सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर पुलिस और प्रशासन को अपराध रोकने के लिए ठोस कदम उठाने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा कि केवल अपराध होने के बाद आरोपियों को गिरफ्तार करना और उन्हें सजा दिलाना ही पर्याप्त नहीं है। पुलिस को ऐसी व्यवस्था बनानी होगी, जिससे अपराध होने से पहले ही उसे रोका जा सके।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बेंच ने दिल्ली में पुलिस गश्त बढ़ाने, सार्वजनिक परिवहन के ड्राइवरों और सहायकों का सख्ती से सत्यापन करने, सीसीटीवी निगरानी को मजबूत बनाने और अवैध शराब की दुकानों व अन्य अनधिकृत प्रतिष्ठानों के खिलाफ कार्रवाई करने का निर्देश दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने 5 अक्टूबर के अपने आदेश में वाहनों में लगे ट्रैकिंग उपकरणों को पुलिस के इमरजेंसी रिस्पॉन्स सिस्टम से प्रभावी तरीके से जोड़ने की जरूरत भी बताई। यह आदेश गुरुवार को उपलब्ध हुआ।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अपराध रोकना पुलिस की नियमित कार्यप्रणाली का हिस्सा होना चाहिए। यह केवल किसी अधिकारी की व्यक्तिगत पहल पर निर्भर नहीं रह सकता।
दिल्ली में पुलिस कंट्रोल रूम और सीसीटीवी निगरानी की रिपोर्ट मांगी
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस कमिश्नर और मुख्य सचिव को संयुक्त रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है।
कोर्ट ने पूछा है कि दिल्ली में पुलिस गश्त और सीसीटीवी कैमरों की रियल टाइम निगरानी के लिए विशेष कंट्रोल रूम या कमांड सेंटर मौजूद हैं या नहीं।
अगर ऐसे सेंटर काम कर रहे हैं, तो उनकी संख्या और वे किन इलाकों की निगरानी करते हैं, इसकी पूरी जानकारी दी जाए।
बेंच ने यह भी जानना चाहा कि किसी घटना की सूचना मिलने पर पुलिस के विभिन्न विभागों के बीच तालमेल, सूचना के आदान-प्रदान और तुरंत कार्रवाई के लिए वर्तमान में क्या व्यवस्था है।
इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को संवेदनशील इलाकों में लगातार निगरानी के लिए 24 घंटे काम करने वाला मॉनिटरिंग सेल बनाने को कहा है, ताकि देर रात भी महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
अपराध होने के बाद कार्रवाई ही काफी नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सार्वजनिक स्थानों पर खराब रोशनी, पुलिस गश्त की कमी और निगरानी की कमजोर व्यवस्था जैसी समस्याओं को तब तक नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, जब तक वहां कोई अपराध न हो जाए।
कोर्ट के मुताबिक, ऐसी कमियों को समय रहते पहचानकर दूर करना जरूरी है।
बेंच ने कहा कि सार्वजनिक स्थानों की उचित देखरेख, पुलिस की मौजूदगी और सुरक्षा संबंधी शिकायतों पर तुरंत कार्रवाई अपराध रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि जिन समस्याओं को आसानी से पहचाना और ठीक किया जा सकता है, उन्हें अपराध होने तक लंबित नहीं छोड़ा जाना चाहिए।
इस तरह की निगरानी से आम लोगों में सुरक्षा का भरोसा बढ़ेगा और अपराध करने की सोच रखने वालों में पकड़े जाने का डर पैदा होगा।
जस्टिस पारदीवाला ने दिल्ली में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर चिंता जताते हुए कहा कि शहर के कुछ संवेदनशील इलाकों में महिलाओं के असुरक्षित होने की भावना दिखाई देती है।
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि पुलिस और प्रशासन की कमियां किसी अपराध को अंजाम देने का मौका नहीं बननी चाहिए।
जस्टिस पारदीवाला ने अपराधियों के मन में कानून का डर पैदा करने की जरूरत भी बताई।
लोगों की शिकायतें सुनने के लिए नियमित बैठकें करने का सुझाव
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अपराध रोकने में आम नागरिकों की भागीदारी भी जरूरी है।
बेंच के मुताबिक, स्थानीय लोगों को अक्सर अपने आसपास की सुरक्षा संबंधी समस्याओं की जानकारी पुलिस से पहले हो जाती है।
इनमें सुनसान या अंधेरी सड़कें, लावारिस वाहन, अवैध प्रतिष्ठान, जर्जर इमारतें और बार-बार होने वाली असामाजिक गतिविधियां शामिल हैं।
कोर्ट ने दिल्ली पुलिस और स्थानीय प्रशासन को नागरिकों के साथ नियमित बैठकें आयोजित करने पर विचार करने को कहा है।
इन बैठकों की निगरानी के लिए एक अधिकारी नियुक्त किया जा सकता है, जो लोगों की शिकायतें सुने और उन पर हुई कार्रवाई की समीक्षा करे।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इससे सुरक्षा संबंधी समस्याओं की समय पर पहचान करने और उन्हें दूर करने में मदद मिलेगी।
नाबालिगों से रेप की घटनाओं के बाद सुप्रीम कोर्ट ने लिया था स्वतः संज्ञान
दिल्ली में महिलाओं के खिलाफ हुई तीन गंभीर आपराधिक घटनाओं के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 28 सितंबर को मामले का स्वतः संज्ञान लिया था।
पहला मामला अगस्त में एक नाबालिग के साथ स्लीपर बस में कथित रेप का था। यह बस ग्रेटर नोएडा से पुरानी दिल्ली के कश्मीरी गेट तक लगभग 47 किलोमीटर चली थी।
दूसरा मामला दक्षिण दिल्ली के आस्था कुंज पार्क में 17 वर्षीय लड़की के साथ कथित गैंगरेप का था। आरोप है कि तीन लोगों ने खुद को पुलिसकर्मी बताकर वारदात को अंजाम दिया।
तीसरा मामला उत्तर-पश्चिम दिल्ली में सामने आए कथित गैंगरेप और हत्या से जुड़ा था।
इन घटनाओं के बाद सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में महिलाओं की सुरक्षा व्यवस्था और उन प्रशासनिक कमियों की जांच करने का फैसला किया था, जिनके कारण अपराधों को रोकने में नाकामी हो सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि अपराधियों को पकड़ना, मुकदमा चलाना और सजा दिलाना जरूरी है, लेकिन अपराध होने से पहले उसे रोकना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
मामले की अगली सुनवाई 16 नवंबर को होगी।

