किया जाएगा।
अपील खारिज, बरेली की सक्षम अदालत में जाने की छूट
डिवीजन बेंच ने सिंगल जज के 6 अक्टूबर 2026 के आदेश में कोई कानूनी त्रुटि नहीं पाई।
हाईकोर्ट ने अपील और उससे संबंधित लंबित आवेदनों को खारिज कर दिया।
हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसकी टिप्पणियां केवल क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र के प्रश्न तक सीमित हैं। इन्हें विवाद के गुण-दोष या MoU की धारा 9 में निर्धारित विवाद निपटान प्रक्रिया की लागू होने की स्थिति पर कोई निर्णय नहीं माना जाएगा।
पीठ ने वादियों को बरेली की सक्षम अदालत के समक्ष उपलब्ध कानूनी उपाय अपनाने की स्वतंत्रता दी।
साथ ही स्पष्ट किया कि उन्हें परिसीमा अधिनियम, 1963 की धारा 14 का लाभ भी कानून के अनुसार उपलब्ध होने पर मिल सकता है।
केस डिटेल्स
केस का नाम: Shakeel Qureshi & Ors. vs. Rashid Qureshi & Ors.
केस नंबर: FAO(OS) (COMM) 282/2026
पीठ: जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस भरत पाराशर
फैसले की तारीख: 27 अक्टूबर 2026
