इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड, 2016 (आईबीसी) और आर्बिट्रेशन एंड कॉन्सिलेशन एक्ट, 1996 के अंतर्संबंधों पर एक महत्वपूर्ण फैसले में, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि कॉर्पोरेट इंसॉल्वेंसी रिजॉल्यूशन प्रोसेस (सीआईआरपी) के दौरान भारी हेयरकट झेलने वाला ऑपरेशनल क्रेडिटर उसी अनुबंध से जुड़े विवाद में सफल समाधान आवेदक (एसआरए) द्वारा शुरू की गई मध्यस्थता में अपने समाप्त हो चुके दावों का सेट-ऑफ (समायोजन) मांग सकता है। जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने कर्नाटक हाईकोर्ट के आदेश में संशोधन करते हुए निर्णय दिया कि भले ही एसआरए पूर्व बकाए की वसूली के लिए कार्यवाही कर सकता है, लेकिन मध्यस्थता मूलतः “दोतरफा रास्ता” है। पीठ ने माना कि दोनों पक्षों के बीच साम्या (इक्विटी) संतुलित करने के लिए ऑपरेशनल क्रेडिटर को केवल सेट-ऑफ के उद्देश्य से काउंटर-क्लेम दाखिल करने की अनुमति होगी, हालांकि वह किसी भी सकारात्मक वसूली का हकदार नहीं होगा।
जस्टिस के. विनोद चंद्रन द्वारा तैयार किए गए निर्णय में पीठ के समक्ष मुख्य कानूनी सवाल यह था: “क्या कॉर्पोरेट इंसॉल्वेंसी रिजॉल्यूशन प्रोसेस (सीआईआरपी) में भारी हेयरकट झेलने वाले ऑपरेशनल क्रेडिटर (ओस) के खिलाफ सफल समाधान आवेदक (एसआरए) द्वारा उन प्री-सीआईआरपी बकायों के लिए कानूनी कार्यवाही की जा सकती है, जो सीआईआरपी में गई कंपनी को ओसी से मिलने थे।”
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद 9 जुलाई 2018 के एक अनुबंध से शुरू हुआ, जो मॉडर्न एसेट (अपीलार्थी) और केएनके कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड (प्रतिवादी) के बीच 133.68 करोड़ रुपये की लागत से एक कार्यालय भवन के सिविल और स्ट्रक्चरल निर्माण कार्य के लिए हुआ था। इस समझौते के खंड 19.13 में मध्यस्थता (आर्बिट्रेशन) का प्रावधान था। अपीलार्थी ने मोबिलाइजेशन एडवांस का भुगतान किया था, जबकि प्रतिवादी ने काम पूरा करने के लिए 1,56,13,250 रुपये की बैंक गारंटी दी थी।
काम 1 जून 2018 को शुरू हुआ और इसकी समयसीमा एक बार बढ़ाकर 31 दिसंबर 2019 तक की गई। प्रतिवादी ने 95% काम पूरा करने का दावा किया, लेकिन अपीलार्थी ने 14 दिनों का डिफेक्ट रेक्टिफिकेशन नोटिस जारी किया और अंततः 25 फरवरी 2020 को अनुबंध समाप्त कर दिया। अनुबंध रद्द होने से पहले ही, 11 दिसंबर 2019 को आईबीसी की धारा 9 के तहत प्रतिवादी कंपनी के खिलाफ सीआईआरपी शुरू हो चुकी थी। इंसॉल्वेंसी प्रक्रिया शुरू होने के बाद, प्रतिवादी को सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (एमएसएमई) मंत्रालय के तहत एक छोटे उद्यम के रूप में पंजीकृत कराया गया।
सीआईआरपी के दौरान, अपीलार्थी ने रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल (आरपी) के समक्ष 12,26,30,840 रुपये का दावा प्रस्तुत किया। हालांकि, प्रतिवादी के पूर्ववर्ती प्रमोटरों द्वारा आईबीसी की धारा 240ए(1) के तहत एमएसएमई छूट का लाभ उठाकर पेश किए गए रिजॉल्यूशन प्लान में अपीलार्थी को 99.28% का भारी हेयरकट दिया गया। अपीलार्थी के दावे का केवल 0.72% हिस्सा यानी ब्याज सहित 8,82,942 रुपये ही स्वीकार किया गया और बाद में इसका भुगतान हुआ। नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) ने 5 अप्रैल 2022 को इस रिजॉल्यूशन प्लान को मंजूरी दे दी, जिससे पूर्ववर्ती प्रमोटर ही एसआरए के रूप में दोबारा कंपनी के प्रबंधन में आ गए।
रिजॉल्यूशन प्लान प्रभावी होने के बाद, प्रतिवादी कंपनी ने उसी पुराने निर्माण अनुबंध के तहत बकाया राशि का दावा करते हुए 13 मार्च 2023 को अपीलार्थी के खिलाफ मध्यस्थता शुरू करने का नोटिस भेजा। इसके बाद प्रतिवादी ने आर्बिट्रेशन एक्ट की धारा 11 के तहत कर्नाटक हाईकोर्ट का रुख किया। हाईकोर्ट ने मध्यस्थ नियुक्त करते हुए कहा कि रिजॉल्यूशन प्लान के प्रभाव और ‘क्लीन स्लेट’ सिद्धांत से जुड़े कानूनी सवालों का निर्धारण आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल द्वारा धारा 16 के तहत किया जाना चाहिए। इस आदेश के खिलाफ मॉडर्न एसेट ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।
पक्षों की दलीलें
अपीलार्थी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता श्री श्याम दीवान ने दलील दी कि इस मध्यस्थता की अनुमति देना विवाद को “एकतरफा रास्ता” बना देगा। उन्होंने तर्क दिया कि अनुबंध के तहत अपीलार्थी का वित्तीय दावा सीआईआरपी में मामूली रकम देकर निपटा दिया गया था और शेष राशि कानूनन समाप्त हो चुकी है। ‘क्लीन स्लेट’ सिद्धांत के चलते अपीलार्थी कोई काउंटर-क्लेम दाखिल नहीं कर सकता, जबकि वही पूर्ववर्ती प्रमोटर अब एसआरए बनकर उसी द्विपक्षीय समझौते के तहत पैसे वसूलने चले आए हैं। अपीलार्थी का कहना था कि अनुबंध और उसका आर्बिट्रेशन क्लॉज सीआईआरपी के साथ ही समाप्त हो चुके हैं, इसलिए मध्यस्थता के लिए कोई विवाद शेष नहीं बचा है।
दूसरी तरफ, प्रतिवादी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता श्री निखिल नायर ने तर्क दिया कि कानून एमएसएमई के पूर्ववर्ती प्रमोटरों को रिजॉल्यूशन प्लान पेश करने और एसआरए के रूप में कमान संभालने की अनुमति देता है। स्विस रिबन्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि आरपी केवल दावों का संकलन करता है, उनका न्यायिक निर्णय नहीं करता। घनश्याम मिश्रा एंड संस (पी) लिमिटेड बनाम एडलवाइस एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी लिमिटेड का उल्लेख करते हुए प्रतिवादी ने कहा कि आईबीसी की धारा 31 कॉर्पोरेट देनदार के खिलाफ दावों को तो समाप्त करती है ताकि उसे नई शुरुआत (‘क्लीन स्लेट’) मिल सके, लेकिन यह कंपनी को मिलने वाले बकायों को समाप्त नहीं करती। एसबीआई जनरल इंश्योरेंस बनाम कृष स्पिनिंग और इन री: इंटरप्ले बिटवीन आर्बिट्रेशन एग्रीमेंट्स के फैसलों के आधार पर उन्होंने कहा कि धारा 11 का दायरा केवल आर्बिट्रेशन समझौते के प्रथम दृष्टया अस्तित्व की जांच तक सीमित है। इसके अलावा, नई दिल्ली म्युनिसिपल काउंसिल बनाम मिनोशा इंडिया लिमिटेड का हवाला देते हुए प्रतिवादी ने कहा कि धारा 60(6) के तहत मोरेटोरियम अवधि को छोड़कर गणना करने पर दावा मियाद (लिमिटेशन) के भीतर है।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और पूर्व निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने आईबीसी के वैधानिक ढांचे की समीक्षा करते हुए टिप्पणी की कि पूर्ववर्ती प्रमोटर धारा 19 के तहत सीआईआरपी के दौरान सक्रिय रूप से जुड़े थे और वे धारा 29 के तहत बने इन्फॉर्मेशन मेमोरेंडम में दर्ज अपीलार्थी के दावे से भलीभांति परिचित थे। रिजॉल्यूशन प्लान में 0.72% भुगतान की पेशकश करके, प्रमोटरों ने अनिवार्य रूप से दावे को स्वीकार कर लिया था और केवल लिक्विडेशन मूल्य के आधार पर उस पर हेयरकट लगाया था।
पीठ ने हाईकोर्ट के उस दृष्टिकोण से असहमति जताई जिसमें ‘क्लीन स्लेट’ सिद्धांत के लागू होने का दायरा धारा 16 के तहत आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल पर छोड़ दिया गया था:
“हाईकोर्ट के इस विचार को स्वीकार नहीं किया जा सकता कि ‘क्लीन स्लेट’ सिद्धांत एसआरए पर भी समान रूप से लागू होगा या नहीं, यह तय करने की छूट मध्यस्थ पर छोड़ दी जाए; क्योंकि स्पष्ट कानूनी स्थिति यह है कि एसआरए के खिलाफ ‘क्लीन स्लेट’ सिद्धांत लागू होता है, जबकि एसआरए कॉर्पोरेट देनदार के बकायों के लिए आगे बढ़ सकता है। इन पहलुओं पर मध्यस्थ द्वारा विचार किए जाने के लिए कुछ भी शेष नहीं रहता।”
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने जोर देकर कहा कि मध्यस्थता अनिवार्य रूप से एक दोतरफा प्रक्रिया है। यदि एसआरए को एक ही सौदे और एक ही ठेकेदार के खिलाफ वसूली की अनुमति दी जाए और खुद को ‘क्लीन स्लेट’ सिद्धांत की आड़ में पूरी तरह सुरक्षित कर दिया जाए, तो इससे घोर अन्याय की स्थिति बनेगी।
इस स्थिति का समाधान निकालने के लिए अदालत ने अपने हालिया निर्णय उजास एनर्जी लिमिटेड बनाम वेस्ट बंगाल पावर डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन लिमिटेड (2026) का सहारा लिया, जहां आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल को केवल रक्षात्मक सेट-ऑफ के उद्देश्य से काउंटर-क्लेम पर विचार करने का निर्देश दिया गया था। पीठ ने पाया कि उजास एनर्जी लिमिटेड में मौजूद परिस्थितियां वर्तमान मामले में और भी अधिक दृढ़ता से लागू होती हैं, क्योंकि यहां एसआरए वही पूर्ववर्ती प्रमोटर हैं जिन्होंने सीआईआरपी के दौरान ऑपरेशनल क्रेडिटर के दावे को स्वीकार किया था:
“वास्तव में दावे का 0.72% स्वीकार करके, एसआरए ने पूरे दावे को स्वीकार कर लिया था और 99.28% का बड़ा हेयरकट तय किया था, तथा शेष राशि का भुगतान एसआरए द्वारा स्वयं प्रस्तुत समाधान योजना में किए जाने पर सहमति बनी थी। मध्यस्थता के लिए उठाया गया दावा उसी अनुबंध से उत्पन्न होता है जिस पर अपीलार्थी द्वारा सीआईआरपी प्रक्रिया के दौरान ओसी के रूप में दावा किया गया था…”
शीर्ष अदालत का निर्णय
‘क्लीन स्लेट’ सिद्धांत और साम्या के सिद्धांतों के बीच संतुलन स्थापित करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने मध्यस्थता न्यायाधिकरण की नियुक्ति को बरकरार रखा, लेकिन कर्नाटक हाईकोर्ट के निर्देशों में संशोधन किया।
पीठ ने स्पष्ट निर्देश दिया:
“अपीलार्थी को केवल सेट-ऑफ (समायोजन) का दावा करने के उद्देश्य से काउंटर-क्लेम उठाने की अनुमति दी जानी चाहिए और अपीलार्थी को इस काउंटर-क्लेम के आधार पर किसी भी सकारात्मक या प्रत्यक्ष वसूली की राहत प्राप्त नहीं होगी।”
कोर्ट ने निर्देश दिया कि यदि आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल यह पाता है कि अपीलार्थी द्वारा प्रतिवादी को कोई राशि देय है, तो उस राशि का सेट-ऑफ अपीलार्थी द्वारा सीआईआरपी के दौरान आरपी के समक्ष किए गए मूल दावे के आधार पर किया जाएगा। यदि प्रतिवादी का मौद्रिक दावा खारिज हो जाता है, तो अपीलार्थी एसआरए से किसी भी अतिरिक्त राशि की वसूली नहीं कर सकता, क्योंकि कॉर्पोरेट देनदार के खिलाफ उसका स्वतंत्र दावा कानूनन समाप्त हो चुका है।
इसके औचित्य पर टिप्पणी करते हुए पीठ ने कहा:
“सेट-ऑफ का यह लाभ केवल साम्या सुनिश्चित करने और आईबीसी के दायरे में रहते हुए एसआरए के हाथों में कॉर्पोरेट देनदार की संपत्तियों के संरक्षण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए दिया गया है।”
इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने मध्यस्थता न्यायाधिकरण को निर्देश दिया कि वह प्रतिवादी द्वारा दी गई बैंक गारंटी को भुनाने की वैधता पर भी विचार करे। इन संशोधनों के साथ शीर्ष अदालत ने अपील का निस्तारण कर दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: मॉडर्न एसेट बनाम केएनके कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या… 2026 (विशेष अनुमति याचिका (सिविल) संख्या 25068/2026)
पीठ: जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन
निर्णय की तिथि: 08 अक्टूबर 2026

