इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने कहा है कि यदि पक्षकारों के बीच हुए अनुबंध में चक्रवृद्धि ब्याज का कोई प्रावधान नहीं है, तो आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल सालाना चक्रवृद्धि ब्याज या ब्याज पर ब्याज देने का आदेश नहीं दे सकता। हाईकोर्ट ने सड़क निर्माण से जुड़े एक विवाद में ट्रिब्यूनल के फैसले को आंशिक रूप से संशोधित करते हुए चक्रवृद्धि ब्याज की जगह साधारण ब्याज देने का निर्देश दिया है।
मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और जस्टिस जसप्रीत सिंह की डिवीजन बेंच ने मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 37 के तहत उत्तर प्रदेश सरकार की अपील आंशिक रूप से स्वीकार की। हालांकि, कोर्ट ने ब्याज की दर सहित ट्रिब्यूनल के फैसले के अन्य हिस्सों को बरकरार रखा।
क्या था मामला?
विवाद मथुरा जिले में राया-मथ रोड के चौड़ीकरण और सुदृढ़ीकरण के लिए दिए गए निर्माण ठेके से संबंधित था।
ठेकेदार मेसर्स एपेक्स कंस्ट्रक्शन कंपनी ने दावा किया कि उसने 31 अगस्त 2009 को निर्माण कार्य पूरा कर लिया था। इसके बाद कंपनी ने उत्तर प्रदेश सरकार के खिलाफ तीन सदस्यीय आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल के समक्ष ₹23,79,90,727 का दावा प्रस्तुत किया।
ट्रिब्यूनल ने 30 जुलाई 2017 को दिए अपने फैसले में पाया कि ठेकेदार ने दावा किए गए 12 किलोमीटर के बजाय 11.8 किलोमीटर सड़क का निर्माण किया था।
ट्रिब्यूनल ने ठेकेदार के अंतिम बिल को गलत और भ्रामक पाया तथा पांच प्रतिशत वार्षिक मूल्य वृद्धि का दावा भी खारिज कर दिया।
हालांकि, ट्रिब्यूनल ने ठेकेदार को ₹1,56,79,034.65 का हकदार माना। इस रकम पर 1 सितंबर 2009 से भुगतान होने तक 14 प्रतिशत वार्षिक चक्रवृद्धि ब्याज देने का आदेश दिया गया। इसके अतिरिक्त ₹10 लाख मुकदमे के खर्च के रूप में देने का निर्देश भी दिया गया।
ट्रिब्यूनल ने राज्य सरकार के प्रतिदावे की ₹1,39,619 की रकम को 14 प्रतिशत ब्याज सहित ठेकेदार को देय राशि से घटाने का आदेश दिया।
राज्य सरकार ने इस फैसले को मध्यस्थता और सुलह अधिनियम की धारा 34 के तहत चुनौती दी, लेकिन लखनऊ के वाणिज्यिक न्यायालय संख्या-1 ने 9 फरवरी 2023 को उसकी याचिका खारिज कर दी।
इसके बाद राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में अपील दाखिल की।
राज्य सरकार और ठेकेदार की दलीलें
राज्य सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एवं अपर महाधिवक्ता प्रीतीश कुमार और अपर मुख्य स्थायी अधिवक्ता तुषार वर्मा ने पक्ष रखा।
उन्होंने दलील दी कि अनुबंध की शर्त 48.1 के तहत ठेकेदार को कार्य पूर्णता प्रमाणपत्र जारी नहीं किया गया था। इसके बावजूद ट्रिब्यूनल ने निर्माण कार्य पूरा होने का निष्कर्ष निकाला, जो अनुबंध की शर्तों को दोबारा लिखने के समान है।
राज्य सरकार ने ब्याज के आदेश पर भी आपत्ति जताई।
उसकी ओर से कहा गया कि अनुबंध में ब्याज देने का कोई प्रावधान नहीं था। इसके अतिरिक्त ब्याज अधिनियम, 1978 की धारा 3(3)(c) ब्याज पर ब्याज देने की अनुमति नहीं देती। इस अधिनियम में ‘कोर्ट’ की परिभाषा में मध्यस्थ को भी शामिल किया गया है।
दूसरी ओर, प्रतिवादियों की ओर से अधिवक्ता अक्षत कुमार, दुर्गेंद्र कुमार तिवारी, संजय कुमार श्रीवास्तव और के.के. अरोड़ा ने दलील दी कि निर्माण कार्य पूरा होने के संबंध में ट्रिब्यूनल के निष्कर्ष साक्ष्यों पर आधारित तथ्यात्मक निष्कर्ष हैं।
उन्होंने कहा कि मध्यस्थता और सुलह अधिनियम की धारा 31(7) ट्रिब्यूनल को ब्याज देने का अधिकार देती है। सालाना आधार पर ब्याज की गणना बैंकिंग व्यवस्था की प्रचलित प्रक्रिया के अनुरूप है।
कार्य पूर्णता प्रमाणपत्र नहीं होने से निर्माण अधूरा नहीं माना जा सकता
हाईकोर्ट ने निर्माण कार्य पूरा नहीं होने संबंधी राज्य सरकार की दलील खारिज कर दी।
बेंच ने पाया कि राज्य सरकार ने ठेकेदार को कभी यह नोटिस नहीं दिया कि निर्माण कार्य अधूरा है, काम की गुणवत्ता खराब है या घटिया सामग्री का इस्तेमाल किया गया है।
कोर्ट ने केंद्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान (CRRI) और उत्तर प्रदेश लोक निर्माण विभाग की रिपोर्टों का भी उल्लेख किया।
इन रिपोर्टों में निर्माण कार्य अधूरा होने का कोई निष्कर्ष नहीं था।
हाईकोर्ट ने कहा,
“केवल इसलिए कि अपीलकर्ता ने कार्य पूर्णता प्रमाणपत्र जारी नहीं किया, यह नहीं माना जा सकता कि निर्माण कार्य अधूरा था।”
इस आधार पर कोर्ट ने निर्माण कार्य पूरा होने के संबंध में ट्रिब्यूनल के निष्कर्ष में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
अनुबंध में प्रावधान के बिना चक्रवृद्धि ब्याज नहीं दिया जा सकता
ब्याज के प्रश्न पर हाईकोर्ट ने कहा कि चूंकि पक्षकारों के अनुबंध में ब्याज के संबंध में कोई शर्त नहीं थी, इसलिए मध्यस्थता और सुलह अधिनियम की धारा 31(7) लागू होगी।
इस प्रावधान के तहत ट्रिब्यूनल को विवाद मध्यस्थता के लिए भेजे जाने से पहले की अवधि, मध्यस्थता कार्यवाही के दौरान और भविष्य की अवधि के लिए ब्याज देने का अधिकार है।
कोर्ट ने अनुबंध की व्यावसायिक प्रकृति को देखते हुए 14 प्रतिशत वार्षिक ब्याज दर को अनुचित नहीं माना।
हालांकि, बेंच ने स्पष्ट किया कि साधारण ब्याज देने की शक्ति और चक्रवृद्धि ब्याज देने की शक्ति को एक समान नहीं माना जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया बनाम रवींद्र फैसले का उल्लेख करते हुए हाईकोर्ट ने कहा,
“यह अब इतना स्थापित कानूनी सिद्धांत है कि इस पर विवाद नहीं किया जा सकता कि अनुबंध में प्रावधान के बिना चक्रवृद्धि ब्याज नहीं दिया जा सकता।”
बेंच ने ब्याज अधिनियम, 1978 की धारा 2(a) और धारा 3(3)(c) पर भी विचार किया।
कोर्ट ने कहा कि सालाना आधार पर ब्याज को मूलधन में जोड़कर आगे ब्याज की गणना करना भी चक्रवृद्धि ब्याज का ही एक रूप है।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एचएलवी लिमिटेड बनाम पीबीएसएएमपी प्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड फैसले की भी जांच की। इस फैसले में हैदर कंसल्टिंग, मॉर्गन सिक्योरिटीज, एस.ए. बिल्डर्स और एस.एल. अरोड़ा मामलों पर विचार किया गया था।
इन न्यायिक फैसलों और संबंधित कानूनी प्रावधानों के आधार पर बेंच ने निष्कर्ष निकाला,
“किसी विशिष्ट संविदात्मक प्रावधान के अभाव में ब्याज का चक्रवृद्धि रूप में निर्धारण या ब्याज पर ब्याज देना स्वीकार्य नहीं है।”
पूरा आर्बिट्रल अवॉर्ड रद्द करने की आवश्यकता नहीं
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के गायत्री बालासामी बनाम आईएसजी नोवासॉफ्ट टेक्नोलॉजीज लिमिटेड फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि मौजूदा मामले में पूरे आर्बिट्रल अवॉर्ड को रद्द करना आवश्यक नहीं है।
बेंच ने कहा,
“केवल ब्याज देने से संबंधित अवॉर्ड के हिस्से को सुधारकर और संशोधित करके न्याय के उद्देश्यों को पूरा किया जा सकता है।”
इसके बाद कोर्ट ने ट्रिब्यूनल के फैसले में ब्याज की गणना से संबंधित हिस्से को संशोधित कर दिया।
हाईकोर्ट ने ब्याज की गणना में किया बदलाव
हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि ठेकेदार को देय ₹1,56,79,034.65 की मूल राशि पर 1 सितंबर 2009 से 31 जनवरी 2016 तक 14 प्रतिशत वार्षिक साधारण ब्याज दिया जाएगा।
31 जनवरी 2016 वह तारीख थी, जब ठेकेदार ने अपना दावा दाखिल किया था।
कोर्ट ने कहा कि इस तारीख तक मूलधन और साधारण ब्याज को जोड़कर कुल देय राशि निर्धारित की जाएगी।
इसके बाद उस निर्धारित राशि पर 1 फरवरी 2016 से वास्तविक भुगतान होने तक 14 प्रतिशत वार्षिक साधारण ब्याज देय होगा।
इसी तरह राज्य सरकार के प्रतिदावे की ₹1,39,619 की रकम पर 1 सितंबर 2009 से 14 प्रतिशत वार्षिक साधारण ब्याज की गणना करके उसे ठेकेदार की देय राशि से घटाया जाएगा।
हाईकोर्ट ने इन संशोधनों के अतिरिक्त ट्रिब्यूनल के फैसले को बरकरार रखा।
बेंच ने राज्य सरकार की अपील आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए मुकदमे के खर्च के संबंध में कोई नया आदेश नहीं दिया।
केस डिटेल्स
केस टाइटल: उत्तर प्रदेश राज्य, अपर मुख्य सचिव, लोक निर्माण विभाग, उत्तर प्रदेश सरकार, लखनऊ एवं अन्य बनाम मेसर्स एपेक्स कंस्ट्रक्शन कंपनी, मथुरा, निदेशक/प्रोपराइटर श्री जगदीश चौधरी के माध्यम से एवं अन्य
केस नंबर: मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 37 के तहत अपील संख्या 62/2023
बेंच: मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और जस्टिस जसप्रीत सिंह
फैसले की तारीख: 24 अक्टूबर 2026
