सुप्रीम कोर्ट ने अपहरण और हत्या के मामले में छह साल तक विचाराधीन कैदी के रूप में जेल में रहने के बाद बरी हुए एक व्यक्ति को ₹6 लाख मुआवजा देने का आदेश उत्तर प्रदेश सरकार को दिया है। कोर्ट ने पुलिस की जांच में गंभीर खामियां पाते हुए राज्य सरकार को जांच के तौर-तरीकों पर ध्यान देने और पुलिस अधिकारियों को उचित प्रशिक्षण देने की सलाह दी।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने पुलिस जांच पर कड़ी नाराजगी जताते हुए अपने फैसले की शुरुआत इस टिप्पणी से की,
“यह इस बात का स्पष्ट उदाहरण है कि जांच किस तरह नहीं की जानी चाहिए, जिसके कारण अभियोजन पक्ष ने एक व्यक्ति के जीवन और स्वतंत्रता को खतरे में डाल दिया।”
छह साल जेल में रहने के बाद आरोपी हुआ बरी
मामला आगरा जिले के अछनेरा थाने में दर्ज एफआईआर संख्या 367/2019 से संबंधित था। इसमें भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 364 के साथ धारा 302 और 201 के तहत मामला दर्ज किया गया था।
याचिकाकर्ता अरुण उर्फ दीपक 14 नवंबर 2019 से जेल में बंद था। करीब छह साल हिरासत में रहने के बाद उसने जमानत के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
मामला पूरी तरह परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित था। इसे देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 23 मार्च 2026 को ट्रायल कोर्ट को तीन महीने के भीतर सुनवाई पूरी करने का निर्देश दिया।
इसके बाद ट्रायल पूरा हुआ और आरोपी को सभी आरोपों से बरी कर दिया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट से बरी किए जाने के फैसले की प्रति मंगाई। यह फैसला हिंदी में 100 से अधिक पन्नों का था, जिसका अनुवाद कराना पड़ा।
फैसले का अध्ययन करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जिस तरह से पुलिस ने मामले की जांच की, उससे बेंच स्तब्ध रह गई।
एफआईआर में नाम नहीं था, फिर भी बनाया आरोपी
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता का नाम न तो एफआईआर में था और न ही CrPC की धारा 161 के तहत दर्ज बयान में।
उसे केवल सीसीटीवी फुटेज और एक सह-आरोपी के कबूलनामे के आधार पर आरोपी बनाया गया था।
मामले में दो अन्य आरोपी भी थे। इनमें ललित किशोर की मृत्यु हो गई थी, जबकि उसकी मां शालिनी फरार थी। ऐसे में केवल अरुण उर्फ दीपक के खिलाफ मुकदमा चला।
पुलिस जांच में सामने आईं गंभीर खामियां
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि पूरे मुकदमे में केवल छह गवाहों का परीक्षण किया गया।
जांच के दौरान बरामद जली हुई हड्डियों के बारे में यह साबित नहीं किया गया कि वे लापता व्यक्ति की ही थीं। फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (FSL) की जांच का परिणाम भी ट्रायल के दौरान पेश नहीं किया गया।
पुलिस ने बरामद अवशेषों के डीएनए का मिलान मृतक के पिता के डीएनए से कराने का भी कोई प्रयास नहीं किया। इसके अलावा मृत्यु का समय और कारण भी निर्धारित नहीं हो सका।
कोर्ट ने पाया कि सीसीटीवी फुटेज और कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) के समर्थन में साक्ष्य अधिनियम की धारा 65B के तहत आवश्यक प्रमाणपत्र पेश नहीं किया गया था। ट्रायल कोर्ट ने सीसीटीवी फुटेज को भी अस्पष्ट पाया था।
जांच में बरामद मोटरसाइकिल को भी ट्रायल के दौरान पेश नहीं किया गया।
इसके अलावा साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 के तहत आरोपी से किसी वस्तु को छिपाने के संबंध में कोई बयान दर्ज नहीं किया गया था।
अभियोजन पक्ष का आरोप था कि शव जलाने के लिए एक पेट्रोल पंप से पेट्रोल खरीदा गया था। हालांकि, पुलिस उस पेट्रोल पंप की पहचान तक नहीं कर सकी। पेट्रोल रखने वाले डिब्बों की भी रासायनिक जांच नहीं कराई गई।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी पाया कि फिरौती मांगने की कथित घटना के संबंध में पुलिस को कभी कोई सूचना नहीं दी गई थी। यह आरोप पहली बार अदालत में लगाया गया।
ट्रायल कोर्ट ने अभियोजन पक्ष द्वारा बताई गई चारों परिस्थितियों में से किसी को भी साबित नहीं पाया था।
फैसला लिखते हुए जस्टिस के. विनोद चंद्रन ने कहा,
“लापरवाही से की गई जांच के आधार पर अव्यवस्थित तरीके से अभियोजन चलाया गया, जिसका परिणाम सौभाग्य से आरोपी के बरी होने के रूप में सामने आया।”
मनगढ़ंत कहानी के कारण व्यक्ति के जीवन के छह साल बर्बाद हुए: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्य अपने नागरिकों की सुरक्षा की जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकता।
बेंच ने टिप्पणी की,
“केवल अनुमानों और अटकलों पर आधारित एक मनगढ़ंत कहानी के कारण एक व्यक्ति के जीवन के छह साल छीन लिए गए। यहां तक कि बुनियादी स्तर की जांच भी नहीं की गई।”
कोर्ट ने जांच और अभियोजन एजेंसियों की भूमिका पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की।
बेंच ने कहा,
“जांच और अभियोजन एजेंसियों का अस्तित्व केवल किसी भी तरीके से दोषसिद्धि सुनिश्चित करने के लिए नहीं है।”
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इन एजेंसियों को खुद को न्याय प्रदान करने वाली व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा समझना चाहिए। उनका दायित्व केवल पीड़ित, वास्तविक शिकायतकर्ता और घायल व्यक्ति को न्याय दिलाना ही नहीं, बल्कि आरोपी के प्रति भी न्याय सुनिश्चित करना है।
कोर्ट ने कहा कि इस मामले की परिस्थितियां इतनी स्पष्ट और चौंकाने वाली हैं कि आरोपी को मुआवजा दिया जाना आवश्यक है, क्योंकि वह स्वयं व्यवस्था का शिकार बन गया।
बेंच ने कहा कि यह मामला “उस आरोपी को क्षतिपूर्ति दिए जाने की मांग करता है, जो स्वयं व्यवस्था का शिकार है।”
एक महीने में ₹6 लाख मुआवजा देने का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता अरुण उर्फ दीपक को एक महीने के भीतर ₹6 लाख मुआवजा दे।
कोर्ट ने कहा कि आरोपी ने जितने साल हिरासत में बिताए, उनकी तुलना में यह रकम बेहद मामूली है।
बेंच ने स्पष्ट किया कि निर्धारित समय में मुआवजा नहीं दिया गया तो इस रकम पर 18 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देना होगा।
पुलिस अधिकारियों को जांच प्रक्रिया का प्रशिक्षण देने की सलाह
उत्तर प्रदेश में पुलिस जांच के तरीके पर सवाल उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को चेताया।
बेंच ने कहा,
“राज्य पुलिस के लिए बेहतर होगा कि वह अपने अधिकारियों को जांच की प्रक्रिया के बारे में शिक्षित करे।”
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश की प्रति उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) और गृह सचिव को भेजने का निर्देश दिया।
इसके साथ ही कोर्ट ने विशेष अनुमति याचिका का निस्तारण कर दिया।
केस डिटेल्स
केस टाइटल: अरुण उर्फ दीपक बनाम उत्तर प्रदेश राज्य
केस नंबर: विशेष अनुमति याचिका (क्रिमिनल) संख्या 4859/2026
बेंच: जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन
फैसले की तारीख: 26 अक्टूबर 2026
