पंजाब के एक जिला उपभोक्ता आयोग ने सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी कराने वाले एक कोचिंग संस्थान को छात्रा की पूरी 55,000 रुपये की फीस लौटाने और मानसिक उत्पीड़न व कानूनी खर्च के एवज में 15,000 रुपये का हर्जाना देने का आदेश दिया है। आयोग ने यह फैसला संस्थान द्वारा वादे के अनुसार नियमित और स्थायी फैकल्टी न देने और रिफंड में मनमानी कटौती करने के मामले में सुनाया।
आयोग के अध्यक्ष एस के अग्रवाल और सदस्य परमजीत कौर की पीठ ने 5 अक्टूबर को जारी आदेश में कोचिंग संस्थान और उसके प्रतिनिधियों को संयुक्त व अलग-अलग रूप से यह राशि चुकाने का निर्देश दिया। पीठ ने कहा कि यूपीएससी जैसी कठिन प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों का समय बेहद कीमती होता है। ऐसी तैयारी में निरंतरता, नियमित कक्षाओं और योग्य शिक्षकों के उचित मार्गदर्शन की अहम भूमिका होती है। आयोग ने रेखांकित किया कि शिक्षकों को बार-बार बदलने और कक्षाओं में अनियमितता से अभ्यर्थियों की पढ़ाई और भविष्य पर गंभीर प्रतिकूल असर पड़ता है।
क्लास मर्जर और रिफंड कटौती पर विवाद
यह विवाद चंडीगढ़ स्थित शाखा में यूपीएससी कोचिंग के लिए 55,000 रुपये की एकमुश्त फीस देकर दाखिला लेने वाली एक छात्रा से जुड़ा है। छात्रा ने आयोग के समक्ष शिकायत दर्ज कराई कि दाखिले के वक्त संस्थान ने अनुभवी और स्थायी फैकल्टी का आश्वासन दिया था, जिसे पूरा नहीं किया गया। कक्षाओं के दौरान शिक्षकों को लगातार बदला गया और उसके बैच को पोस्टग्रेजुएट व वरिष्ठ छात्रों के साथ मिला दिया गया, जिससे तैयारी में बाधा उत्पन्न हुई।
लगातार आ रही समस्याओं के बाद छात्रा ने कोचिंग छोड़ने का फैसला करते हुए फीस वापसी की मांग की। संस्थान ने शुरुआत में 15,000 रुपये सर्विस चार्ज काटकर 40,000 रुपये लौटाने पर सहमति जताई थी। हालांकि, बाद में संस्थान इस वादे से पलट गया और उसने रजिस्ट्रेशन, पोर्टल एक्सेस, स्टडी मटेरियल तथा ऑफलाइन सुविधाओं के नाम पर 45,000 रुपये की कटौती का नया प्रस्ताव भेज दिया, जिससे रिफंड की रकम घटकर केवल 10,000 रुपये रह गई।
उपभोक्ता आयोग के समक्ष कोचिंग का लचर रुख और फैसला
रिफंड में भारी कटौती से आहत छात्रा ने उपभोक्ता आयोग की शरण ली। आयोग के समक्ष विपक्षी पक्ष प्रभावी बचाव पेश करने में नाकाम रहा। एक पक्ष सुनवाई में शामिल नहीं हुआ, जिसके चलते उसके खिलाफ एकतरफा कार्रवाई की गई। वहीं दूसरा पक्ष उपस्थित तो हुआ, लेकिन निर्धारित 45 दिनों की वैधानिक समयसीमा में अपना लिखित पक्ष दाखिल नहीं कर सका, जिससे उसका जवाब देने का कानूनी अधिकार समाप्त हो गया।
पीठ ने छात्रा द्वारा प्रस्तुत प्रॉस्पेक्टस, फीस रसीद, रिफंड आवेदन, ईमेल और व्हाट्सएप संदेशों की पड़ताल की। आयोग ने पाया कि अनुभवी और स्थायी फैकल्टी का दिया गया भरोसा ही छात्रा के दाखिले का मुख्य आधार था।
आयोग ने स्पष्ट किया कि कई बार शिकायत के बावजूद स्थिर और नियमित फैकल्टी उपलब्ध न कराना तथा बाद में रिफंड में मनमानी करना सेवा में स्पष्ट कमी और अनुचित व्यापार व्यवहार का मामला है। इसके मद्देनजर आयोग ने छात्रा की शिकायत स्वीकार करते हुए संस्थान को 55,000 रुपये की ट्यूशन फीस वापस करने और 15,000 रुपये का एकमुश्त मुआवजा देने का निर्देश दिया।

